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सिंगरौली।। कलेक्टर अनुराग चौधरी के समय सीमा बैठक के दौरान यह बात संज्ञान में लाई गई कि जिलें में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे पटवारियों का वेतन आहरण नही हुआ है। जिस पर उनके द्वारा राजस्व अधिकारियों के प्रति नाराजगी व्यक्त की गई। साथ ही जिला कोषालय अधिकारी को निर्देश दिया गया कि प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे पटवारियों का जब तक वेतन आहरण नही होता तब तक मेरे भी वेतन का भुगतान रोक दिया जाय। आगे उन्होनें ने यह भी निर्देश दिया है कि अगले माह जिलाधिकारियों का वेतन आहरण तभी किया जाय जब उनके अधीनस्थ कार्य करने वाले कर्मचारियों का वेतन भुगतान हो जाये। उन्होनें ने कहा कि यह बड़े खेद की बात है कि बड़े अधिकारियों का वेतन भुगतान समय पर हो जाता है जबकि उन्ही के कार्यालयों में कार्य करने वाले कर्मचारियों का वेतन भुगतान समय पर नही होता। साथ ही उन्होने ने उपस्थित अधिकारियो को निर्देश दिये कि आपके अधीन जो कर्मचारी कार्य कर रहे है उनके वेतन भुगतान संबंधी जो भी समस्या आ रही है। उनको दूर कर अगले समय सीमा बैठक के दौरान मुझे सूचित किया जाय।

देश-विदेश से आए 30 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने मंगलवार को मकर संक्रांति के मौके पर यहां गंगासागर में पवित्र डुबकी लगाई। भारत के अलावा स्नान करने वालों में नेपाल और बांग्लादेश के तीर्थयात्री शामिल थे। गंगा नदी का जिस स्थान पर बंगाल की खाड़ी से संगम होता है उसे गंगासागर कहते है। 
पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री सुव्रत मुखर्जी ने कहा कि तीर्थयात्रियों ने कपिल मुनि मंदिर में पूजा अर्चना भी की।मुखर्जी ने संवाददाताओं से कहा कि इस बार पवित्र डुबकी लगाने 30 लाख से अधिक श्रद्धालु आए जबकि पिछले वर्ष 20 लाख लोग स्नान करने आए थे।

मुखर्जी, उनके कैबिनेट सहयोगियों बिजली मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय और लोक निर्माण मंत्री अरूप विश्वास को सागरद्वीप में प्रबंधों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मेले पर नजर रखे हुए हैं और अधिकारियों के निरंतर संपर्क में हैं। मेला परिसर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

पिछले साल भी मकर संक्रांति पर लाखों हिन्दुओं ने गंगासागर में पवित्र स्नान किया था।

उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) संबद्ध एन.यू.जे.आई. के प्रान्तीय कार्यसमिति की बैठक सम्पन।

जीत नारायण सिंह
वाराणसी मे उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) द्वारा आयोजित संगोष्ठी मे "पत्रकारिता के नये आयाम और चुनौतियों" विषय पर एक संगोष्ठी मे प्रदेश भर से जुटे उपजा के प्रतिनिधियो का प्रदेशिय कार्यकारिणी की बैठक सम्पन हुआ।
जिसमें वक्ताओं ने कहा कि समाज में बहुत से लोग बोल नहीं पाते है, लिख नहीं पाते है अपनी बात अच्छे ढग से कह नही पाते है। ऐसे लोगों के शब्द और आवाज को अपने लेखनी में ढालने वाले ही पत्राकार होते है।
सच को शब्द दे देने की कला का नाम ही पत्रकारिता है।पत्रकारों के कंधे पर समाज और राष्ट्र की महती जिम्मेदारी है। निष्पक्षता और निडरता ही पत्राकारिता का मूल मंत्र है।
उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) संबद्ध एन.यू.जे.आई. की प्रान्तीय कार्यसमिति की बैठक वाराणसी के दुर्गा कुण्ड स्थिति धर्म संघ शिक्षा मंडल मेँ सम्पन हुई,उक्त कार्यक्रम मेँ उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) से जुड़े हुये सम्पूर्ण प्रदेश के पदाधिकारी व प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य मौजूद रहें जिसमें विभिन्न पदाधिकारियों नें उपरोक्त विषय पर अपने विचार व्यक्त किये,कार्यसमिति की बैठक मे नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इण्डिया) से सम्बद्व उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) द्वारा आयोजित संगोष्ठी ‘‘पत्रकारिता के नये आयाम और चुनौतियाॅ ’’ विषय पर शनिवार को धर्मसंघ शिक्षा मंडल, दुर्गाकुंड में बोलते हुए वाराणसी की महापौर मृदुला जायसवाल ने कही।

कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलन एवं माॅं सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ।


राष्ट्रीय अघ्यक्ष अशोक मलिक, एन.यू.जे (आई) ने वार्षिक कार्ययोजना एवं प्रदेश सरकार से अपनी माॅगों की विस्तार से चर्चा किया विषय पर बोलते हुए प्रदीप शर्मा, राजीव शुक्ला, देवेन्द्र सिन्हा, सचिन भारद्वाज, राजकुमार शर्मा, मारकंडे सिंह आदि वक्ताओं ने अपनी बात रखी।

इस अवसर पर राम नरेश ने अपनी कविता सग्रह की पुस्तक महापौर को समर्पित किया।इस अवसर पर वाराणसी की उपजा ईकाई द्वारा महापौर को स्मृति चिन्ह एवं पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया।

उपरोक्त कार्यक्रम मे अति विशिष्ट अतिथि महापौर वाराणसी श्रीमती मृदुला जायसवाल जी रहीं, एवं विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय अध्यक्ष एन.यू.जे.(आई) श्री अशोक मलिक जी व राष्ट्रीय महासचिव एन.यू.जे.(आई) श्री मनोज वर्मा जी, प्रदेश उपाध्यक्ष विनोद बागी, प्रदेश महामंत्री श्री प्रदीप शर्मा, प्रदेश कोषाध्यक्ष सचिन भारद्वाज, राजीव शुक्ला, राजकुमार शर्मा, देवेन्द्र कुमार सिन्हा, आशीष कुमार गुप्ता, राजेश चौरसिया, रितेश पाल श्रीवास्तव, वाराणसी जिला इकाई के महामंत्री सुबोध त्रिपाठी, सुधीर दुबे, विजय शंकर चौबे, रुद्रानंद तिवारी, अजीत नारायण सिंह, अजय चौबे, विनोद राव, सहित पूरे प्रदेश भर से पत्रकार साथी उपस्थिति रहें।

अतिथियों का स्वागत उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष विनोद कुमार बागी एवं धन्यवाद ज्ञापन सुबोध त्रिपाठी ने किया।कार्यक्रम का संचालन डा. अरविन्द कुमार सिंह ने किया।


ब्दुल रशीद
देश की सियासत में उत्तर प्रदेश इसलिए अहम है क्योंकि केंद्र सरकार बनाने के लिए सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश में है। 2019 का चुनाव नजदीक है ऐसे में 25 वर्ष बाद सपा और बसपा के गठबंधन का एलान यकीनन बहुत महत्वपूर्ण है।

मुलायम और कांशीराम की ही तरह मायावती और अखिलेश यादव भी मिले। 25 वर्ष पहले सपा-बसपा की दोस्ती की नींव 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने रखी थी। जब दोनों साथ आए थे तब भी मुद्दा भाजपा के बढ़ते कदम को रोकना था और आज भी कमोबेश वही है।

भले ही सपा-बसपा का गठबंधन को लेकर संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया की यह गठबंधन स्थाई है जो लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में आगे भी बरकरार रहेगा।ऐसी घोषणाओं के बावजूद सपा-बसपा के इस गठबंधन के लिये  समाजिक -आर्थिक रूप से दलित पिछड़ों को एक साथ लाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

राफेल घोटाले में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ेगी

मायावती ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा की,‘गुरू चेला अर्थात मोदी और शाह की नींद उडाने वाली यह प्रेस कांफ्रेंस है। आज उत्तर प्रदेश सहित देश की सवा सौ करोड जनता परेशान है। साथ चुनाव लड़ने का फैसला क्रांति संदेश देने वाला फैसला है।भाजपा ने बेईमानी से सरकार बनाई है। जन विरोधी पार्टी को रोकने के लिय हम एक हुये है। नोटबंदी और जीएसटी का फैसला बिना सोचे समझे किया गया। देश में अघोषित इमरजेंसी लगी है। राफेल घोटाले में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ेगी।’

भाजपा ने अघोषित तो कांग्रेस ने घोषित इमरजेंसी लगाई।

भले ही कांग्रेस के रायबरेली और अमेठी सीट पर सपा-बसपा गठबंधन ने अपने प्रत्याशी ना उतारने का संकेत दिया हो लेकिन कांग्रेस पर हमले से भी मायावती ने कोई परहेज़ नहीं किया। मायावती ने कहा कि, ‘कांग्रेस से गठबंधन से कोई खास फायदा नहीं होने वाला था। कांग्रेस का वोट ट्रांसफर नहीं होता, जबकी हमारा वोट ट्रांसफर हो जाता है। ऐसे में कांग्रेस जैसी पार्टी को लाभ हो जाता है पर हमारी पार्टी को कोई लाभ नहीं होता। 1996 में हमने और 2017 में सपा ने कांग्रेस से दोस्ती की पर कांग्रेस का लाभ सपा-बसपा को नहीं मिला।देश में  कांग्रेस ने घोषित तो भाजपा ने अघोषित इमरजेंसी लगाई। कांग्रेस ने भी बोफोर्स का घोटाला किया था।’

भाजपा धर्म की आड में देश का विनाश कर रही है। 

अखिलेश यादव ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कहा कि सपा-बसपा मिलकर भाजपा को भगाने का काम करेंगे। भाजपा की कार्यशैली से भगवान भी दुखी है। भाजपा ने भगवान को भी जाति में बांट दिया।भाजपा धर्म की आड में देश का विनाश कर रही है। अखिलेश यादव की बातचीत से यह साफ़ नज़र आया कि आगामी चुनाव में सपा-बसपा भाजपा के हिंदुत्व की तर्ज पर धर्म कार्ड खेलने से परहेज़ नहीं करेगी।

मायावती का अपमान मेरा अपमान है।  

गठबंधन के एलान के लिए आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में जब मायावती ने 2जून 1995 को लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करते हुए कहा की,देशहित में अपमान को भूल कर बसपा-समाजवादी पार्टी का यह गठबंधन हुआ है। तो अखिलेश यादव ने अपने समर्थकों को कड़ा संदेश देते कहा कि मायावती का अपमान मेरा अपमान है।  

गठबंधन की मिठास आगामी विधानसभा चुनाव तक थोडा कड़वा हो सकता है! 

अखिलेश यादव का मायावती को फूलों का गुलदस्ता देकर स्वागत करना और तालमेल बनाकर संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में हर बात पर खुलकर कहने से सपा-बसपा के बीच 23 साल की दुश्मनी दोस्ती में बदलती नजर आई। लेकिन क्या 25 वर्ष पहले सपा से समर्थन वापसी के बाद मायावती को मिले जख्म की टीस और भाजपा नेता द्वारा लगाए मरहम पर अपने राजनितिक हैसियत पाने के बाद विचार नहीं करेगी? मायावती और अखिलेश ने लोकसभा सीटों के बंटवारे का गणित समझाते हुए कहा कि बराबर की हैसियत रखते हुये दोनों ही दल 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।तो क्या भविष्य में भी यही स्थिति बरक़रार रहेगी? इस गठबंधन का असल खेल तो आगामी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में दिखेगा। आज यह गठबंधन जिस परस्पर मिठास के चाशनी में दिख रहा है तब ऐसा न हो कर थोडा कड़वा हो सकता क्योंकि बेहतर खिलाड़ी तय करेगा खेल के कायदे कानून। 

सपा-बसपा का गठबंधन जरूरी कम मजबूरी ज्यादा! 

सपा-बसपा का यह गठबंधन कब तक कायम रहता है,यह देखने वाली बात है।क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य और एक अंक में सिमटी बसपा-सपा विधानसभा में भी भाजपा के सामने टिक नहीं पाए। कुल मिलाकर दोनों के लिए लोकसभा चुनाव में अपना अपना राजनीतिक कद कायम रखने के लिए यह गठबंधन करना जरूरी कम मजबूरी ज्यादा लगता है। सपा-बसपा गठबंधन न तो भाजपा के वोटबैंक में सेंध लगा सकती और न ही कोंग्रेस का अन्य पार्टी को जोड़कर चुनाव लड़ने से रातो रात कोई चमत्कार हो जाएगा,जिससे भाजपा को ज्यादा नुकसान हो। 

उपचुनाव के तर्ज पर यह प्रयोग यदि कामयाब होता है तब भी केंद्र में मजबूत सरकार बनने की संभावना दिखाई नहीं पड़ती कारण तब महागठबंधन के बजाय थर्ड फ्रंट ज्यादा प्रभावी होना चाहेगा साथ में क्षेत्रीय पार्टियों की महत्वाकांक्षा भी हावी रहेगी। ऐसे में भाजपा का परंपरागत वोट और विपक्ष के महागठबंधन में आपसी बिखराव ही विपक्ष के दाव और दावा दोनों धराशायी करने में अहम भूमिका निभा सकता है।



नई दिल्ली।।जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, शहला रशीद, अनिर्बाण और उमर खालिद के खिलाफ दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने करीब 3 साल पुराने 'देशद्रोह' मामले में चार्जशीट दाखिल किया है।

इसके अलावा चार्जशीट में आक़िब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उमर गुल, रईस रसूल, बशीर भट और बशरत का नाम शामिल है।

कुमार ने पीटीआई से कहा, ‘‘आरोपपत्र राजनीति से प्रेरित है। हालांकि, हम चाहते हैं कि आरोप तय किए जाएं और इस मामले में त्वरित सुनवाई हो ताकि सच्चाई सामने आ सके। हम उन वीडियो को भी देखना चाहते हैं जो पुलिस द्वारा सबूत के तौर पर रखे गए हैं।’’

खालिद ने बेंगलुरू में सेंट जोसेफ कॉलेज में छात्रों के एक समूह को ‘‘संविधान की रक्षा में युवकों की भूमिका’’ विषय पर संबोधित किया। खालिद ने कहा, ‘‘हम आरोपों को खारिज करते हैं। कथित घटना के तीन साल बाद आरोपपत्र दाखिल करने का कदम चुनावों के ठीक पहले ध्यान भटकाने का एक प्रयास है।’’ 

इस मामले में अन्य आरोपियों में आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उमर गुल, रईया रसूल, बशीर भट, बशरत को भी आरोपी बनाय गया है।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि आरोपपत्र की कॉलम संख्या 12 में भाकपा नेता डी राजा की पुत्री अपराजिता, जेएनयूएसयू की तत्कालीन उपाध्यक्ष शहला राशिद, राम नागा, आशुतोष कुमार और बनोज्योत्सना लाहिरी सहित 36 अन्य लोगों के नाम हैं क्योंकि इन लोगों के खिलाफ सबूत अपर्याप्त हैं।
शहला राशिद ने कहा, ‘‘यह पूरी तरह से एक फर्जी मामला है जिसमें अंतत: हर कोई बरी हो जाएगा। चुनावों के ठीक पहले आरोपपत्र दाखिल किया जाना दर्शाता है कि किस प्रकार भाजपा इससे चुनावी फायदा उठानी चाहती है। मैं घटना के दिन परिसर में भी नहीं थी।’’ 

भाकपा नेता राजा ने कहा, ‘‘यह राजनीति से प्रेरित है। तीन साल बाद दिल्ली पुलिस इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर रही है। हम इसे अदालत में और अदालत के बाहर राजनीतिक रूप से लड़ेंगे।’’

जानिए,आख़िर मामला था क्या?

9 फरवरी 2016 में को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुछ अज्ञात युवकों ने संसद पर हमले के दोषी अफ़जल गुरू को मौत की सज़ा दिए जाने के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था।इस विरोध प्रदर्शन में कुछ युवाओं ने कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए थे। इसके बाद कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था।

ज्ञात हो की,दिल्ली पुलिस ने बीजेपी सांसद महेश गिरी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी की शिकायत के बाद दिल्ली के वसंत कुंज थाने में 11 फरवरी, 2016 को 124 ए (राजद्रोह) और 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था।


नवेद शिकोह
दलितों और पिछड़ों की राजनीति में माहिर दल सपा-बसपा दशकों पुरानी तल्खियां भुला कर एक हो गये। दलितों-पिछड़ों को एक छतरी के नीचे लाकर यूपी से भाजपा को साफ किया जा सकता है, इस कॉन्फिडेंस में ये गठबंधन मुस्लिम वोट को लेकर ओवर कॉन्फिडेंस मे है। बसपा प्रमुख मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की साझा प्रेस कांफ्रेंस में गठबंधन की घोषणा में जाति के खूब जिक्र हुए लेकिन मुसस्लिम समाज के किसी भी दर्द की चर्चा नहीं हुई। एक दूसरे के धुर विरोधी रहे अखिलेश और मायावती भले ही आपस में बेहतर सामंजस्य बनाने में कुशलता दिखा रहे हैँ किन्तु दलित-पिछड़ों के साथ खुल कर मुसलमानों का सामंजस्य बनाने में थोड़ा हिचक रहे हैं। वजह ये है कि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सपा-बसपा के पारंपरिक वोटर भाजपा के साथ जिन कारणों से चले गये थे उनमें एक मुख्य कारण ये भी था कि पिछड़ों-दलितों के मन में ये बात जगह कर गयी थी कि सपा और बसपा में मुस्लिम समाज को विशेष तवज्जो दी जाती है। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती ने मुसलमानों को दिल खोलकर टिकट दे दिये। जिसके कारण बसपा को अपने पारंपरिक मतदाताओं का भरोसा खोना पड़ा। इसी तरह सपा की झोली के पिछड़े भी ऐसे ही भावना के साथ भाजपा की तरफ छिटक गये थे।यही कारण है कि बसपा और सपा दोनो दलों के नेता अपने-अपने जातिगत वोटबैंक को संजो कर रखने के लिए अल्पसंख्यक समाज को रिझाने वाले मुद्दों से परहेज करने लगे है। 

आज(12-01-2018) प्रेस कांफ्रेंस में तमाम बातों में जातियों की खूब चर्चा हुई। अखिलेश यादव ने तो भाजपा सरकार पर यहां तक आरोप लगा दिया कि गंभीर मरीज जब इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जाता है तो पहले उसकी जाति पूछी जाती है और फिर उसकी जाति के हिसाब से ही इलाज होता है।
भाजपा सरकार के आलोचकों द्वारा मुस्लिम समाज में खौफ व्याप्त होने से लेकर माॅब लिचिंग की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की जाती रही है। अलीगढ़ में कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गये मुस्लिम युवक की चर्चा से लेकर गो रक्षा के नाम पर पहलू खान और इखलाक जैसों की हत्या की फिक्र भी भाजपा विरोधी खूब करते रहे हैं। किन्तु अल्पसंख्यक समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं, बदहाली या असुरक्षा को लेकर गठबंधन के दोनों नेताओं ने एक भी शब्द नहीं बोला। राजनीति विश्लेषकों का कहना है कि यूपी की आबादी में करीब बीस प्रतिशत मुस्लिम वोट की ताकत पर सपा-बसपा गठबंधन एकाधिकार मानकर अति आत्मविश्वास का शिकार है।
मनोविज्ञानिक पहलू से देखिये तो खासकर यूपी का अल्पसंख्यक वर्ग एक्स्ट्रा केयर का आदि हो गया है। अब से करीब तीस बरस पहले यूपी में कांग्रेस के हिस्से से छीन कर मुसलमानों का भरोसा जीतने वाले मुलायम सिंह यादव ने अल्पसंख्यक समाज के लिए क्या क्या किया वो अलग बात है लेकिन उनके हर भाषण में मुस्लिमपरस्ती की झलक दिखती रहती थी। बसपा के संस्थापक काशीराम ने भी मुलायम सिंह के साथ गठबंधन बनाकर दलितों और मुसलमानों की दो नाली सियासी बंदूक चलाकर भाजपा को शिकस्त देने की रणनीति तय की थी। काशीराम और मुलायम के अतीत के गठबंधन के लम्बे अर्से बाद अब जब मायावती और अखिलेश यादव ने इतिहास दोहराने की कोशिश की है तो इन दोनों तस्वीरों में कुछ फर्क नजर आ रहा है।गठबंधन मुसलमानों को तवज्जो ना देकर जातिगत राजनीति को ज्यादा तरजीह दे रहा है। अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका किसी हद तक लाभ कांग्रेस उठा सकती है। मुसलमानों को लगने लगा है कि यदि गठबंधन जीतता है तो इसमें हमारा बड़ा श्रेय होगा पर इसका लाभ अल्पसंख्यकों को नहीं पिछड़ों - दलितों को ही दिया जायेगा। सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी ही टिप्पणियों में एक शख्स लिखते हैं कि चुनाव से पहले जब गठबंधन हमारा नाम लेवा नहीं है तो जीतने के बाद क्या खाक हमारी जरूरतें पूरी होंगी ! 
गठबंधन और अल्पसंख्यक वर्ग का रूख देखकर लगता है कि यदि कांग्रेस यूपी में पंद्रह - बीस सीटों पर भी लड़ाई में आ गयी तो इन सीटों पर मुसलमानों की पहली पसंद कांग्रेस हो सकती है। जिन जिन सीटों पर कांग्रेस से मुकाबले में आ जायेगी वहां बल्क में मुस्लिम वोट कांग्रेस का मजबूत सहारा बन सकता है। 
अल्पसंख्यक वर्ग फिलहाल दोराहे पर खड़ा है और गठबंधन और कांग्रेस दोनों के हर रवैये पर निगाहें लगाये है। ऊंट किस करवट बैठेगा और यूपी का तकरीबन बीस फीसद मुस्लिम वैट किस दल के विजय रथ का पहिया बनेगा या बिखर जायेगा ये कहना अभी मुश्किल है। पर ये जरूर लग रहा है कि कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के सियासत के दरिया के मझधार में खड़ा यूपी का मुसलमान कभी सपा-बसपा गठबंधन की तरफ देख रहा है तो कभी कांग्रेस की तरफ ताक रहा है।
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