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उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर बुलंदशहर हिंसा मामले में पुलिस ने 18 फ़रार आरोपियों के ख़िलाफ़ कुर्की ज़ब्ती का आदेश दिया है. इसके तहत सभी फ़रार आरोपियों के घर कुर्की का नोटिस चिपकाया गया. फ़िलहाल ये सब फ़रार हैं.

बुलंदशहर में सार्वजनिक जगहों और आस-पास के ज़िलों में इनके पोस्टर भी लगा दिए गए हैं. इन पोस्टरों में अभियुक्तों की तस्वीरें और नाम-पता लिखा हुआ है. इनमें बजरंगदल के एक नेता योगेश राज का नाम भी शामिल है. नोटिस में इन सब को घोषित अपराधी बताया गया है और कहा गया है कि अगर इन लोगों ने एक महीने के अंदर सरेंडर नहीं किया तो उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी.


इस नोटिस को एक सप्ताह पहले जारी किया गया था, और अब इन्हें अभियुक्तों के घर के दरवाज़ों पर चिपका दिया गया है.

ज्ञात हो कि बुलंदशहर में हुई हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और एक स्थानीय युवक सुमित की मौत हो गई थी. इसके बाद पुलिस ने मामले के कुछ आरोपियों के गिरफ़्तार किया जिसमें एक आरोपी जीतू फौजी भी है. इस मामले का मुख्य आरोपी योगेश राज अब भी फ़रार है. 

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने बीते रविवार को दावा किया था कि हिंसा से गुजरे बुलंदशहर की स्थिति अब शांतिपूर्ण है. हालांकि सिंह ने सेना के जवान जितेंद्र मलिक की भूमिका के बारे में संवाददादाओं के सवाल को टाल दिया. मलिक को बुलंदशहर हिंसा में पुलिस इंसपेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या में कथित संलिप्तता को लेकर गिरफ्तार किया गया है.    

डॉ कुणाल सिंह 
रफाल डील पर सुको का फैसला आ चुका है. सरकार को क्लीन चिट से जहाँ इस फैसले से मोदी सरकार खुश नजर आ रही है, वहीँ विपक्ष अब भी हमलावर है. कानून के जानकारों के अनुसार सुको का यह फैसला विवशता भरा है. आइये समझते हैं कि सच्चाई क्या हो सकती है.

मार्च २०१५ में १२६ विमानों की खरीद का अनुरोध प्रस्ताव वापस लेने की बात अदालत के फैसले में है. डील होती है दस अप्रेल दो हजार पंद्रह को, आठ अप्रेल को विदेश सचिव कहते हैं कि एचएएल डील में शामिल है. दस अप्रेल के चौदह दिन पहले यानि मार्च २०१५ में ही रफाल के सीइओ “हाल” के डील में शामिल होने पर ख़ुशी जाहिर करते हैं. इधर सरकार डील हाल से नहीं बल्कि रिलायंश से करी थी. क्या उन्हें मोदी सरकार के डील की खबर नहीं थी या उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया.

भारतीय आफसेट पार्टनर के बारे में सुको ने कहा है कि हमने रिकार्ड पर पर्याप्त सामग्री नहीं देखि है जिससे पता चलता हो कि यह मामला भारत सरकार द्वारा किसी को ( अनिल अम्बानी को) व्यवसायिक लाभ पंहुचाने का हो.

फैसले में लिखा है कि कीमतों को लेकर सीएजी की रिपोर्ट को देखा है जिसे संसद की लोकलेखा समिति को सौंपा गया. लेकिन इस समिति (पीएसी) के अध्यक्ष तो कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खडके हैं. उनकी जानकारी में कोई सीएजी रिपोर्ट है ही नहीं , न उनके पास आया . तो फिर कोर्ट में कौन सी रिपोर्ट कैसे और कहाँ से पहुंची ?

छबीस पन्नों के फैसले में सुको ने कहा है कि की सवालों की समीक्षा उसके अधिकार छेत्र मेंमें नहीं आता है. मतलब अनुतरित सवालों का जबाब कोर्ट भी नहीं खोज सकता. यही वह पॉइंट है जिसमें मोदी सरकार डील के भ्रष्टाचार बचके निकलते दिख रही है.

राहुल गाँधी ने भी फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्हों ने कहा है कि जैसा सुको ने कहा है कि कैग की रिपोर्ट पीएसी द्वारा जांचा गया है वह सार्वजनिक है , तो मैं बता देना चाहता हूँ कि अभी तक किसी नें भी इस रिपोर्ट को देखा तक नहीं है.

कुल मिला कर राफेल डील का बैताल  फिर शक के उसी ठुठे डाल पर जा बैठा है जहाँ पहले बैठा था.


मध्य प्रदेश के वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव में मोदी मैजिक ने भाजपा को 230 में से 165 सीटें दिलाई थीं,लेकिन 2018 आते आते मोदी मैजिक फीकी पर गई और भाजपा 109 सीटों पर सिमटकर रह गई। कांग्रेस को महज 5 सीटें ज्यादा जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी और सपा बसपा के समर्थन के बाद बहुमत का जादुई आंकड़ा के साथ सरकार बनाने का दवा पेश कर दी।

मध्यप्रदेश चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भाजपा उम्मीदवारों की जीत के लिए भरपूर जोर लगाया लेकिन जिन इलाकों में मोदी की रैलियां हुईं उनमें करीब 30 सीटों में बीजेपी को सिर्फ 3 सीटें ही मिलीं।
पीएम मोदी की मध्यप्रदेश में लगभग 10 रैलियां हुईं जिनसे सटी हुई लगभग 30 विधानसभा सीट आती हैं। जिनमें भाजपा महज़ 03 सीट जीत पाई।
  1. सुमावली : कांग्रेस
  2. अंबाह : कांग्रेस
  3. ग्वालियर रूरल : बीजेपी
  4. जौरा: कांग्रेस
  5. अटेर: बीजेपी
  6. दिमनी: कांग्रेस
  7. ग्वालियर ईस्ट: कांग्रेस
  8. भिंड: बीएसपी
  9. लहार: कांग्रेस
  10. डबरा: कांग्रेस
  11. मेहगांव: कांग्रेस
  12. सेंवढ़ा: कांग्रेस
  13. भांडेर: कांग्रेस
  14. गोहद : कांग्रेस 
  15. ग्वालियर साउथ: कांग्रेस
  16. ग्वालियर सदर: कांग्रेस
  17. मुरैना: कांग्रेस
  18. भितरवार: कांग्रेस
  19. जुन्नारदेव: कांग्रेस
  20. अमरवाड़ा विधानसभा सीटः कांग्रेस
  21. पंडौरा विधानसभा सीटः कांग्रेस
  22. चौरई विधानसभा सीटः कांग्रेस
  23. सोंसर विधानसभा सीटः कांग्रेस
  24. छिंदवाड़ा विधानसभा सीटः कांग्रेस
  25. परसिया विधानसभा सीटः कांग्रेस
  26. महाराजपुर विधानसभा सीटः कांग्रेस
  27. चन्‍दला विधानसभा सीटः बीजेपी
  28. राजनगर विधानसभा सीटः कांग्रेस
  29. छतरपुर विधानसभा सीटः कांग्रेस
  30. बिजावर विधानसभा सीटः समाजवादी पार्टी
  31. मलहरा विधानसभा सीटः कांग्रेस


भोपाल।। एक नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश का गठन होने के बाद से कमलनाथ प्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री होंगे।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ 17 दिसंबर को अपराह्न डेढ बजे भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में मध्यप्रदेश के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। 

कमलनाथ शुक्रवार की सुबह करीब 11 बजे राजभवन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मिलने पहुंचे और उन्होंने प्रदेश में सरकार बनाने का दावा पेश कर शपथ की तारीख और समय पर करीब 50 मिनट उनसे चर्चा की।
राज्यपाल से मिलने के बाद बाहर आते वक्त वहां मौजूद मीडिया कर्मियों को प्रफुल्लित कमलनाथ ने बताया, ‘’17 दिसंबर को डेढ़ बजे शपथ ग्रहण समारोह होगा और लाल परेड ग्राउंड में होगा।’’ इसके बाद वह सभी का अभिवादन करते हुए वहां से रवाना हो गए।
इस दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दीपक वाबरिया, अजय सिंह, विवेक तनखा, अरूण यादव एवं सुरेश पचौरी उनके साथ मौजूद थे।
11 दिसंबर को आए चुनाव परिणाम में मध्य प्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 114 सीटें मिली हैं। वह बसपा के दो, सपा के एक और चार अन्य निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बना रही है। पार्टी का दावा है कि उसके पास फिलहाल 121 विधायकों का समर्थन हासिल है।
राज्यपाल ने कमलनाथ को पत्र लिखकर मुख्यमंत्री नियुक्त करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं और कहा कि मध्यप्रदेश विधानसभा के कांग्रेस विधायक दल के निर्वाचित सदस्यों ने सर्व सम्मति से आपको कांग्रेस पार्टी का नेता निर्वाचित किया है। आपको बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों तथा नवनिर्वाचित निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन प्राप्त है।

आनंदीबेन ने आगे लिखा है, ‘‘कांग्रेस विधायीदल को विधानसभा में बसपा, सपा एवं निर्दलीय विधायकों का समर्थन प्राप्त होने से प्रदेश में सबसे बड़े दल के नेता के नाते भारत के संविधान के अनुच्छेद 164 के अंतर्गत आपको (कमलनाथ) मुख्यमंत्री नियुक्त करती हूं तथा मंत्रिमंडल का गठन करने के लिए आमंत्रित करती हूं।’’


ब्दुल रशीद 
ज्ञान की जननी भारत में दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता है,भारत विश्व गुरु है,ऐसी बाते सुन कर और पढ़ कर मन प्रफुल्लित हो उठता है। साथ ही एक सवाल मन में उठता है आख़िर ऐसा कब होगा? क्या मौजूदा राजनीती ऐसा कोई कोशिश कर भी रही है? जनता के हर मुद्दों की व्याख्या राष्ट्रवाद के चश्में को पहनकर करने वाले टीवी डिबेट पर ज्ञान बघारते प्रवक्ताओं और सत्ता के लिए संवैधानिक पदों पर बैठे कुछ तथाकथित नेताओं की भाषाओं को सुन कर ऐसा तो नहीं लगता,क्योंकि अभद्र और धमकी वाली भाषा गुंडे मवालियों की तो हो सकती है लेकिन ज्ञान की जननी कि संतान की तो कतई नहीं हो सकती। 

ऐसे लोग के पास ज्ञान का थोड़ा भी अंश होता तो उन्हें जरुर यह जानकारी होती की भारत धर्मनिरपेक्ष देश है और यह देश संविधान से चलता है जो, भारत में रहने वाले हर भारतीयों को सामान अधिकार देता है। और यह भी पता होता की महज़ पहचान के आधार पर किसी समुदाय को देश से निकलना और गद्दार कहना असंवैधानिक है। 

अब एक नया विचार लोगों के मन में बैठाया जा रहा है की,कानून संविधान और संवैधानिक संस्थाएं यह सब जनता के लिए है और लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है,लेकिन यह आधा सच है जो न केवल लोकतंत्र के लिए बल्कि मानवता के लिए भी घातक है। ज़रा सोंचिए,जंगलो में कौन सर्वोच्च होता है,वही जो सबसे बड़ा ताकतवर समूह होता है,जो अपने ताक़त के दम पर अपनी मनमर्जी करता है,जिसे चाहे जहां चाहे घेर कर क्रूरतापूर्वक मार डाले,न कोई क़ायदा,न कोई कानून और न कोई जवाबदेही,वहां सभ्यता संस्कृति,परम्पराओं और संवेदनाओं का कोई स्थान नहीं होता है, यही फर्क है इंसान और जानवर में। दरअसल लोकतंत्र में जनता को सर्वोच्च इसलिए कहा गया है के वह अपने वोट के द्वारा चुनकर नेताओं को सत्ता के शिखर पर पहुंचा कर संवैधानिक रूप से देश चालने की बागडोर दे सकती है तो असंतुष्ट होने पर बागडोर छीन भी सकती है। 
अर्थात संवैधानिक पद पर बैठे हर व्यक्ति का दायित्व है की वह देश के लिए,देश हित के लिए और देशवासियों के लिए काम करे,लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकार के रूप में पत्रकारिता करे और जनता उनके क्रियाकलापों को समीक्षा करती रहे,ताकी जब पांच साल बाद नेता अपने कार्यों का रिपोर्ट कार्ड लेकर चुनाव रूपी परीक्षा देने आए तो जनता कार्यों के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर पास फेल कर सके। 
पांच विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं,इन नतीजों में न कोई लहर दिखा न कहर,न शब्दवीरों की वीरता काम आई न ही एक रंगा पाखंड की पाखंडता काम आई,पांचो राज्यों के चुनावी नतीजे ने यह मिथ्य भी तोड़ दिया कि भारतीय लोकतंत्र में न कोई राजनीतिक पार्टी चंद चुनाव जीत कर ख़ुद को अजेय बना सकता है न ही कोई राजनीतिक पार्टी चंद चुनाव हार अस्तित्वहीन हो सकता है। जिस भाजपा में नेताओं की फ़ौज थी वह भाजपा हार गई और जिस कांग्रेस को नेताविहीन कहा जा रहा था वह तीन राज्यों में चुनाव जीत गई, लेकिन मिज़ोरम हार गई और दोनों राष्ट्रीय पार्टी तेलंगाना में क्षेत्रीय पार्टी के सामने बौनी हो गई।

कुल मिला कर जनता जीत गई और यह संदेश भी दे दिया की कोई भी राजनीतिक पार्टी बहुत दिनों तक जुमलों के सहारे ठग नहीं सकती। सरकार यदि अपने वायदों को पूरा नहीं करती और जनता के समस्याओं को दरकिनार कर भावनाओं को भड़का कर वोट हासिल करना चाहती है तो यह भ्रम है। राजनीती में निति विहीन का मतलब जनता समझती है और एक हद तक इंतज़ार करती है और फिर फैसला सुनाने में कोई कोताही नहीं करती। 


अजीत नारायण सिंह
वाराणसी।। अगले साल जनवरी माह मे होने वाले अप्रवासी भारतीय सम्मेलन को लेकर 13दिसंबर2018 नगर निगम ने निकाला स्वच्छता अभियान रैली। 

रैली को महापौर श्रीमती मृदुला जायसवाल ने हरीझंडी दिखा कर शुरुआत किया यह रैली नगर निगम, मलदहिया, चौकाघाट, अर्दलीबाजर, गिलटबाजर, भोजूबीर होते हुए जे.पी.मेहता पर समाप्त हुआ। रैली मे लोगों को साफ सफाई अभियान आगे बढ़ाने की प्रेरणा दे रहे थे। 

यह रैली अप्रवासी भारतीय दिवस पर वाराणसी में एन.आर.आई. का जमावड़ा होने जा रहा है। इसके साथ ही देश मे इन्वेस्टमेंट की भी संभवानाएं बनेंगी। नगर निगम की तरफ से स्वच्छता सर्वेक्षण 2019 में अपनी रैंकिंग को सुधारने और प्रवासी भारतीय सम्मेलन में स्वच्छता बनाए रखने के लिए रैली में अपील की गयी है। 

वाराणसी नगर निगम स्वच्छता अभियान को मुंह चिढ़ाता गंदगी का अंबार। 

नगर निगम के साथ ही बिजली विभाग एवं बी.एस.एन.एल.का कार्यालय हैं कार्यालय के सामने नगर निगम के स्वच्छता अभियान को मुंह चिड़ाता कूड़े का अम्बार हमेशा लगा रहता हैं जिससे वहां से आने-जाने वाले लोगों को भयंकर दुर्गंध का सामना करना पड़ता हैं साथ ही वहां बने शौचालय का हाल यह है कि यदि कोई शौच को जाय तो कई बीमारियों को साथ लेकर वापस जाय। साथ ही उस रास्ते पर नगर निगम की कुड़ा गाड़ी दो से तीन रो मे खड़ा कर दिया जाता हैं जिससे वहां से आने-जाने वाले लोगों को आवागमन मे काफी परेशानीयों का सामना करना पड़ता हैं। 

महज़ अभियान और रैली से खबरों में भले ही वाराणसी स्वच्छ हो जाए लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदल सकता। यह बात नगर निगम के मातहत को समझ में जब तक नहीं आती तब तक बस ऐसे ही खानापूर्ति होती रहेगी।

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