सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं

उर्दू



   फ़िरदौस ख़ान
@उर्जांचल टाइगर 
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सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं

मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं

मशहूर शायर हसन काज़मी साहब का यह शेअर देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए काफ़ी है. हालांकि इस मुल्क में उर्दू के कई अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को अमूमन ईद-बक़रीद, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतें अख़बारों के लिए परेशानी का सबब बनी रहती हैं. 

उर्दू अख़बारों का इतिहास काफ़ी पुराना है. सबसे पहले 1785 में इंग्लिश साप्ताहिक कलकत्ता गैज़ेट में फ़ारसी में एक कॊलम शुरू किया गया था, जिसमें दिल्ली और लाल क़िले की ख़बरें होती थीं. उर्दू का पहला अख़बार जाम-ए-जहां-नमाह 27 मार्च 1822 को कोलकाता में शुरू हुआ था. इस साप्ताहिक अख़बार के संपादक मुंशी सदासुख मिर्ज़ापुरी थे. उर्दू मीडिया ने जंगे-आज़ादी में अहम किरदार निभाया. इसकी वजह से ब्रिटिश सरकार ने 1857 पर उर्दू प्रेस पर पाबंदी लगा दी. 1858 में कोलकाता से ही उर्दू गाइड नाम से उर्दू का पहला दैनिक अख़बार शुरू हुआ. इसके संपादक मौलवी कबीर-उद्दीर अहमद ख़ान थे. 1822 के आख़िर तक कोलकाता से फ़ारसी के दो अख़बार शाया होते थे. फ़ारसी साप्ताहिक मीरत-उल-अख़बार के संपादक राजा राममोहन राय थे. 1823 में मनीराम ठाकुर ने शम्सुल अख़बार शुरू किया, जो सिर्फ़ पांच साल ही ज़िन्दा रह पाया. 

ब्रिटिश शासनकाल में हिन्दुस्तानी भाषाओं के अख़बार की अनदेखी की गई. 1835 में हिन्दुस्तानी भाषाओं के सिर्फ़ छह अख़बार ही शाया होते थे, जो 1850 में 28 और 1878 में 97 हो गए. इनकी प्रसार संख्या क़रीब डेढ़ लाख थी. हिन्दुस्तानी अख़बारों की अधिकारिक जानकारी 1848 से मिलती है, जब 26 अख़बार शाया होते थे. इनमें 19 उर्दू में, तीन फ़ारसी में, तीन हिन्दी में और एक बंगला भाषा का अख़बार शामिल था. उर्दू अख़बारों ने 1857 की जंगे-आज़ादी में अहम किरदार अदा किया. इसकी वजह से उर्दू अख़बारों को नियंत्रित करने के लिए जून 1857 में गवर्नर जनरल द्वारा एक एक्ट लाया गया. इसका मक़सद उर्दू अख़बारों के प्रसार को रोकना था. इस एक्ट के मुताबिक़ प्रेस के लिए सरकार से लाइसेंस लेना लाज़िमी था. इस एक्ट की आड़ में संपादकों और प्रकाशकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज कर उन्हें तंग किया गया. फ़ारसी अख़बार सुल्तान-उल-हक़ को कोलकाता के सुप्रीम कोर्ट में तमाम इल्ज़ामात का सामना करना पड़ा और उसका लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया. इसी तरह गुलशन-ए-नौबहार को बंद कर दिया गया और रायज़ुल अख़बार के साथ भी ऐसा ही किया गया. फ़ारसी साप्ताहिक मुर्तज़ई के संपादक को पेशावर जेल भेज दिया गया. यह उर्दू अख़बारों के लिए एक बुरा दौर था. 1858 में 35 उर्दू अख़बार शाया हो रहे थे. 1857 की जंगे-आज़ादी के बाद उर्दू अख़बार फिर से लोकप्रिय होने लगे, जिनमें लखनऊ का अवध अख़बार और अवध पंच, अलीगढ़ का साइंटिफ़िक, ग़ज़ट और तहज़ीब-उल-अख़्लाक़, दिल्ली का अकमालुल, लाहौर का पंजाब अख़बार, मद्रास का शम्सुल अख़बार, बॊम्बे का काशफ़ुल, बंगलौर का क़ासिम-उल-अख़बार और हैदराबाद का असीफ़ुल अख़बार शामिल है. इनमें से लखनऊ का अवध अख़बार लंबे अरसे तक शाया हुआ. इस दौरान 18 नई पत्रिकाएं भी शुरू हुईं, जिनमें 11 उर्दू के रिसाले शामिल हैं. अलहिलाल ऐसा पहला उर्दू अख़बार था, जिसने तस्वीरों को भी प्रकाशित किया.

1873 तक उर्दू काफ़ी तादाद में उर्दू अख़बार और पत्रिकाएं शाया होने लगीं. सरकार ने भी अख़बारों की प्रतियां ख़रीदना शुरू कर दिया. उत्तर-पश्चिम प्रांत की सरकार ने 1876 में इस व्यवस्था को बंद कर दिया. इसके साथ ही कई अख़बार भी बंद हो गए. 1884-85 के दौरान उर्दू के 117 अख़बार शाया हो रहे थे. इनकी प्रसार संख्या भी अच्छी थी. 

1891 में 16,256 

1901 में 23,747 

1911 में 76,608 और 

1922 में 1,40,486 

भारतीय रिसर्च इंस्टीट्यूट नेशनल डॊक्यूमेंटेशन ऒन मास कम्युनिकेशन की एक रिपोर्ट में जीडी चंदन का कहना है कि देश के बंटवारे, संकीर्णता और सियासी पूर्वाग्रह की वजह से उर्दू अख़बारों को नुक़सान पहुंचा. बंटवारे के दौरान उर्दू जानने वाली एक बड़ी आबादी यहां से पलायन कर गई और नई पीढ़ी के बहुत कम लोग ही उर्दू जानते हैं. इसका सीध असर अख़बारों की प्रसार संख्या पर पड़ा. प्रदेश सरकारों ने उर्दू की तरक़्क़ी पर ध्यान नहीं दिया.

दरअसल, बांग्लोदश बनने के बाद उर्दू अख़बारों की तरक़्क़ी अचानक रुक गई. उर्दू अख़बारों को बंगाली सरकार से काफ़ी उम्मीदें थीं. यह बात सही है कि उर्दू अख़बार जनता की आवाज़ उठाते थे. उर्दू अख़बारों को सरकार से मदद मिलती थी. बाद में सरकार ने उर्दू अख़बारों में दिलचस्पी लेना कम कर दिया, जिसका सीधा असर अख़बारों की माली हालत पर पड़ा. उर्दू अख़बार सस्ते काग़ज़ पर छापे जाने लगे. अख़बारों का स्टाफ़ कम हो गया. इसकी वजह से पाठकों को कई अहम और ताज़ा ख़बरें नहीं मिल पाती थीं. नतीजतन, उर्दू के पाठक दूसरी भाषाओं के अख़बारों की तरफ़ जाने लगे. हालात ये हो गए कि कई अख़बार बंद होने की कगार पर पहुंच गए, जिनमें अख़बारे-मशरिक़, आज़ाद हिन्द, आबशार और साप्ताहिक नशेमन और ग़ाज़ी शामिल थे. आज भी उर्दू अख़बारों की हालत अच्छी नहीं है.

आज़ादी से पहले अंग्रेज़ों ने हिन्दुस्तानी भाषाओं को पनपने नहीं दिया और आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी के बढ़ते चलन की वजह से लोग अपनी भाषा से दूर हो रहे हैं. उर्दू अख़बारों की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है कि उर्दू अख़बारों को सरकारी मदद मिले और उनकी प्रसार संख्या बढ़ाई जाए. और इस सबके लिए उर्दू का प्रचार-प्रसार ज़रूरी है. हालांकि देश में उर्दू अकादमियों की कोई कमी नहीं है और उर्दू सिखाने के कई संस्थान भी हैं, जिनमें उर्दू अकादमी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जमीअत उलेमा-ए-हिन्द, अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू और क़ौमी काउंसिल बराए-फ़रोग़-ए-उर्दू शामिल हैं. मदरसों में तो शिक्षा का माध्यम ही उर्दू है. यह कहना ग़लत न होगा कि उर्दू महज़ मदरसों तक ही सिमटकर रह गई है. जब तक उर्दू को रोज़गार की भाषा नहीं बनाया जाएगा, तब तक इसकी तरक़्क़ी नहीं हो सकती. किसी भाषा को ज़िन्दा रखने का काम सरकार के साथ ही उस ज़बान के लोगों को भी है, जिनकी वो मातृभाषा है. इसलिए यह ज़रूरी है कि हम अपनी मातृभाषा को ज़िन्दा रखने के लिए आने इसके प्रचार-प्रसार पर ज़ोर दें. अपनी मातृभाषा के अख़बार या अन्य साहित्य पत्र-पत्रिकाएं ख़रीदें. ग़ौरतलब है कि 1991 की जनगणना के मुताबिक़ चार करोड़ 34 लाख 6 हज़ार 932 उर्दू भाषी लोग थे, जबकि इनकी वास्तविक संख्या 12 करोड़ बताई जाती है. उर्दू उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा बोली जाती है. इसके बाद बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक का स्थान आता है. यह जम्मू-कश्मीर की सरकारी भाषा है. 

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सरकार उर्दू के ज़रिये अपने पड़ौसी देशों के साथ बेहतर तालमेल क़ायम कर सकती है. भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं और उर्दू पड़ौसी देशों के साथ आपसी सद्भाव बढ़ाने में अहम किरदार निभा सकती है. 

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