डेंगू रोधी धूम्र अभियान - प्रभाव कम दुष्प्रभाव ज्यादा!



नई दिल्ली ।।दिल्ली में डेंगू के 12,500 से अधिक मामलों के सामने आने के बीच एक एनजीओ ने आज दावा किया कि शहर में जारी डेंगू रोधी धूम्र अभियान मच्छर जनित बीमारी से लड़ने में ‘‘प्रभावी नहीं’’ है बल्कि इससे स्वास्थ्य पर ‘‘खतरनाक’’ असर पड़ रहा है क्योंकि धूम्र अभियान में इस्तेमाल होने वाली गैस में ‘95’ फीसदी डीजल होता है। धूम्र अभियान से केवल सुरक्षा का एक ‘झूठा’ अहसास होने की बात करते हुए सेंटर फार साइंस एंड एनवायरंमेंट (सीएसई) ने कहा है कि यह लोगों को उनके स्वास्थ्य की कीमत पर ‘खुश’ करने का मामला है।

इसके साथ ही संगठन ने सरकार से स्वच्छ वातावरण और साफ सफाई के जरिए व्यवस्थित रोकथाम उपाय पर ध्यान केंद्रित करने को कहा है। सीएसई का आकलन है कि इस वर्ष धूम्र अभियान के लिए 4.5 लाख लीटर डीजल का इस्तेमाल किया गया है जो प्रतिदिन 4500 लीटर डीजल बनता है। इतना डीजल एक दिन में दो हजार कारों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले डीजल के बराबर है। चिकित्सा विशेषज्ञों का हवाला देते हुए सीएसई ने कहा है कि डीजल धुएं को कीटनाशकों के साथ सांस के साथ अंदर लेने से श्वास संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों में दमे या ब्रोंकाइटिस की समस्या और गहरी हो सकती है जबकि गर्भवती महिलाएं, छोटे बच्चे तथा बुजुर्ग लोगों को इससे कहीं अधिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।



सीएसई के उप महानिदेशक चंद्र भूषण ने कहा, ''समुदाय के लोगों के आने के बाद हमने इस मुद्दे को देखा। हमने पाया कि धूम्र अभियान डेंगू पर रोक लगाने में प्रभावी नहीं है और इसका लोगों के स्वास्थ्य पर खराब असर पड़ता है।’’ दिल्ली में 17 अक्तूबर तक डेंगू के 12, 531 मामले दर्ज किए गए और 32 लोगों की जान गयी जो कि वर्ष 1996 के बाद से सबसे अधिक आंकड़ा है। सीएसई का कहना है कि धूम्र अभियान से केवल वयस्क मच्छर मरता है लेकिन लारवा पर कोई असर नहीं होता जो प्रजनन का स्रोत है।

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