दशहरा-असत्य पर सत्य की जीत

दशहरा



न्यूज़ डेस्क ।।उर्जांचल टाईगर।। हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार दशहरा को विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को पड़ता है। मान्यता है कि प्रभु श्रीराम ने इस दिन रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी। असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाए जाने वाले इस त्योहार पर देश भर में बड़ी धूम देखने को मिलती है और 9 दिनों से चल रही विभिन्न रामलीलाओं में दशहरे के दिन रावण वध के दृश्य का मंचन देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मां भगवती के विजया स्वरूप पर इसे विजयादशमी भी कहा जाता है। यह त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति तथा शरद के आरम्भ का सूचक है। इस दिन क्षत्रिय विशेष रूप से शस्त्र पूजन करते हैं, ब्राह्मण सरस्वती पूजन और वैश्व बही पूजन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक काल होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। प्राचीन काल में तो राजा इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण−यात्रा के लिए निकलते थे।

बंगाल में यह उत्सव दुर्गा पर्व के रूप में ही धूमधाम से मनाया जाता है। देश के कोने−कोने में इस पर्व से कुछ दिन पहले से ही रामलीलाएं शुरू हो जाती हैं। सूर्यास्त होते ही रावण, कुम्भकरण तथा मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं। दुर्गा पूजन, अपराजिता पूजन, विजय−प्रणाम, शमीपूजन तथा नवरात्र पारण, दुर्गा प्रतिमा विसर्जन इस पर्व के महान कर्म हैं। दशहरे पर देश के विभिन्न भागों में मेले लगते हैं लेकिन मैसूर और कुल्लू के दशहरे की बात ही निराली होती है। बड़ी संख्या में पर्यटक यहां के दशहरा आयोजन को देखने पहुंचते हैं। कर्नाटक के मैसूर शहर में विजयादशमी के दिन दीपमालिका से सज्जा की जाती है। मैसूर में हाथियों का श्रृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य जुलूस निकाला जाता है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरे से एक सप्ताह पूर्व ही इस पर्व की तैयारी आरंभ हो जाती है। स्त्रियां और पुरुष सभी सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित होकर तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े, बांसुरी आदि लेकर अपने ग्रामीण देवता का धूमधाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। इस दौरान देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। पहाड़ी लोग अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। यह जुलूस नगर नगर परिक्रमा करता है और फिर देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ होता है।

कथा− एक बार माता पार्वतीजी ने भगवान शिवजी से दशहरे के त्योहार के फल के बारे में पूछा। शिवजी ने उत्तर दिया कि आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल में तारा उदय होने के समय विजय नामक काल होता है जो सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला होता है। इस दिन यदि श्रवण नक्षत्र का योग हो तो और भी शुभ है। भगवान श्रीराम ने इसी विजय काल में लंका पर चढ़ाई करके रावण को परास्त किया था। इसी काल में शमी वृक्ष ने अर्जुन का गांडीव नामक धनुष धारण किया था।

एक बार युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्णजी ने उन्हें बताया कि विजयादशमी के दिन राजा को स्वयं अलंकृत होकर अपने दासों और हाथी−घोड़ों को सजाना चाहिए। उस दिन अपने पुरोहित को साथ लेकर पूर्व दिशा में प्रस्थान करके दूसरे राजा की सीमा में प्रवेश करना चाहिए तथा वहां वास्तु पूजा करके अष्ट दिग्पालों तथा पार्थ देवता की वैदिक मंत्रों से पूजा करनी चाहिए। शत्रु की मूर्ति अथवा पुतला बनाकर उसकी छाती में बाण मारना चाहिए तथा पुरोहित वेद मंत्रों का उच्चारण करें। ब्राह्मणों की पूजा करके हाथी, घोड़ा, अस्त्र, शस्त्र का निरीक्षण करना चाहिए। जो राजा इस विधि से विजय प्राप्त करता है वह सदा अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करता है।
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