पढ़िए शातिर मजदूर और रिश्वतखोर पुलिस का खेल


भोपाल। यह एक ऐसा मामला है जिसने सारे उत्तराखंड में मप्र और मप्र पुलिस को बदनाम करके रख दिया। मामला एक शातिर मजदूर का है जिसने केदारनाथ आपदा में अपने जिंदा बच्चों को मृत बताया और 7 लाख रुपए मुआवजा हड़प गया। फिर बच्चों का नाम बदलकर नए प्रमाणपत्र भी बनवा लिए। छतरपुर की राजनगर पुलिस को इस खेल का पता चला लेकिन टीआई ने 1 लाख रुपए रिश्वत ली और मामला दबा दिया। अब हरिद्वार पुलिस ने इस खेल से पर्दा उठाया है।

हरिद्वार के नगर पुलिस अधीक्षक नवनीत सिंह भुल्लर ने बताया कि रविवार देर रात दंपत्ति में विवाद की सूचना पर पहुंचे पुलिसकर्मी विष्णुघाट के पास गंगा किनारे रह रहे एक दंपति और उनके पांच बच्चों को नगर कोतवाली ले आए। पूछताछ में मुआवजे के नाम पर हुए खेल का पर्दाफाश हुआ।

पूछताछ में यह बात सामने आई कि मध्यप्रदेश के गांव रामनगर, भभुवा तहसील छतरपुर थाना राजनगर जिला छतरपुर निवासी रामक्रपाल एवं उसकी पत्नी विद्या ने जून वर्ष 2013 में केदारनाथ में 15/16 जून को आई आपदा में अपनी नाबालिग बेटी ममता एवं बेटे अजय को लापता बताते हुए हरिद्वार के मेला नियंत्रण कक्ष मे सूचना दी थी। सितंबर माह में उसी के आधार पर रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई। बेटा-बेटी के मृत्यु प्रमाणपत्र भी ले लिए। नवंबर माह में प्रदेश सरकार ने मुआवजे के नाम पर लाखों रुपये का चेक दंपति के पते पर भेजा। यही नहीं दंपति ने मध्यप्रदेश सरकार से भी मुआवजे के नाम पर कई लाख रुपये ले लिए।

दोनों राज्य की सरकारों से सात लाख का मुआवजा लेने की बात सामने आई है। दंपति ने ही यह योजना मिलकर बनाई थी। आपदा के दौरान दंपति हरिद्वार में ही था और पांचों बच्चे उन्हीं के ही साथ थे। बीच-बीच में भी ये परिवार यहां आता जाता रहा। अब पंद्रह दिन पहले ही दंपति अपने बच्चों के साथ यहां आकर रहने लगा था।

मजदूर के ​शातिर दिमाग से हर कोई हैरान

पांचवीं की जमात तक पढ़े लिखे रामकृपाल के दिमाग की करामत जानकार हरिद्वार पुलिस पुलिस भी हक्की बक्की रह गई। उसने दो-दो राज्य सरकारों से मुआवजा लेने के बाद कागजात में मरे अपने बेटा-बेटी का नाम बदलकर उन्हें फिर से जिंदा भी कर डाला।
  • गरीब तबके से ताल्लुक रखने वाले रामकृपाल ने यह साबित कर दिखाया कि किस तरह सिस्टम को बेवकूफ बना सकते है।

पेशे से दिहाड़ी मजदूर रामक्रपाल वर्ष 2013 में यहां ही रह रहा था। उसने मेला नियंत्रण कक्ष में पहुंचकर यह बताया कि वह केदारनाथ में रहकर ही मजदूरी करता था और आपदा में उसका एक बेटा-बेटी बह गए। फिर वह यहां से अपने बच्चों को लेकर वापस मध्य प्रदेश चला गया। स्थानीय स्तर से यह सूचना फिर डीजीपी के कार्यालय में बने कंट्रोल रूम को पहुंची। सितंबर में गुमशुदगी दर्ज हुई। पुलिस किस तरह से विवेचना करती है, ये भी इस केस के खुलासे से उजागर हुआ है। जिंदा बच्चों को मरा बता डाला। राज्य सरकार ने मुआवजे का चेक दे दिया।

इसके बाद भी उसका दिमाग चलना बंद नहीं हुआ। मध्यप्रदेश पहुंचकर ही स्थानीय प्रशासन को अपना दुखड़ा सुनाया। उत्तराखंड में बेटा-बेटी के लापता होने के बाद लिखी गई एफआईआर की कॉपी की बदौलत मुआवजा लेने का खेल खेला। यह सब कर चुके रामकृपाल ने फिर मध्यप्रदेश से ही स्थायी निवास प्रमाण पत्र बनवाकर अपने मरे बच्चों को नाम बदलकर जिंदा कर डाला। अब आधार कार्ड भी बना लिया था। यही नहीं राशन कार्ड में भी ममता को पूजा और अजय को अमर घोषित कर दिया।

पता है उसे कागजात का वजूद

बेहद शातिर रामकृपाल भले ही कम पढ़ा लिखा है लेकिन वह यह बखूबी जानता है कि सरकारी कागज कितने काम के होते है। उसके कब्जे से आधार कार्ड, राशन कार्ड, स्थायी निवास, मृत्यु, जाति, आय प्रमाणपत्र मिले है। इसके अलावा हर वह कागज मिला है, जो मुआवजे लेने में कारगार रहा है। हालांकि उसका कोई बच्चा कभी स्कूल ही नहीं गया।

मप्र पुलिस ने रिश्वत ली और दबा दिया मामला

जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश की छतरपुर पुलिस यह पता कर चुकी थी कि रामकृपाल ने मुआवजे का खेल किया है। तब वहां के राजनगर थाने की पुलिस ने जेल जाने का खौफ दिखाकर उससे एक लाख रुपये ले लिए। इसके बाद रामकृपाल ने सहारा कंपनी में करीब दो लाख का निवेश कर दिया और एक खाते में साठ हजार रुपये दर्ज कराए। कुछ रकम उसके सालों ने ली और एक लाख रुपये एक जमीन के मामले में डूब गए।

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