उगते सूरज को अर्घ्य देने के साथ महापर्व छठ संपन्न

महापर्व छठ


राजेन्द्र अग्रहरी (सिंगरौली ब्यूरो)@उर्जांचल टाईगर।।बिहार राज्य से शुरू छठ  पूजा आज लगभग पुरे देश में बड़े उत्साह एवं मान्यताओ के साथ मनाया जाता है। बड़े बुजुर्गो की माने तो दीपावली के छठवे दिन के बाद मनाये जाने वाले इस पर्व को बड़े भाव पूर्वक मनाया जाता है।
2015 में नवंबर 17 के दिन सूर्य देव को अर्घ्य देकर छठ पूजा का त्यौहार मनाया गया। छठ पूजा के व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना गया है। ज़्यादातर बिहार व उत्तर प्रदेश के लोग इस त्यौहार को मनाते हैं। 

  • संध्या अर्घ्य के लिए सूर्यास्त का समय (17.11.15) - 05:27
  • प्रातः अर्घ्य के लिए सूर्योदय का समय (18.11.15) - 06:45

छठ पूजा 4 दिनों तक मनाया जाने वाला एक ख़ूबसूरत त्यौहार है। इस त्यौहार में जीवनशक्ति के प्रतीक, सूर्य देव की पूजा अर्चना कि जाती है। हर दिन का अपना महत्व होता है। पहले दिन को नहाए खाए कहते हैं, दूसरे दिन को खरना, तीसरे दिन को संध्या अर्घ्य और चौथे दिन को परना (सूर्योदय अर्घ्य) कहा जाता है। भारतीय लोग कई तरह के व्रत रखते हैं, पर छठ पूजा सबसे मुश्किल व्रतों में से एक है। भक्तगण (ज़्यादातर महिलाएँ) इस त्यौहार में सूर्य देव और उनकी पत्नी छठी मैय्या (जिनको वेदों में ऊषा भी कहा गया है) की पूजा करते हैं। साथ ही अपने परिवार व प्रियजनों के लिए मंगलकामना करते हैं। 
यह व्रत बहुत ही सावधानी व साफ़-सफ़ाई से रखा जाता है। इस त्यौहार की तैयारियाँ एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती हैं। भक्तजन अपना ज़्यादा ख़याल रखते हैं जिससे वे छठ की पूजा सही ढंग से कर पाएँ।

आइये अब जानते हैं कि कैसे होती है इस त्यौहार की तैयारियाँ। 

नहाई खाई (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी) - नवंबर 15: नहाई-खाई का अर्थ होता है - पवित्र स्नान करने के बाद लिया गया भोजन। लोग अपने पास वाली नदी या तालाब में स्नान लेकर शरीर व आत्मा की शुद्धि करते हैं। इस दिन भक्त रोटी और लौकी की सब्ज़ी खाते हैं जिसे बहुत ही साफ़-सफ़ाई से बनाया जाता है। 

खरना (कार्तिक शुक्ल पंचमी) - नवंबर 16: दूसरे दिन को खरना कहते हैं। इस दिन महाव्रती न तो कुछ खाते हैं और न ही पीते हैं। शाम को गुड़ और चावल से खीर बनाई जाती है और रोटी नए बर्तन में पकाई जाती है। भक्तगण इस खीर को प्रसाद के रूप में फलों के साथ खाते हैं और इस प्रसाद को बाँटते भी हैं। इस दौरान छठ पूजा के गाने गए जाते हैं। 

संध्या अर्घ्य (कार्तिक शुक्ल षष्ठी) - नवंबर 17: इस दिन का व्रत भी निर्जल ही किया जाता है और यह दिन सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। लोग अपने घर के पास वाली नदी या तालाब के घाट को मोमबत्ती व दीयों से सजाते हैं। टोकरियाँ सजाई जाती हैं जिनमें फल, ठेकुआ (गेहूँ के आँटे व गुड़ से बनाया गया खाद्य पदार्थ), मूली, जटायुक्त नारीयल, पान के पत्ते, लौंग, इलाईची, इत्यादि रखे जाते हैं। सूर्यास्त के समय सूर्यदेव की पूजा की जाती है और जल में खड़े होकर सूर्यदेव को संध्या अर्घ में यह सब चीज़ें अर्पित की जाती हैं। 

सूर्योदय अर्घ्य(कार्तिक शुक्ल सप्तमी) - नवंबर 18: सूर्योदय अर्घ, जिसे परना भी कहा जाता है, इस त्यौहार का आखिरी संस्कार है। इस दिन लोग सूर्योदय से पहले पूजा घाट पहुँचकर छठ के गीत गाते हैं और फिर सूर्योदय होते ही सूर्य को अर्घ देते हैं। इसके पश्चात सब लोगों में प्रसाद बाँटा जाता है। महाव्रती गुड़ व अदरक खाकर अपना व्रत संपन्न करते हैं। 
सच्ची श्रद्धा से की गई सूर्य देव की पूजा भक्तों को सुख-समृद्धि प्रदान करती है। समय के साथ छठ पूजा का त्यौहार पूरी दुनिया में ख्याति प्राप्त कर रहा है। हम आशा करते हैं कि इस छठ पूजा में आपके घर सूर्य देव की कृपा बरसे। 

सिंगरौली जिले में एनटीपीसी विद्धुत कंपनी एवं एनसीएल की कोयले के खदान में कार्य करने वाले भारत वर्ष के हर कोने के है इस लिए छट का ये त्यौहार यहाँ और भी लोक प्रिय हो गया है। सिंगरौली प्रसाशन द्वारा छट पूजा करने वाले व देखने वालो के सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किया गया ताकि कोई अप्रिय घटना न घटे।

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