धार्मिक, आस्तिक और नास्तिक

दीपावली


By-डॉ.पुरुषोत्तम मीणा'निरंकुश'

भारत का सबसे बड़ा त्यौहार——दीपावली——जिसे अनेक लोग उनके ईश्वर राम के वनवास से अयोध्या लोटने की खुशी में मनाते हैं, जबकि नवजागरण के कारण भारत की बहुसंख्यक अनार्य आबादी के जागरूक लोग, दीपावली को अनार्यों की हार और आर्यों की जीत के रूप में निरूपित करके इसको सार्वजनिक रूप से मनाने का विरोध भी करने लगे हैं। ऐसे लोगों को अधार्मिक, हिन्दू—विरोधी और नास्तिक कहकर, उनकी आलोचना की जाती है। अत: इस विषय पर विचार किया जाना समीचीन है कि आखिर यह झमेला क्या है? धार्मिक, आस्तिक और नास्तिक का चक्कर क्या है?
यह एक कड़वा सच है कि भारत की सम्पूर्ण व्यवस्था पर हजारों सालों से आर्य—मनुवादियों का बलात् कब्जा रहा है। जिसके कारण आर्य—मनुवादियों की धार्मिक चाशनी में लिपटे हर एक उत्सव और त्यौहार के समय हर एक आम-ओ-खास आश्चर्यजनक रूप से आस्थावान, धार्मिक और ईश्वरीय प्रतिरूप दिखने की कोशिश करते देखा जाता है। जबकि इससे पहले और बाद में उनके धरातलीय व्यवहार और दैनिक आचरण में कोई अंतर नहीं देखा जाता है।
कामचोर, हरामखोर, कमीशनखोर और रिश्वतखोर बा-कायदा अपनी इस व्यवस्था को चिरस्थाई बनाये रखना चाहते हैं। यह उनकी धार्मिंकता का व्यावहारिक और नंगा पहलु है। इसी प्रकार से कालाबाजारी और मिलावट करने वाले भी नहीं चाहते कि उनके कारोबार में कोई ताकझांक करे, यहां तक कि ईश्वर भी नहीं।
स्त्री, दलित, आदिवासी, दमित, पिछड़े, वंचित, विमुक्त, घुमंतू, अल्पसंख्यक आदि कमजोर तबकों को निशाने पर रखने वाले आर्य-मनुवादी-वैदिक-संस्कृति के संवाहक और पोषक नहीं चाहते कि उनकी धार्मिक मनमानी तथा सांस्कृतिक आतंक का कोई विरोध करे। कोई उनकी आर्य-मनुवादी-वैदिक-संस्कृति को गलत ठहराने का साहस करे! कोई उनकी आर्य-मनुवादी-वैदिक-संस्कृति के खिलाफ खड़ा होने की जुर्रुत करे!
ईश्वर का व्यापार करने वाले व्यापारी—वैश्य-मूर्तियों, धर्म पुस्तकों और इस कार्य में सहयोगी वस्तुओं जैसे-धूप, दीप, कपूर, अगरबत्ती, नारियल, प्रसाद, माला, कण्ठी, तस्वीर आदि को येन कैन प्रकारेण बनाने, बढ़ाने और बेचने में लिप्त रहते हैं। ऐसे लोग कभी नहीं चाहते कि इन इन समस्त सामग्रियों का धार्मिक दर्जा कभी समाप्त हो!
जो कोई भी व्यक्ति, जिस किसी भी कारण से भारत में रहते हुए उपरोक्त कथित धार्मिक, व्यापारिक, तानाशाही, अमानवीय और मनमानी व्यवस्था की खिलाफत करता है, उसे धर्म और क़ानून का भय दिखलाकर सत्ताधारी—मनुवादियों द्वारा दबाया जाता रहा है। दबाव के आगे नहीं झुकने वालों को बेरहमी से कुचल दिया जाता है। सड़कों पर नंगा घुमाया जाता है। ट्रेक्टर के नीचे कुचल दिया जाता है। जिन्दा जला दिया जाता है।
इस प्रकार-आर्य-मनुवादी-वैदिक-संस्कृति को ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय के हित में इन तीनों वर्गों के व्यापारिक गठजोड़ एवं इनकी धार्मिक तथा राजनीतिक सत्ता द्वारा हर कीमत पर प्रभावी तरीके से जिन्दा रखकर क्रियान्वित किया जाता रहा है। वैसे भी धर्म की चाशनी में लिपटी कपोल-कल्पित सत्यनारायण, संतोषी माता, आदि की पोंगा—पंथी कथा और कहानियों को प्रचारित करना भारत जैसे धर्मभीरू और अशिक्षित देश में बेहद सरल कार्य है, क्योंकि इनका विरोध करने वाले नास्तिक करार दिए जाने के डर से खुद-ब-खुद ही आत्मसमर्पण कर देते हैं।
इसके विपरीत धार्मिक पांखण्ड के सहारे अधिकतर लोग समाज में धार्मिक, आस्तिक और ईश्वर भक्त की छवि बनाने में सफल हो जाते हैं। धार्मिक पाखण्ड का विरोध करने वालों को कुचलने से उनकी छवि सोने की तरह से चमकने और दमकने लगती है।
इन हालातों में धार्मिक पाखण्डियों का विरोध करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मनुवादी पाखण्डियों द्वारा उत्सवों और त्यौहारों का विरोध करने वाले लोगों को सार्वजनिक रूप से नास्तिक करार देकर, उसे असामाजिक तत्व की भाँति समाज से बहिष्कृत करने तक का प्रयास किया जाता है। जबकि सत्यता यह है कि खुद को आस्तिक कहने वाले सच्चे आस्तिक नहीं होते और जिन्हें नास्तिक ठहराया जाता है, वो भी सच्चे या वास्तव में नास्तिक नहीं होते हैं। जो खुद को धार्मिक कहकर प्रचारित करते हैं, वे और कुछ तो हो सकते हैं, लेकिन धार्मिक कतई भी नहीं होते हैं।
अब सबसे बड़ा—सवाल कि धार्मिक, आस्तिक और नास्तिक होते कौन हैं? या धार्मिकता, आस्तिकता और नास्तिकता क्या है?
1. धार्मिक : मेरे अनुभव के अनुसार धार्मिक होने के लिए आस्तिक होना कतई भी जरूरी नहीं है। इसी प्रकार से नास्तिक को अधार्मिक कहना तो बिलकुल भी न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि धर्म का ईश्वरीय आस्तिकता या नास्तिकता से नहीं, बल्कि मानव जीवन से सम्बन्ध है। धर्म मनुष्य के जीवन को सुगम, सरल, अच्छा और श्रेृष्ठ बनाने के लिए मानव-निर्मित सामाजिक व्यवस्था मात्र है। मानव-निर्मित व्यवस्था का ईश्वरीय सत्ता से किसी प्रकार का वास्ता होना, मानव सभ्यता का सबसे बड़ा असत्य है, सबसे बड़ा पाखण्ड है। यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि कोई भी मानव निर्मित व्यवस्था मानवता के विरुद्ध, अर्थात अमानवीय नहीं हो सकती। जबकि संसार में जितने भी धर्म हैं, सब के सब मानवता के दुश्मन हैं। जिसका प्रमाण है कि संसार में सर्वाधिक हत्याएं और युद्ध धर्म के परिणाम हैं। अत: धार्मिकता मानवता की रक्षक के बजाय, मानवता की भक्षक सिद्ध होती रही है। आज भी धर्म के नाम पर मानवता का अस्तित्व खमत किया जा रहा है। ऐसी स्थित में विचारयोग्य बड़ा तथ्य और सवाल यह है कि यदि धर्म का वास्ता ईश्वर से रहा होता तो कभी भी युद्ध और हत्याओं का मूल कारण धर्म नहीं रहा होता। क्या ईश्वर संसार की सर्वश्रेृष्ठ जीवन्त कृति मानव की मानव के हाथें हत्या होने दे सकता था/है?
2. आस्तिक : 99.99999 फीसदी आस्तिक लोग, ईश्वर को मानते तो हैं, लेकिन ईश्वर को जानने वालों की संख्या नगण्य या शून्य है। आज तक कोई ऐसा असन्दिग्ध और अकाट्य प्रमाण नहीं मिला है, जिसके आधार पर प्रमाणित तौर पर कहा जा सके कि कभी किसी व्यक्ति का ईश्वर से साक्षात्कार हुआ हो! फिर भी कुछ अन्धभक्त खुद को आस्तिक मानकर धार्मिक होने पर गर्व करते हैं। ऐसे लोग जिन्होंने ईश्वर को सिर्फ माना है, जाना कुछ भी नहीं वे खुद को धर्म से जोड़कर, खुद को धर्म के प्रतीक मानकर खोखला अहंकार पाले रहते हैं। ऐसे आस्तिक लोग नास्तिकों की तीखी आलोचना करने से भी नहीं चूकते। जो खुद नहीं जानते कि ईश्वर किस चिड़िया का नाम है, वे नास्तिकों को ईश्वर और धर्म विरोधी बताकर लंबे-चौड़े भाषण देते रहते हैं।
3. नास्तिक : अकसर कुछ ऐसे साहसी लोग जो समाज में सर्वत्र व्याप्त धार्मिक ढोंग और पाखण्ड से परेशान हो जाते हैं और जो धार्मिक पाखण्ड तथा पाखण्डियों से मुक्त होना चाहते हैं। जो धार्मिक जंजाल से मुक्त जीवन जीना चाहते हैं, अकसर ऐसे ही लोग खुद को नास्तिक कहना और कहलवाना पसन्द करते हैं। जबकि इनमें से अधिसंख्य सच्चे नास्तिक भी नहीं हो पाते हैं, क्योंकि वे खुद को केवल नास्तिक मानते भर हैं। जबकि नास्तिकता का वास्तविक अभिप्राय उस अवस्था से होता है, जबकि कोई व्यक्ति यह कहने की स्थिति में पहुँच जाए कि---"हाँ मैं केवल मानता ही नहीं, बल्कि मैं जान भी गया हूँ कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है। इस कारण मैं ईश्वर को नहीं मानता और मैं नास्तिक हूॅं।"
इस प्रकार उक्त विवेचन के प्रकाश में देखा जाये तो मुझे नहीं पता कि कितने लोग सच में धार्मिक, आस्तिक या नास्तिमक हैं? मेरा मकसद किसी की भावनाओं को आहत करना कतई भी नहीं है। फिर भी हो सकता है-अनेक आस्तिक उपरोक्त विचारों से असहमत हों, उनको असहमत होने का सम्पूर्ण संवैधानिक अधिकार है। मैं उनके असहमत होने के अधिकार का पुरजोर समर्थन करता हूँ, लेकिन मैं भी उम्मीद करता हूॅं कि विचार प्रकट करने के मेरे अधिकार का भी पुरजोर समर्थन किया जाना चाहिए। आखिर भारत का संविधान भी तो यही सब व्यवस्था करता है।
(लेखक-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख,हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान)

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