भूखों मरते लोग और बांसुरी बजाती मोदी सरकार

By-जगजीत शर्मा


इसी वर्ष 29 जुलाई को मध्य प्रदेश के भिंड गोहद में एक पिता दामोदर गोले ने अपनी पांच साल की बेटी को सिर्फ इसलिए मार डाला था क्योंकि वह अपनी बेटी को स्वास्थ्यवर्धक आहार नहीं दे पा रहा था। बाद में उसने भी फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। सात नवंबर 2015 को इलाहाबाद के यमुनापार स्थित बारा तहसील के गांव गीज पहाड़ी में मुसहर जाति के समरजीत उर्फ तोताराम और उसकी सात वर्षीय बेटी राधा की मौत भूख से हो गई। गांववालों के मुताबिक, इस परिवार में तीन-चार दिन से चूल्हा नहीं जला था और बुखार पीडि़त पिता-पुत्री दवा और भोजन के अभाव में दम तोड़ गए। इलाहाबाद में एक दूसरी घटना के अनुसार एक पिता ने अपने दो बच्चों को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि वह अपने बच्चों को खिलाने-पिलाने में असमर्थ था। इतना ही नहीं, 22 मई को छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में चार साल के एक आदिवासी बच्चे शिव कुमार की मौत सिर्फ इसलिए हो गई क्योंकि उसे कुछ दिनों से एक दाना अन्न नहीं मिला था। भूख से बेहाल उसका भाई श्रवण भी उसके शव के पास बेहोश मिला था। ये खबरें तो सिर्फ एक बानगी हैं, जो यह बताने के लिए काफी हैं कि आज भी देश में भूख से मरने वालों की संख्या काफी है। इस पर गजब यह है कि चाहे उत्तर प्रदेश हो, राजस्थान हो, मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ हो। देश का कोई भी राज्य हो, वहां भूख से होने वाली मौतों को सरकारी नुमाइंदे किसी और वजह से हुई मौत बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। इसका कारण एक यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि यदि एक भी व्यक्ति भूख से मर गया तो जिम्मेदार उस प्रदेश का मुख्य सचिव होगा। इसलिए भूख से होने वाली मौतों को अक्सर दूसरा नाम दे दिया जाता है। हालात इतने बदतर हैं कि भारत के एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, आबादी के हिसाब से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश में तकरीबन 21 करोड़ से अधिक लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एएफओ) ने अपनी रपट ‘द स्टेट ऑफ फूड इनसिक्योरिटी इन द वल्र्ड 2015’ में कहा है कि खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होकर भी हमारे देश में भूख से जूझ रहे लोगों की संख्या चीन से भी ज्यादा है। इस समय दुनिया भर में अस्सी करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें दोनों जून की रोटी मयस्सर नहीं होती। इन में से करीब चालीस करोड़ लोग भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हैं। यह तब हो रहा है, जब इन देशों में खाद्यान्नों के अतिरिक्त भंडार भरे पड़े हैं।
नतीजतन, विश्वभर में में प्रतिदिन चौबीस हजार लोग भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत के हिस्से में आता है। भूख से मरने वाले इन चौबीस हजार में से अठारह हजार बच्चे हैं। इसमें छह हजार बच्चे भारतीय हैं। लेकिन अफसोस है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये आंकड़े दिखाई नहीं देते हैं। उन्हें अपने देश के करोड़ों दरिद्र नारायण की बजाय सोमालिया के भूखे-नंगे लोग दिखाई देते हैं। सोमालिया और अन्य अफ्रीकी देशों में गरीबों के लिए चलने वाली योजनाओं और विकास योजनाओं के लिए करोड़ों रुपये देकर वाहवाही लूटते हैं। वे देश में स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन जैसे कार्यक्रमों की बात करते हैं, इसको देश के विकास से जोड़ते हैं। सिलिकन वैली में जाकर देश के पांच हजार गांवों को इंटरनेट से जोडऩे की बात करते हुए नहीं अघाते हैं। वे जिद करते हैं कि भूमि अधिग्रहण बिल को किसी भी तरह राज्यसभा में पास करा लिया जाए और जब नाकाम हो जाते हैं, तो इसका ठीकरा विपक्ष पर फोड़ते हुए वापस ले लेते हैं। वे किसानों से उनकी जमीन छीनकर पूंजीपतियों को सौंप देने में तो विकास देखते हैं, लेकिन इस देश के करोड़ों नंगे-भूखे लोगों को दोनों समय अन्न मुहैया कराने की दिशा में सोचने की जहमत तक नहीं उठाते हैं। नरेंद्र मोदी का यह पता नहीं कौन सा विकासवादी नजरिया है, जो सिर्फ इस देश के पूंजीपतियों के ही पक्ष में सोचता है। नरेंद्र मोदी ने अब तक जितनी भी योजनाओं की घोषणा बड़े जोर-शोर से की है, उनकी असलियत जब सामने आई है, तो लोग दंग ही रह गए हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों और विदेशी दौरों के दौरान भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए खूब हवा हवाई बाते करते हैं, लंबे-चौड़े वायदे करते हैं, लुभावने नारे लगाते और लगवाते हैं, लेकिन जब भी बात इस देश के अधिसंख्य गरीबों और मध्यम वर्ग की आती है, तो वे चुप्पी साध जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक जितनी भी योजनाएं देश को दी हैं, उससे इस देश की आम जनता का कतई भला नहीं हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालार मेक इन इंडिया से लेकर अभी हाल में शुरू की गई स्वर्ण मुद्रा योजना तक की वाहवाही करते नहीं थकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन तमाम योजनाओं से फायदा किसका हो रहा है? या तो इस देश के पूंजीपतियों को या फिर भ्रष्ट नौकरशाहों को। जिस स्वर्ण मुद्रा योजना की इतने जोरशोर से लांचिंग की गई, उसमें गांव, शहर या कस्बे के कितने लोगों ने भाग लिया? दो ग्राम से आधे किलो तक सोना के बारबार बांड भरने की हैसियत में एक रिक्शावाला, मोची, नाई, किसान, मजदूर या मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखने वाला व्यक्ति होगा? यह योजना तो सिर्फ उन लोगों के लिए लांच की गई है, जिनके घरों, दफ्तरों और गोदामों में वैध-अवैध धन पड़ा हुआ सड़ रहा है। पांच नवंबर को लांच की गई इस योजना में पैसा भी ऐसे ही लोगों ने लगाया है, ताकि वे अपनी अवैध-वैध कमाई का पैसा माकूल जगह पर निवेश कर सकें। यह कैसा निजाम है कि एक तरफ तो देश के करोड़ों लोग भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं, तो दूसरी ओर उनका प्रधानसेवक देशी-विदेशी पूंजीपतियों को खुश करने को लालायित दिख रहा है। देश की अधिसंख्य जनता की समस्याओं की अनदेखी करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब विदेशी दौरों पर जाते हैं, तो उस देश के पूंजीपतियों को विशेष छूट का प्रलोभन देते हैं। वे उन्हें कई तरह की छूट देकर भारत में आने और यहां के बाजार का निर्मम शोषण करके मुनाफा अपने देश ले जाने की चिरौरी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी को इन स्थितियों के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए और इस देश की अधिसंख्य आबादी के बारे में सोचना चाहिए।

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