स्त्री और पुरुष दोनों की अकेले मुक्ति संभव नहीं है


भोपाल ।।उर्जांचल टाईगर ब्यूरों।। “वही समाज विकसित और प्रगतिशील कहलाता है जहाँ पुरुष अपनी शक्ति नारी को लताड़ने में नहीं उन्हें बढ़ाने में लगाते हैं, लैंगिक असमानता समाज निर्मित है इसलिए जरूरी है लैंगिक न्याय को स्कूल स्तर के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना जाए” यह बातें भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, (आई.सी.सी.आर.) नई दिल्ली की भूतपूर्व निदेशक डॉ. नीरू मिश्रा ने कहीं, वे महिला अध्ययन विभाग बरकतउल्ला विश्वविाद्यालय भोपाल, मेन्स एक्शन फार इक्विलिटी (MAE) मध्यप्रदेश और स्वास्थ्य एवं सामाजिक न्याय केन्द्र (¼CHSJ) नयी दिल्ली द्वारा “जेण्डर जस्टिस एंड मैसक्युनिलिटी”’विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उदघाटन सत्र में मुख्य अतिथि की तौर पर संबोधित कर रही थीं.

अपने स्वागत उद्बोधन में सेन्टर फॉर हेल्थ एण्ड सोशल जस्टिस नई दिल्ली के अरितरिक्त संचालक सतीश कुमार सिंह ने कहा कि, “जेंडर न्याय केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है, लैंगिक असमानता को समाप्त करने के लिए महिला और पुरषों को साथ आना होगा, इसके लिए ज्ञान के सृजन और अभ्यास को जोड़ने की जरूरत है, इस दो दिवसीय कार्यक्रम का यही उद्देश्य है”. 

महिला अध्ययन विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. आशा शुक्ला ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि “मानव शब्द लिंगभेद से मुक्त है और मानव व्यवहार ही लिंगभेद को समाप्त कर सकता है, इसलिए लैंगिक समानता के लिए समाजीकरण की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है”. 

हिमाचल प्रदेश से आये वरिष्ठ सामजिक कार्यकर्ता सुभाष मेधापुरकर ने अपने विशेष संबोधन में कहा कि “हम पड़ोस और समाज में हो रहे महिला हिंसा के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, लेकिन अपने परिवार में इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं, यह परिवार ही है जो “मर्द” बनता है, सबसे पहले इसे ही तोड़ना होगा”. 

उदघाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे बरकतउल्ला विश्वविाद्यालय के कुलपति प्रो. एम.डी. तिवारी ने कहा कि “इतना प्रगति करने के बावजूद भी समाज में लड़का –लड़की का भेद कायम है ,बेटियों पर अभी भी कई तरह की बंदिशें लगाई जा रही हैं , सबसे पहले तो इन बंदिशों को हटाना होगा, यह सब कुछ तभी हो सकता है जब पुरषों कि प्रवृति में बदलाव आये, महिला अध्ययन विभाग इस दिशा में कई सालों से प्रयास कर रहा है, लेकिन यह सिर्फ महिला अध्ययन विभाग का काम नहीं होना चाहिए, हमें विश्वविद्यालय के तौर पर उदाहरण प्रस्तुत करना होगा”. 

कार्यक्रम के दुसरे सत्र में डा. रविन्द्र पी. आर. ने विषय-विषेषज्ञ के तौर पर “एक पितृसत्ता और कई तरह के मर्दानगी” विषय पर अपना प्रस्तुतिकरण देते हुए कहा कि “स्त्री और पुरुष दोनों की अकेले मुक्ति संभव नहीं है, दोनों के साथ आने से सच्चे अर्थों में मानव की मुक्ति हो सकेगी . “लिंग आधारित भेद-भाव -मर्दानगी मीडिया और राष्ट्रवाद” सत्र में विनीता भट्नागर और महेन्द्र कुमार द्वारा प्रस्तुतिकरण दिया गया . इस दौरान एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म “मर्दिस्तान” का प्रदर्शन किया जो कि पितृसत्ता और मर्दानगी को आर लोगों की सोच पर आधरित है.

राष्ट्रीय संगोष्ठी के दुसरे दिन 27 नवम्बर, 2015 को “सामाजिक न्याय में युवाओं की भूमिका” और लैंगिक न्याय के लिए आंदोलनों का अभिसारण विषय पर सत्र रहेंगें जिसमें डॉ. कुसुम त्रिपाठी (मुम्बई), डॉ. सैयद मुबीन जे़हरा (नई दिल्ली), सुभाष मेधापुरकर (हिमाचल प्रदेश), डॉ. भारती शुक्ला (जबलपुर), श्री देवेन्द्र सिंह (मध्यप्रदेश) योगेश कुमार (राजस्थान) डॉ..संगीता सक्सेना (भोपाल) दरवार प्रस्तुतिकरण और उद्बोधन दिया जाएगा. अंतिम सत्र में विभिन्न स्तरों पर लैंगिक न्याय के लिए पुरषों और लड़कों के साथ काम करने के रणनीतियों पर समूह चर्चा का आयोजन किया जाएगा. यह कार्यक्रम प्रातः 10.30 बजे से माइक्रोवायालोजी विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल में आयोजित होगा ।
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