गंगा स्वच्छता अभियान -आदेश नहीं संकल्प की जरुरत है


अब्दुल रशीद(संपादक) @उर्जांचल टाईगर # भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ जन्नत से जमीन पर उतार लाए थे. सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने वजूद और स्वक्षता के लिए सवाल पूछ रही है?

भारत में गंगा की सफाई का मुद्दा 80 के दशक से सुलग रहा है. कई नीतियां, कानून, निर्देश, आदेश जारी हुए उसके बावजूद आज गंगा में प्रदूषण खतरनाक स्तरों पर है. दिल्ली में यमुना जैसी दुर्गति की आशंका गंगा को लेकर भी जताई जाने लगी है. इन आशंकाओं और असफल प्रयास के बीच एनजीटी ने एक महत्त्वपूर्ण आदेश देकर गंगा की सफाई कि उम्मीद जगाई है. एनजीटी ने आदेश में कहा है कि गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा में प्लास्टिक और किसी भी तरह का अन्य मलबा, अस्पतालों का कचरा, अपशिष्ट आदि नहीं डाला जा सकेगा. ऐसा करने वालोँ पर भारी जुर्माना लगेगा. प्लास्टिक पर बैन के साथ साथ एनजीटी ने कपड़ा मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वो 15 दिन के भीतर प्लास्टिक बैग के संभावित विकल्पों के बारे में उत्तराखंड सरकार को सूचित करे. इसमें जूट और बायोडिग्रेडेबल सामग्री को प्राथमिकता देने को कहा गया है. 

गंगा को स्वच्छ करने के लिए केंद्र से उत्तराखंड सरकार को करीब ढाई सौ करोड़ रुपये मिले थे. खबरों के मुताबिक इसमें से करीब 80 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. ट्रिब्यूनल का कहना है कि बाकी पैसा उसकी देखरेख और निर्देश में खर्च होना चाहिए.
प्लास्टिक को लेकर राज्य सरकार की पहले से कोई दूरगामी नीति नहीं रही है. इतना जरूर है कि गोमुख आदि स्थानों पर प्लास्टिक ले जाना मना किया जाता रहा है. लेकिन किसी स्पष्ट प्राधिकार और कड़ी जवाबदेही के अभाव में इन शर्तों का खुलेआम उल्लंघन भी होता रहा है. प्लास्टिक का इस्तेमाल बेख़ौफ़ धड़ल्ले से जारी है और जहां पॉलीथीन के बैग इस्तेमाल नहीं भी किए जा रहे हैं तो खाद्य सामग्री के पैकेट और पानी की बोतलों का कचरा बड़े पैमाने पर नदियों में बहा दिया जाता है. सड़कों पर पड़ा प्लास्टिक पानी और खेतों में पहुंच जाता है और अंततः सारी गंदगी आगे बहती जाती है.
एनजीटी ने आदेश तो कर दिया है लेकिन गंगा की सफाई इस बात पर निर्भर करता है के आदेश पर कितनी सख्ती से और इमानदारी से अमल हो पाता है, एक और अहम बात यह है कि गंगा और अन्य सहायक नदियों के किनारे बन रही जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर ट्रिब्यूनल ने कुछ नहीं कहा है, उसकी दलील है कि ये मामले कोर्ट में हैं. तो परियोजनाओं के अपार मलबे का क्या होगा. इसी तरह खाद्य सामग्रियों के प्लास्टिक पैक्स की बात है. स्नैक्स, बिस्किट, कोल्डड्रिंक और अन्य खाद्य सामग्रियों की निर्माता कंपनियों को क्या ये कहा जाएगा कि वे पैकिंग की वैकल्पिक व्यवस्था करें. क्योंकि देखा गया है कि सब्जी फल के ठेलों और परचून की दुकानों से ग्राहक के साथ निकलने वाली प्लास्टिक की थैलियों से ज्यादा कचरा तो उस प्लास्टिक का है जो पैकिंग में इस्तेमाल हो रहा है. क्या वो निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं. उत्तराखंड में मसूरी, नैनीताल, देहरादून आदि शहरों में प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध है. कुछ खास मापदंडों को पूरा करने वाली प्लास्टिक की थैलियां रखने की अनुमति जरूर है लेकिन नियमों का पालन कुछ समय तो शिद्दत से किया जाता है लेकिन धीरे धीरे लोग पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं.

एनजीटी का फैसला एक बड़े स्तर पर तो अहम नजर आता है लेकिन जब व्यावहारिक नजरिए से देखें तो इस आदेश के अनुपालन में कई विसंगतियां मिलेंगी. गोमुख से हरिद्वार तक प्लास्टिक बैन का अर्थ ये कि गंगा पर कोई प्लास्टिक अब नहीं बहाया जा सकेगा या इसका अर्थ ये है कि सड़कों दूकानों, पर्यटन स्थलों, मंदिरों, आश्रमों, दफ्तरों, फैक्ट्रियों आदि में भी प्लास्टिक नहीं इस्तेमाल होगा, और अगर होगा तो उसका डिस्पोजल किस तरह से होगा? क्या ये कल्पना किया सकता है कि पर्यटकों से भरी हुई बस अपने साथ लाए गए हर तरह के प्लास्टिक को अपने साथ उठा कर वापस ले जाएगी या वहीं कहीं इधर उधर फेंक देगी. यानी आभी कई व्वाहारिक बातें जिन पर गौर किए जाने की जरूरत है.
सबसे अहम सवाल यह है के बिना प्लास्टिक डिस्पोजल कि संरचना के क्या आदेश प्रभावी हो सकेगा या यह आदेश भी इतिहास बनकर रह जाएगा.
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