अतीत और भविष्य के द्वन्द्व में फंसा विकास

By-इक़बाल हिंदुस्तानी

हिंदुत्व-विकास दोनों को एकसाथ साधना उनके लिये चुनौती है। 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी पूर्ण बहुमत से सरकार बनने के बावजूद आज तक एक अजीब द्वन्द्व में फंसे हुए हैं। एक तरफ उनका मूल आधार हिंदुत्व रहा है तो दूसरी तरफ वे कांग्रेस राज से दुखी जनता को विकास का सपना दिखाकर सत्ता में आये हैं। विडंबना यह है कि विकास उनके लिये भविष्य है तो हिंदुत्व उनका अतीत रहा है। गांधी जी कहा करते थे कि सही लक्ष्य हासिल करने के लिये सही साधन भी प्रयोग करने चाहिये लेकिन हिंदुत्व और विकास एक साथ साधना ही मोदी के लिये विरोधाभास बन गया है। एक तरफ उनपर जनता के उस वर्ग का भारी दबाव है जिसने विकास के लिये उनको चुना है तो दूसरी तरफ हिंदू साम्प्रदायिकता का ध्वजवाहक उग्र वर्ग जिसको हिंदुत्व कहा जाता है उसका एजेंडा लागू करने लिये उनपर संघ परिवार का भारी दबाव है। 

पहले मोदी ने सोचा था कि जिस तरह उन्होंने गुजरात में एक के बाद एक चुनाव जीतकर संघ परिवार को अनसुना कर अपनी मनचाही हकूमत चलाई थी वैसे ही वे देश का राज भी चला सकते हैं लेकिन राज्य और देश का अंतर क्या होता है यह उनको अब समझ में आ रहा है। पहले मोदी ने शिक्षा और संस्कृति का मामला संघ के हवाले कर अर्थव्यवस्था व विदेश नीति पर फोकस किया लेकिन जल्दी ही उनका टकराव हिंदूवादी गरमदल से होने लगा। संघ के दख़ल पर पहले पाकिस्तान से बात करने के लिये उसको आतंकवाद बंद करने की धमकी दी गयी लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते फिर बिना शर्त बात शुरू कर दी गयी। 

ऐसे ही राज्यसभा में बिल पास कराने को पहले कांग्रेस और विपक्ष की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया लेकिन एक बार फिर संघ के दबाव में कांग्रेसमुक्त भारत का नारा याद करते हुए नेशनल हैराल्ड मामले में कांग्रेस को घेरने के लिये पेशबंदी होने लगी जिससे जीएसटी और दूसरे ज़रूरी बिल एक बार फिर ठंडे बस्ते में जाने की आशंका सामने है। सच तो यह है कि राजनीति की जटिलता और बारीकी संघ समझता ही नहीं और जब जब भाजपा और मोदी इस जाल से निकलने की कोशिश करते भी हैं संघ उसमें दीवार बनकर खड़ी हो जाता है। मोदी के इस द्वन्द्व को समझने के लिये थोड़ा पीछे चलना होगा। दरअसल मोदी बचपन में ही संघ में शामिल होकर दो दशक तक उसकी नीतियों रीतियों को पूरी तरह आत्मसात कर चुके थे। उसके बाद उनको संघ ने भाजपा में प्रवेश कराया और बहुत जल्दी उनका प्रमोशन गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर कर दिया गया। 

गुजरात शुरू से ही संघ की प्रयोगशाला रहा है। वहां किसी संघी का सीएम पद पर आना जहां संघ के लिये बड़ा अहम था वहीं मोदी के लिये भी यह उनके जीवन का एक तरह से टर्निंग प्वाइंट था। एक शेर की लाइन है खुदा जब हुस्न देता है नज़ाकत आ ही जाती है। मोदी के साथ भी यही हुआ वे गुजरात की सत्ता संभालने के बाद खुद को संगठन की पकड़ से बाहर मानने लगे। यहीं से उनकी संघ परिवार से भी ठन गयी लेकिन एक के बाद एक चुनाव जीतने का श्रेय वे खुद को देने के कारण दिन ब दिन मज़बूत होते गये। उधर भाजपा के एक के बाद एक चुनाव हारने से देश की राजनीति में जब संघ का आडवाणी जी से मोहभंग हुआ तो उसकी नज़र मोदी पर गयी लेकिन उनकी मनमानी संघ को चुभ रही थी। वक्त की नज़ाकत और ज़रूरत ने दोनों को एक दूसरे का पूरक बना दिया। 

2014 के चुनाव में कांग्रेस अपने भ्रष्टाचार और अहंकार से देश की जनता की नज़र में विलेन बन चुकी थी वहीं मोदी गुजरात के कथित विकास और अपनी भाषण देने की मनमोहक कला से आम चुनाव में लोगों के दिल में उतर गये। सही मायने में उनकी जीत विकास और हिंदुत्व का कॉकटेल थी जिसमें सामने मोदी और पीछे संघ की जीतोड़ मेहनत और लगन काम कर रही थी। इस समीकरण में कारपोरेट ने भी सुर में सुर मिलाया और अपनी पूंजी का मंुह खोल दिया लेकिन चुनाव के बाद वही रस्साकशी शुरू हो गयी जिसका डर था। आज डेढ़ साल बाद भी विकास के नाम पर मोदी सरकार कुछ ठोस नहीं कर पाई है। इससे कारपोरेट सैक्टर भी उदास होने लगा है। उपलब्ध्यिों के नाम पर गिनाने को मोदी सरकार के पास कुछ भी खास नहीं है। सरकार उसी पुराने ढर्रे पर मामूली फेरबदल के साथ चल रही है। 

विरोधाभास यह है कि मोदी समझते हैं सरकार उनकी वजह से बनी है और उनको अपने वायदे के हिसाब से विकास करना है जबकि संघ यह मानकर चल रहा है कि सरकार हिंदुत्व के एजेंडे पर बनी है लिहाज़ा मोदी सरकार को चाहिये कि वे हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य को पूरा करने के लिये संघ को फ्रीहैंड दें। इस टकराव का नतीजा यह है कि न तो ठीक से विकास हो पा रहा है और न ही संघ अपने हिंदुत्व के एजेंडे को पूरी तरह लागू कर पा रहा है। ये दोनों काम एक साथ हो भी नहीं सकते क्योंकि विकास भविष्य का सवाल है जो आधुनिक और प्रगतिशील सोच मांगता है और हिंदुत्व का विचार एक अतीतजीवी पिछड़ा और साम्प्रदायिक विमर्श है जो मोदी को लगातार पीछे खींच रहा है। 

मोदी संघ को भी नाराज़ नहीं कर सकते जिसका दुष्परिणाम यह है कि उनके मंत्री और सांसद संघ की शह पर लगातार आग लगाने वाले और सद्भाव व शांति को नुकसान पहुंचाने वाले बयान और काम करते रहते हैं जबकि आध्ुानिक और वैज्ञानिक विकास के लिये जो साम्प्रदायिक सहिष्णुता उदारता धर्मनिर्पेक्षता और निष्पक्षता चाहिये वो मोदी संघ के हाथ में अपना रिमोट देकर कायम रख ही नहीं सकते। इसका नतीजा पहले दिल्ली फिर बिहार और अब गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा की बुरी तरह हार के बाद सामने आने लगा है। 

मुझे पता है मेरे इस लेख को पढ़ते ही मोदीभक्त एक बार फिर अपनी सभ्यता और संस्कृति का परिचय देते हुए मुझ पर गालियों की बौछार व वामपंथी और ‘‘देशद्रोही’’ तक होने का अनर्गल आरोप लगायेंगे लेकिन सच का आईना दिखाना हमारा काम है चाहे आज आप कुछ भी कहंे लेकिन आम चुनाव आते आते वास्तविक विकास न होने पर मोदी का समर्थक रहा एक बड़ा वर्ग उनसे छिटक जायेगा और बिहार की तरह अगर विपक्ष देश में भी एकजुट हुआ तो संघ भाजपा और मोदी एक दूसरे को चाहे जितना दोष देते रहें लेकिन उनकी यह एतिहासिक भूल समय कभी माफ नहीं करेगा। 

सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राहे शौक़ में,मंज़िल मेरी तमाम उम्र मुझे ढूंढती रही।।

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