दहेज तो नहीं मांगा, लेकिन अब मौत मांग रहे हैं दीनदयाल

दहेज

By- संजय तिवारी 

उन्होंने दहेज तो नहीं मांगा लेकिन अब वे मौत मांग रहे हैं। जिन्दगी पाने की जिस ख्वाहिश में दीनदयाल ने अपने बेटे की शादी की थी उसी शादी ने आज उन्हें मौत मांगने पर मजबूर कर दिया है। अदालत, सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाकर थक चुके बूढ़े दीनदयाल अपनी बुढिया के साथ अब राष्ट्रपति के दरवाजे पर खड़े हैं। वही राष्ट्रपति जो कानूनों पर अपनी अंतिम मोहर मारता है। राष्ट्रपति के द्वारा ऐसे ही एक मुहरबंद कानून का शिकार दीनदयाल शर्मा भी हो गये हैं। दहेज उत्पीड़न कानून। देश के लाखों बुजुर्गों में से एक जो इस कानून के "एक और" शिकार हुए हैं। 

दीनदयाल शर्मा दिल्ली के यमुना विहार कालोनी में रहते हैं। 2003 में अपने एयरफोर्स अधिकारी बेटे की शादी एक फौजी की बेटी से किया था। बहू आयी। रानी बनकर रही। एक बेटा भी हुआ। छह साल कब बीत गये किसी को पता न चला। फिर छह साल बाद अचानक से बहू घर छोड़कर मायके चली गयी। इसके बाद वही हुआ जो आमतौर पर एक सामान्य हिन्दू परिवार का सबसे बड़ा डर बन गया है। बहू ने 2012 में दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज करा दिया और बीते तीन सालों से अब उनकी अपनी बहू और पोते से कोर्ट में ही मुलाकात होती है।

दीनदयाल कह रहे हैं कि जब छह साल दहेज नहीं मांगा तो छठे साल में ऐसा क्या हो गया कि बहू ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करा दिया? दीनदयाल के मुताबिक बहू ने मांग रखी थी कि घर उसके नाम कर दिया जाए जिसे सास ससुर ने नहीं माना। हो सकता है बेटे ने बीबी का साथ देने की बजाय अपने मां बाप का साथ दिया और बात बिगड़ गयी। बहू मायके चली गयी। तकरार बढ़ती चली गयी और मामला अदालत में उलझ गया है। किसी सत्तर साल के बुजुर्ग के लिए रोज रोज कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाना सिर्फ इस उम्मीद में कि एक दिन उसे निर्दोष साबित कर दिया जाएगा कोई सम्मानजनक कर्म नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने राष्ट्रपति के घर गुहार लगायी है कि उन्हें और उनकी पत्नी को मरने की इजाजत दे दी जाए।

हो सकता है दीनदयाल इतने भी निर्दोष न हों जितना वे बता रहे हैं लेकिन वे उतने भी दोषी नजर नहीं हो सकते जितनी उनको सजा मिल रही है। और दीनदयाल अकेले ससुर नहीं रह गये हैं जो बेकसूर होकर भी सजा भुगत रहे हैं। साठ के दशक में जब से भारतीय दंड संहिता में धारा 498A जोड़ा गया है लाखों परिवार इस कानून की भेंट चढ़ चुके हैं एक से एक दर्दनाक कहानियों से बीते चार दशक का इतिहास भरा पड़ा है। इस कानून के कारण दहेज उत्पीड़न में कोई कमी आई हो इसका कोई खास लक्षण अब तक नहीं दिखा है लेकिन इस कानून के कारण न जाने कितने दीनदयाल अकाल काल के गाल में समा गये हैं इसके लाखों उदाहरण हैं।

नब्बे के दशक में इस कानून का सबसे ज्यादा आतंक था। बड़े पैमाने पर नौजवानों ने आत्महत्याएं की और परिवार भी बर्बाद हुए लेकिन मुख्यधारा के समाज के लिए यह कानून कभी मुद्दा नहीं बना उल्टे यूपीए सरकार ने नारीवादियों के दबाव में सात साल तक प्रभावी रहनेवाले इस कानून की समयसीमा बढ़ाकर आजीवन कर दिया। मतलब अब महिला किसी भी समय ससुरालवालों पर दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करा सकती है। शादी के दस, बीस, पचास साल बाद भी।

जाहिर है ऐसे प्रावधानों का मकसद दहेज प्रताड़ना को समाप्त करना बिल्कुल नहीं है। इनका मकसद कुछ और है और वह मकसद इसी बात से हल होता है कि भारत की परिवार व्यवस्था का आधार विवाह इतना विवादित बन जाए कि लोग विवाह के नाम से खौफ खायें। भारत में दहेज उत्पीड़न कानून असल में विवाह उत्पीड़न कानून है जिसका मुख्य मकसद परिवार व्यवस्था का विघटन और जनसंख्या नियंत्रण है। लेकिन यह उस कानून का छिपा हुआ रूप है जिसे समझ पाना इतना आसान नहीं है। जो संस्थाएं ऐसे कानूनों की वकालत करती हैं उनके दानदाताओं की सूची देखिए। आपको सब समझ में आने लगेगा कि भारत के नारीवादी एनजीओ क्या खाकर ऐसे परिवार विरोधी, समाज विरोधी कानूनों की पैरवी करते हैं।

दहेज रूपी अनिवार्य बुराई से निपटने के लिए कानूनी या सामाजिक उपाय करने की बजाय हमने शुरूआत से ही गलत रास्ता चुना। एक सामाजिक बुराई का निदान हमने क्रिमिनल कानून से करने की कोशिश की। किसी विवाहिता स्त्री को दहेज के कारण प्रताड़ित किया जाए, मार दिया जाए, यह अपराध कारण नहीं बल्कि परिणाम है। हमें परिणाम की इतनी चिंता थी कि जोरदार कानून बना दिया लेकिन कारण को नष्ट करने की कोई खास पहल नहीं की गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि दहेज प्रताड़ना का कानून खुद एक कानूनी प्रताड़ना बन गया। बीते चार पांच साल का आकड़ा देखें तो पता चलता है कि औसतन हर साल दस हजार केस झूठे पाये जाते हैं। ये वो केस हैं जो पुलिस के स्तर पर तफ्शीश में गलत पाये जाते हैं। लेकिन अगर अदालतों का जायजा लें तो पानी सर के ऊपर निकल जाता है।

सौ में नब्बे मामले जो दहेज उत्पीड़न से दर्ज किये जाते हैं उनके पीछे कारण दहेज नहीं बल्कि और कुछ होता है। पारिवारिक झगड़े, पति पत्नी की अनबन या फिर ऐसे ही मामले जिसमें लड़की और उसका परिवार दहेज उत्पीड़न कानून को एक हथियार की तरह "सबक सिखाने" और "बर्बाद करने" के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बर्बादी इस कदर बढ़ गयी कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक हिल गये इसलिए बीते दो तीन सालों में अलग अलग हाईकोर्ट और खुद सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन निकाली है ताकि इस कानून का दुरुपयोग रोका जा सके। इसलिए दहेज उत्पीड़न के ज्यादातर मामले अदालत पहुंचते ही मेडिएशन सेन्टर भेज दिये जाते हैं जहां दोनों पक्ष आपस में बात करके सुलह समझौता कर सकते हैं। लेकिन यह सब होते होते पीड़ित परिवार पुलिस और वकीलों का शिकार बन चुका होता है।

जिस देश में अदालती प्रक्रिया ही वास्तविक सजा हो उस देश में कानून का इस्तेमाल न्याय पाने के लिए नहीं बल्कि सजा देने के लिए किया जाता है। हमारे यहां भी यह कानून न्याय पाने का हथियार न होकर सजा देने का औजार हो गया है। केस दर्ज होते ही पीड़ित परिवार दो चार साल के लिए अदालतों का मुलाजिम होकर रह जाता है। इस कानून में महिला के नाम पर सिर्फ विवाहित स्त्री के अधिकार की रक्षा की गयी है जबकि वही महिला इस कानून का दुरुपयोग सिर्फ पुरुषों के खिलाफ ही नहीं सास, ननद, देवरानी, जेठानी सबके खिलाफ इस्तेमाल करती है। हालांकि तमाम हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अब कई तरह के बचाव के उपाय किये गये हैं लेकिन वे सब नाकाफी हैं।

वक्त आ गया है कि महामहीम राष्ट्रपति पचास साल बाद इस कानून की व्यापक समीक्षा करवायें और इसकी जरूरत को देखते हुए अगर इसे बनाकर रखना भी चाहें तो इसमें बदलाव करवायें नहीं तो दीनदयाल को अकाल मौत मरने की इजाजत दे दें। क्योंकि जिस परिवार के खिलाफ गैरकानूनी तरीके से यह कानून इस्तेमाल कर दिया जाता है जिन्दा तो वो तब भी नहीं रह पाता है।

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