राजनीतिक कुटिलताओं के बीच फंसा देश

कनहैया कुमार

मोकर्रम खान @ उर्जांचल टाईगर

पिछले कई दिनों से सारे देश में बहुसंख्यक  को राष्ट्रभक्त  बताने तथा अल्पसंख्यक वर्ग को देशद्रोही घोषित करने का कुटिल खेल चल रहा है. इसमें सत्ता पक्ष के नेता नये नये हथकंडे इस्तमाल कर रहे हैं तथा उनकी शह पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक गुट इसे हवा दे रहा है. इस पूरे खेल की पृष्ठभूमि बना जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में गत 09 फरवरी को आयोजित एक कार्यक्रम. इस कार्यक्रम में अफजल गुरु को शहीद बताया गया तथा भारत विरोधी नारे लगाये गये. आरोप है कि यह नारे जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कनहैया कुमार तथा अन्य छात्र उमर खालिद, बनज्योत्सना लाहिड़ी, अनिर्बन भट्टाचार्य आदि ने लगाये. दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है. इसके वरिष्ठ अधिकारीगण पद पर बने रहने तथा सेवानिवृत्ति के उपरांत कोई मलाईदार पद की प्रत्याश में केंद्रीय गृह मंत्री के सम्मुख  "क्या हुक्म  है मेरे आका’’ वाली मुद्रा में नतमस्तक  रहते हैं तथा उनके निर्देशन में दिल्ली पुलिस कुछ उसी प्रकार कार्य करती है जैसे उद्योगपतियों/फिल्मी  हस्तियों के निजी सुरक्षाकर्मी अपने मालिक को प्रसन्न करने के लिये किसी को भी सरे राह पीट देते हैं. इसी तर्ज पर दिल्ली पुलिस ने आनन फानन में कनहैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया. कन्हैया कुमार का वास्तविक अपराध यह है कि वह आरएसएस की खुले आम आलोचना करता था तथा सुब्रमण्यम स्‍वामी जो आजकल भाजपा के स्व-घोषित हाई कमान हैं, को ललकारता था. इस संबंध में कन्हैया के वीडियो भी चैनलों पर चल चुके हैं. उसका दूसरा अपराध यह है कि वह छोटा मुंह और बड़ी बात करता है. वह एक अत्यंत निर्धन परिवार से है. उसकी मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता है जिसे केवल 3000/- रुपये प्रति माह वेतन मिलता है. पिता लकवाग्रस्‍त हैं. फिर भी वह जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष बन गया. वह न तो सत्ताधारी पार्टी से संबद्ध है, न ही यूपीए की किसी पार्टी से, वह साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित है. ऐसा निरीह व्यक्ति सत्तापक्ष के अभिभावकों से पंगा ले तो उसका सर कुचल देना आवश्यक हो जाता है. इस कार्य हेतु वकीलों की सेवायें ली गईं. एक टीवी चैनल आज तक के स्टिंग आपरेशन में कुछ वकीलों ने स्वीकार किया कि उन्होंने कन्हैया को अदालत परिसर में कई घंटों तक इतना मारा कि उसका पेशाब, पाखाना सब कुछ निकल गया, तथा पुलिस ने इस काम में सहयोग दिया. अब प्रश्न यह उठता है कि यदि पुलिस हिरासत में अदालत परिसर के अंदर लोग किसी व्यक्ति को बेफिक्री से बेतहाशा पीट सकते हैं तो अदालत की गरिमा तथा पुलिस पर भरोसे का क्या होगा. दिलचस्प बात यह है कि इतनी बर्बर पिटाई कराने के बावजूद पुलिस ने कन्हैया से यह बयान दिला दिया कि मेरी कोई पिटाई नहीं हुई है तथा पुलिस ने मुझे सुरक्षा प्रदान की. यदि आज तक का स्टिंग आपरेशन सामने नहीं आता तो शायद इस सच से पर्दा कभी नहीं उठ पाता. कन्हैया की दुर्गति करने के बाद अन्य छात्रों की तलाश तेज कर दी गई जो जान जाने के डर से भूमिगत हो गये थे.
देश में मुसलमानों में शिक्षा का स्तर कम है, उच्च शिक्षा में तो बहुत ही कम है फिर भी एक मुस्लिम छात्र का नाम सामने आ ही गया, उमर खालिद. भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप कई छात्रों पर था किंतु सारा फोकस उमर खालिद पर केंद्रित कर दिया गया. नये नये खुलासे होने लगे जैसे खालिद जेएनयू के अलावा और भी कई यूनिवर्सिटीज में यह कार्यक्रम कराने वाला था, उसने दो दिन में 800 काल किये जिसमें से कई काल कश्मीर तथा विदेशों में की गईं थीं, खालिद का संबंध आतंकवादी संगठनों से है, आदि. वकीलों द्वारा कन्हैया के इतने पीटे जाने के बावजूद उसके जीवित बच जाने पर खालिद तथा 3 अन्य छात्र भी प्रगट हो गये. मीडिया ने केवल उमर खालिद को हाइलाइट किया. खालिद उमर ने पुलिस के सभी आरोपों का जम कर मजाक उड़ाया तथा आरोप सिद्ध करने की चुनौती दी. अभी तक भारत का एक भी मुसलमान खालिद के समर्थन में नहीं खड़ा हुआ, न ही किसी ने उसके लिये एक शब्द भी बोला फिर भी कुछ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे पूरे भारत के मुसलमान खालिद के परिजन हैं तथा देशद्रोही हैं. भाजपा के नेता टीवी पर यह प्रदर्शित करने में लगे हैं कि एनडीए के अलावा बाकी सभी पार्टियां देशद्रोहियों की मदद कर रही हैं. पता नहीं क्यों विपक्षी पार्टियां भाजपा के इस षडयंत्र का सफलतापूर्वक मुकाबला नहीं कर सकीं. इससे भाजपा हावी हो गई किंतु प्रकृति के अपने ही नियम और कानून हैं जिनके कारण सत्य बाहर आ ही जाता है.

हफपोस्ट इंडिया के कंट्रीब्‍यूटिंग एडीटर शिवम बिज ने 25 फरवरी 2016 को पोस्ट किये गये अपने आर्टिकल में लिखा है कि कन्हैया, उमर खालिद आदि जो भारत विरोधी नारे लगाने के आरोप में जेल में बंद हैं, उन्‍होंने भारत विरोधी नारे नहीं लगाये बल्कि जो लोग नारे लगा रहे थे उन्हें ऐसे नारे लगाने से मना किया था. भारत विरोधी नारे कुछ ऐसे कश्मीरियों ने लगाये थे जो न तो जेएनयू के छात्र थे न ही शिक्षक बल्कि दिल्‍ली में निवासरत ऐसे कश्मीरी थे जो कश्मीरियों से संबंधित किसी भी कार्यक्रम में स्‍वत: शामिल हो जाते हैं. एबीवीपी ने 9 फरवरी के कार्यक्रम को रोकने के प्रयास किये तथा नारे लगाये कि कश्मीर हमारा है, सारा का सारा है. इसके जवाब में उन कश्मीरियों ने भारत की बरबादी तक जंग जारी रहेगी के नारे लगाये. विज आगे लिखते हैं कि कश्मीर में भारत विरोधी नारे लगाना आम बात है. वहां की सड़कों पर इस प्रकार के नारे कभी भी सुनाई देते रहते हैं. वास्‍तव में उन कश्मीरियों को जेल भेजना चाहिये था जिन्होंने जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाये किंतु दिल्ली पुलिस उन पर हांथ भी नहीं डाल रही है. इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि भाजपा कश्‍मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाने को आतुर है. महबूबा मुफ्ती ने कह दिया है कि यदि किसी भी कश्मीरी के विरुद्ध कार्यवाही की गई तो कश्मीर में हालात बेकाबू हो जायेंगे. भाजपा कश्मीर में गठबंधन सरकार बनाने का मौका खोना नहीं चाहती इसलिये महबूबा की सारी बातें मान रही है और वास्तविक दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर रही है.

भारत विरोधी नारे लगाने वाले कश्मीरी दिल्ली में ही घूम रहे हैं लेकिन दिल्ली पुलिस उन्‍हें हांथ भी नहीं लगा रही है. कन्हैया एवं अन्‍य जिन्हें देशद्रोह के आरोप में जेल दाखिल किया गया है, वे सारे आरोपों को सिरे से नकार रहे हैं, उनके समर्थन में खड़े होने वालों की भी अच्छी खासी संख्या है. फिर भी टीवी पर एक ही कार्यक्रम चल रहा है, देशद्रोहियों को कैसे बख्शा जाय. इस प्रश्न का उत्तर तो देश का साधारणतम नागरिक भी यही देगा कि देशद्रोहियों को कठोर दंड दिया जाय परंतु प्रश्‍न यह उठता है कि वास्तव में देशद्रोही है कौन ? वे व्यक्ति जिन्हें राजनेता-मीडिया गठजोड़ बगैर किसी मुकदमेबाजी तत्‍काल देशद्रोही घोषित कर देता है या वे जिन्हें न्यायपालिका न्यायिक प्रक्रिया पूर्ण कर दंडित करने का आदेश देती है.

वर्तमान में राजनीतिक कुटिलता के कई बड़े दिलचस्प उदाहरण है. जो भी व्यक्ति सत्‍ताधीशों से सामंजस्य बना कर चलता है, उसका कोई भी गंभीर से गंभीर अपराध पुलिस को दिखाई नहीं पड़ता. दूसरी ओर जो लोग सत्ताधीशों की आंखों की किरकिरी बनते हैं पुलिस उनके ऊपर फर्जी मुकदमें भी बना देती है. ताजा खबर है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, दिल्‍ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी पर तेलंगाना में देशद्रोंह का केस दर्ज किया गया है. उधर हरियाणा में महिलाओं की दिन-दहाड़े सरे राह दुर्गति करने वालों को पुलिस तलाश नहीं कर पा रही है.

लेखक - मोकर्रम खान,वरिष्ठ पत्रकार/राजनीतिकविश्लेषक पूर्व निजी सचिव, केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री 

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