तालाबों को लगी बुरी नजर, बचना मुश्किल


अमिताभ पाण्डेय (मध्यप्रदेश)।।मध्यप्रदेश में प्रशासन की उदासीनता , अफसरों – कर्मचारियो की मिलीभगत और भू माफिया की बुरी नियत के कारण तालाबों के अस्तित्व पर संकट बढ गया है। इन्दौर के पीपल्याहाना तालाब से लेकर भोपाल के बडे तालाब तक को खत्म करने की कोशिश तरह तरह के बहानों से हो रही है। हद तो यह है कि जिस सरकार पर , प्रशसन के जिन अफसरों पर जलस्त्रोंत को बचाने की जिम्मेदारी है वे खुद ही तालाबों को खत्म करने की तरकीबों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित कर रहे हैं। तालाबों के आसपास अतिक्रमण करने वालों की राजनीतिक प्रशसनिक पहुंच तालाब के दायरे को उसकी सीमाओं को लगातार कम कर रही हेै। सरकार के जो प्रतिनिधि पानी बचाने की बात करते हैं वे खुद ही तालाबों का पानी कम कर देना चाहते हैं । इसके लिए तालाबों को पूरा भर जाने के पहले ही पानी को बहाया जा रहा है।

इस प्रसंग में राजधानी के बडे तालाब का जिक्र करना जरूरी होगा जिसको हाल ही में हुई बारिश के बाद पूरा भर जाने के पहले ही थोडा खाली करवा दिया । भोपाल शहर की पहचान बडे तालाब का पानी फुल टेंक लेवल 1666 दशमलव 8० फीट तक पहुंचने के पहले ही उसे थोडा खाली क र दिया गया। फुल टेंक लेवल तक पहुंचने के पहले भदभदा के गेट शायद इसके पहले कभी नही खोले गये थे । इस बार जब बडे तालाब का पानी 1665 फीट तक पहुंचा तभी भदभदा के गेट खोलने की जरूरत क्यों पड गई । इसे लेकर शहर में कई तरह की चर्चा हो रही हो रही है। ऐसा भी कहा जा रहा हेै कि जिन लोगों ने बडे तालाब के कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण कर पक्के निमार्ण कर लिये है बडे तालाब का पानी वहां तक जा पहुंचा था । बडे तालाब के कैचमेंट एरिया में पक्के निर्माण करने वाले ज्यादातर लोग राजनीतिक प्रशासनिक प्रभाव वाले हैं जिन्होंने बडे तालाब के पानी पक्के निर्माण के आसपास ज्यादा फैलने से रोकने के लिए भदभदा के तीन गेट खुलवा दिये और उनकी तरफ आ रहे पानी को बाहर करवा दिया।

उल्लेखनीय है कि मंगलवार को बडे तालाब का पानी कल भदभदा बाध्ां के तीन गेट खोलकर बाहर कर दिया गया । मुख्यमंत्री शिवराज सिहं चौहान ,महापौर आलोक शर्मा की मौजूदगी में गेट भदभदा बांध के तीन गेट खोले गये और बडे तालाब का पानी इस रास्ते से बह निकला। इसके बाद बडे तालाब में पानी का स्तर कुछ कम तो गया लेकिन भदभदा के रास्ते बहनेवाला पानी अपने पीछे कई सवाल छोड गया है। ये सवाल बेवक्त और बेजवह पानी छोडने के पीछे किसी दबाव-प्रभाव की ओर संकेत करते हैं। यह दबाव – प्रभाव निश्चित रूप से उन लोगों का हो सकता है जिनके द्बारा तालाब के केैचमेंट एरिया में अवैध निर्माण कर लिया गया है। हाल ही में एक पखवाडे तक हुई जोरदार बारिश के बाद बडे तालाब का पानी कैचमेंट एरिया में तो फैला ही ,यह पानी नगर निगम द्बारा बनाई गई रिटेनिगं वाल को भी पार कर गया । बढते पानी से कैचमेंट एरिया में बने एक बडे निजी अस्पताल को भी खतरा था यदि समय रहते बडे तालाब का पानी भदभदा के रास्ते खाली नहीं करवाया तो इस निजी अस्पताल के आसपास ज्यादा पानी भर जाने की आशंका थी शायद इसीलिए निजी अस्पताल के मालिकों को ने अपने राजनीतिक सम्पर्क का इस्तेमाल कर भदभदा के तीन गेट खुलवा दिये। मंगलवार को साढे 14 घंटे तक खुले रहे इन तीन गेट से 3०4 दशमलव 5 क्यूबिक मीटर पानी बहा दिया गया । यह पानी बह जाने के बाद नगर निगम द्बारा बनवाई गई रिटेनिगं वाल नजर आने लगी ओैर निजी अस्पताल के आसपास भरने वाला पानी भी कम हो गया। दो गेट खुल जाने से कैचमेंट एरिया में पानी का फैलाव कुछ कम हो गया है।

इस बारे मे भोपाल के पर्यावरणविद डा सुभाषचन्द्र पाण्डेय का कहना है कि किसी भी जलाशय को उसके फुलटेंक लेवल तक पहुंचने के पहले ही खोला नहीं जाना चाहिये। उन्होंने कहा कि बडे तालाब को पूरा भरने से पहले ही उसका पानी भदभदा के तीन गेट खोलकर बहा देना एक तरह का सामूहिक षडयत्रं है। पेयजल की कीमत पर कुछ लोगों के निजी हितों की रक्षा की जा रही है।

इस बारे में सूत्रों का कहना है कि बडे तालाब के कैचमेटं एरिया में एक निजी अस्पताल से लेकर आधा दर्जन से अधिक वरिष्ठ प्रशासनिक अफसरों के फार्म हैं जिनके आसपास बडे तालाब का पानी पहुंचने लगा था इसीलिए भदभदा के तीन गेट खोलकर बडे तालाब को थोडा खाली कराया गया हैं।

इस बारे में उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सिध्दार्थ गुप्ता का कहना है कि भोपाल में बडे तालाब के केचमेंट एरिया से लेकर छोटे छोटे नालों तक पर लोगों ने कब्जा कर लिया है। उन्होंने कहा कि नगर निगम, राजस्व सहित अन्य विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत के बिना कैचमंेट एरिया, नालों पर अतिक्रमण किया ही नहीं जा सकता । जो भी अतिक्रमण हुआ है उसके लिए अधिकारियों के निजी स्वार्थ भी जिम्मेदार हैं। श्री गुप्ता ने कहा कि यदि बडे तालाब के कैचमेंट एरिया के आसपास इसी तरह अतिक्रमण बढते रहे तो आनेवाले कुछ वषोर्ं में बडा तालाब एक छोटी सी तलैया में बदल जायेगा। अपने स्वार्थ की खातिर बडे तालाब के मूल स्वरूप को नुकसान पहुंचाने वालों अधिकारियों की पहचान कर उन पर कडी कार्यवाही की जाना चाहिये अन्यथा आनेवाले समय में बडे तालाब के किनारों पर आलीशान होटल, फार्म हाउस , निजी अस्पताल की संख्या बढती चली जायेगी और इस तालाब का जल भराव क्षेत्र लगातार सिमटता जायेगा।

यहां यह बताना जरूरी होगा कि भोपाल में एक जमाने मे लगभग दो दर्जन तालाब हुआ करते थे जिनकी पहचान अब खत्म सी हो गई है। अदालती दावं-पेचं और तारीख पर तारीख ने तालाबों पर कब्जा करने वालों के होसलें बुलंद किये जिसका परिणाम यह है ताल तलैयों के इस शहर में तालाबों के सामने खुद को बचाये रखने की चुनौती बढती जा रही है।

गौरतलब है कि भोपाल ही नहीं प्रदेश के अन्य महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक के जलस्त्रोत अतिक्रमण करने वालों के कारण अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। इस सन्दर्भ में इन्दौर शहर का जिक्र करना जरूरी होगा जहां होल्कर के जमाने में बने पीपल्या हाना तालाब पर मिटटी डालकर न्यायालय परिसर बनाने की तैयारी की जा रही है । वहां के जनप्रतिनिधि और समाजसेवी इसके विरोध में एकजुट हो गये हैं । दलगत राजनीति को भुलाकर भोपाल के नेता और समाजसेवाी आमजनता के साथ ऐसी एकजुटता दिखाये तो बडे तालाब के अच्छे दिन फिर लौट सकते है वरना इसे अतिक्रमण करने वालों की बुरी नजर तो लग ही गई है।

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