इराक युद्ध एक भूल थी

इराक युद्ध एक भूल थी

By-जाहिद खान 

एक ऐसे युद्ध में जहां सैनिकों समेत ढाई लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हों और जिसमें घायलों, विकलांगों, मानसिक आघात झेल रहे सैनिकों और नागरिकों की तादाद उससे भी कहीं ज्यादा हो, जिसका असर सारी दुनिया आज भी भुगत रही हो, यदि इस युद्ध के तेरह साल बाद ये बात मालूम चले कि युद्ध का कोई औचित्य नहीं था, युद्ध का फैसला ही गलत था तो सोचिए आपके दिल पर क्या बीतेगी ? क्या आप जंग के गुनहगारों को माफ कर पाएंगे ? इराक युद्ध की जांच कर रही चिलकॉट कमिटी ने सात वर्षों के लंबे इंतजार के बाद हाल ही में ब्रिटिश सरकार को जो अपनी रिपोर्ट सौंपी है, उसमें ऐसी कई बातें हैं जिन्हें पढ़कर सख्त से सख्त दिलवाला शख्स भी परेशान हो जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका द्वारा इराक पर किये गये हमले में ब्रिटेन की सहभागिता अपुष्ट तथ्यों पर आधारित थी और उसने युद्ध से पहले शांतिपूर्ण कूटनीतिक विकल्पों पर विचार नहीं किया था। उस वक्त सैनिक कार्रवाई अंतिम विकल्प नहीं थी। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने अपने देशवासियों को पूर्व इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से संभावित खतरों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया था, जबकि वास्तव में ऐसी आशंकाएं पूरी तरह निराधार थीं। रिपोर्ट में यह दिलचस्प तथ्य भी सामने आया है कि युद्ध में शामिल होने के ब्लेयर के फैसले का कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है। दीगर सबूतों से मालूम चलता है कि प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर पूरी तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के प्रभाव में थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय जनमत की उपेक्षा करते हुए हमले का फैसला किया था। अकेले चिलकॉट रिपोर्ट ही नहीं, बल्कि इससे पहले भी कई रिपोर्ट और अध्ययन सामने आ चुके हैं, जो बताते हैं कि इराक पर हमला अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानवाधिकार का खुला उल्लंघन था।

साल 2009 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डन ब्राउन ने पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह सर जॉन चिल्कॉट को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे साल 2001 से 2009 के बीच इराक को लेकर ब्रिटेन की नीतियों का अध्ययन करें और बतायें कि क्या 2003 में इराक पर हमला करना सही और जरूरी था ? बहरहाल ‘द इराक इन्क्वायरी’ नाम की इस रिपोर्ट को तैयार करने में जॉन चिल्कॉट को सात साल लगे। चिल्काॅट ने अपनी रिपोर्ट के दायरे में साल 2001 से 2009 के बीच एक दशक में ब्रिटिश सरकार के नीतिगत फैसलों को शामिल किया और रिपोर्ट पूरी करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि इंग्लैंड द्वारा जंग छेड़ने के फैसले में जल्दबाजी की गई। जांच रिपोर्ट में ब्लेयर द्वारा 28 जुलाई, 2002 को अमरीकी राष्ट्रपति जाॅर्ज डब्लू बुश को भेजे गए एक नोट का जिक्र है, जिससे इस बात का इशारा मिलता है कि जंग छेड़ने के फैसले पर क्यों इतनी जल्दी अमल हो गया। ब्लेयर ने अपने इस नोट में जाॅर्ज बुश को लिखा था कि ‘‘जो भी हो, मैं आपके साथ रहूंगा।’’ 12 वॉल्यूम और 6000 पन्नों की इस भारी भरकम रिपोर्ट में यह बात खास तौर से रेखांकित की गई है कि टाॅनी ब्लेयर को आगाह किया गया था कि इस हमले की एक परिणति गृह युद्ध और आतंक के रूप में हो सकती है, लेकिन उन्होंने इस संबंध में कोई ठोस पहल नहीं की। युद्ध में अकेले ब्रिटेन का 11.83 अरब यूरो खर्च हुआ है, लेकिन युद्ध में जाने से पहले उन्होंने खर्च का कोई आंकलन मंत्रियों से साझा नहीं किया था।

इस सनसनीखेज रिपोर्ट के आने के बाद जाहिर है ब्रिटेन की लेबर पार्टी जो कि उस वक्त सत्ता में थी, के नेता जेर्मी कोर्बिन ने इराक और ब्रिटेन दोनों देशों की जनता से माफी मांगी है, जिन्होंने इस जंग में अपनी जिंदगी का बहुत बड़ा सरमाया खोया है। अलबत्ता बीते साल ही टोनी ब्लेयर खुद सार्वजनिक तौर पर इस जंग के लिए इराक और दुनिया से माफी मांग चुके हैं। माफी मांगने के साथ ही उन्होंने यह बात भी मंजूर की थी कि ‘‘चरमपंथी इस्लामिक संगठन आईएस के जन्म के लिए कुछ हद तक उन पर इल्जाम लगाए जा सकते है। यदि इराक युद्ध नहीं होता, तो आज आईएस जैसा आतंकी संगठन पूरी दुनिया में हिंसा और आतंक नहीं बरपा रहा होता। वे सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद पैदा होने वाली स्थिति का सही आंकलन न कर पाए। जिसका खामियाजा आज भी इराक और सारी दुनिया भुगत रही है।’’ ब्लेयर ने युद्ध के बाद की रणनीति में हुई खुफिया गल्तियों के लिए भी माफी मांगी। हालांकि लड़ाई शुरू करने के अपने फैसले पर उन्हें आज भी कोई अफसोस नहीं है। इस बारे में उनका कहना है कि ‘‘तत्कालीन इराकी शासक सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए माफी मांगना मुश्किल है। यदि ऐसा न होता, तो इराक आज का सीरिया बन जाता। अगर इराक पर हमला नहीं किया जाता, तो वहां गृह युद्ध छिड़ने का खतरा था।’’ अब सवाल उठना लाजिमी है कि इराक में जिन लोगों ने जंग और जंग के बाद बने हालात में अपनों को खोया है, लेबर पार्टी और टाॅनी ब्लेयर की माफी क्या उन्हें वापिस लौटा देगी। जंग में उनके जो आशियाने उजड़े थे, वे घर अब कभी नहीं बस पाएंगे। इंसानियत के माथे पर जो अनगिनत जख्म लगे, क्या एक माफी उन्हें मिटा देगी ? क्या माफी से उनके गुनाह, धुल जाएंगे ?

इराक में सामूहिक जनसंहार करने वाले रासायनिक हथियार होने के शक की बुनियाद पर आज से तेरह साल पहले अमरीका और ब्रिटेन के नेतृत्व वाले एक गठबंधन की सेना ने ‘इराक की आजादी’ नामक सैन्य कार्रवाई करते हुए इराक पर हमला कर दिया था। 19 मार्च 2003 से शुरू हुआ यह युद्ध 1 मई 2003 तक चला। इस दौरान अमेरिकी नौसेना की क्रूज मिसाइलों ने इराक की राजधानी बगदाद समेत कई शहरों पर बम बरसाए। सिर्फ इक्कीस दिनों में बगदाद और इराक के कई बड़े शहर अमेरिका के शिकंजे में आ गए। इस युद्ध ने इराक में बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी थी। ब्रिटिश पत्रिका ‘द लांसेट’ के एक अध्ययन के मुताबिक ‘‘साल 2003 में इराक युद्ध की शुरुआत से लेकर साल 2011 में अमेरिकी सेना के वापस लौटने तक वहां कम से कम 1,16,000 आम नागरिक मारे गए और गठबंधन सेना के कोई 4,800 सैनिकों ने अपनी जान गंवायी। युद्ध के दौरान देश की स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने वाले ढांचे नष्ट हो गए, जिससे बड़ी संख्या में जख्मी और बीमार इराकियों को उचित स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाईं। लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा।’’ जंग से हुई तबाही के अक्श आज भी इराक में जगह-जगह दिखलाई देते हैं।

इराक जंग से उबरा, तो वह सुन्नी चरमपंथी समूह आईएस के कब्जे में आ गया। आईएस के जन्म के पीछे भी जंग के बाद बने भयंकर हालात थे, जिससे खाद-पानी लेकर आज उसने पूरे इराक के साथ-साथ सीरिया के भी एक बड़े हिस्से को अपने खौफनाक शिकंजे में ले लिया है। इराक और सीरिया में आईएस की हिंसा और आतंक का ही नतीजा है कि वहां के स्थानीय लोग अपने ही देश से बड़े पैमाने पर पलायन करने के लिए मजबूर हैं। दुनिया भर में आज जिन इलाकों से सबसे ज्यादा शरणार्थी निकल रहे हैं, उनमें इराक और सीरिया अव्वल हैं। आईएस की बर्बर हरकतों के चलते जहां इराक के 50 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं, तो वहीं सीरिया के हालात उससे भी खराब हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वहां विस्थापन शुरू होने के बाद से, 40 लाख से ज्यादा शरणार्थी दर्ज किए हैं। जबकि अपने ही देश में 70 लाख लोग आंतरिक विस्थापित के रुप में रह रहे हैं। इस तरह साल 2011 के बाद से सीरिया की आधी से भी ज्यादा आबादी अपने घरों से विस्थापित हो चुकी है। इराक जंग में हुई तबाही और जंग के बाद आईएस की हिंसा और आतंक के लिए यदि कोई जिम्मेदार है, तो वह अमेरिका और ब्रिटेन है। युद्ध में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टॉनी ब्लेयर दोनों की भूमिका की दुनिया भर में तीखी आलोचना हुई है। जिनकी वजह से लाखों लोगों की जिंदगी बर्बाद हो गई। जिन इल्जामों को लगाकर इराक पर अमरीका और ब्रिटेन ने सैन्य कार्यवाही की, वे सभी इल्जाम बाद में झूठे साबित हुए। जंग के बाद इराक में एक भी स्थान पर रासायनिक हथियार नहीं मिले। टॉनी ब्लेयर ही नहीं, जॉर्ज डब्ल्यू बुश भी इराक जंग के लिए अब अपनी गलती मान चुके हैं। अपनी किताब ‘डिसीजन पॉइंट्स’ में जाॅर्ज बुश ने इस बात का साफ जिक्र किया है कि इराक युद्ध में उनसे कई भारी गलतियां हुईं। किताब में वे एक जगह लिखते हंै,‘‘कार्यकाल के आखिरी दिनों में मैंने खुद को एक डूबते जहाज के कप्तान जैसा महसूस किया।’’ अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री मैडेलीन अलब्राइट ने भी इस बात को माना था कि ‘‘इराक युद्ध अमेरिका की सबसे बड़ी भूल थी, जिसका खामियाजा हम अभी भी भुगत रहे हैं।’’

इराक जंग मामले में जॉर्ज बुश और टॉनी ब्लेयर दोनों भले ही अपने-अपने देशवासियों और दुनिया भर को गुमराह करते रहे हों, लेकिन इस जंग की असली वजह सब जानते हैं। तेल व अन्य ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की हवस में तथा क्षेत्रीय वर्चस्व हासिल करने की अपनी वृहत्तर मुहिम की योजना के तौर पर अमेरिका और ब्रिटेन ने उस वक्त के खाड़ी के धनवान देश इराक के ऊपर सैन्य कार्यवाही की थी। इराक युद्ध पर किताब लिखने वाले ब्रिटिश अखबार ‘दि इंडिपेंडेंट’ के पूर्व पत्रकार जस्टिन हगलर कहते हैं कि ‘‘इराक युद्द की एक मात्र वजह तेल है। साल 2003 में जब बगदाद में कोहराम मचा, तो अमरीकियों ने सबसे पहले वहां के तेल को महफूज किया था, क्योंकि तेल ही ताकत है। ‘जनतंत्र’ और ‘मानव मूल्यों’ की स्थापना के नाम पर अमेरिका और ब्रिटेन ने इराक में जो कुछ किया, वह अब सारी दुनिया के सामने है। उन्होंने वहां ऐसी-ऐसी भयंकर तबाही बरपाई, जिसकी दूसरी मिसाल दुनिया के इतिहास में कम ही देखने को मिलेगी।’’

इराक में जंग शुरू हुई तब से लेकर आज तक वहां की सरजमीं स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय सत्ता संघर्ष का केंद्र बनी हुई है। जहां न तो सुरक्षा है और न ही आर्थिक स्थिरता। यही वजह है कि यहां के लोग अब अपने देश को, आईएस के लिए छोड़कर भाग रहे हैं। यदि जंग नहीं होती, तो आज इराक में ऐसे हालात नहीं होेते। एक जंग ने पूरे देश को ही तबाह करके रख दिया। युद्ध का खामियाजा वहां की पीढ़िया दर पीढ़िया भुगत रही हैं। सवाल पूछा जा सकता है कि अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ की मंशा और आईएईए की रिपोर्ट के खिलाफ जंग शुरू करने के लिए क्या युद्ध अपराधी नहीं मानना चाहिए ? इराक में जनसंहारक हथियारों की मौजूदगी के बारे में झूठ बोलकर जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर दोनों ने एक बड़ा अपराध किया था। इन दोनों ने इराक में जो किया वह सिर्फ और सिर्फ अपराध था। लेकिन उस अपराध की उन्हें कहीं भी सजा नहीं मिली। इराक पर हमले के बाद ही इराक और सीरिया में गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि बनी और इसी वजह से पश्चिम एशिया में बड़े पैमाने पर विवाद शुरू हुए। इस अकेले हमले ने इतिहास की सबसे अस्थिर और विभाजित दुनिया को बनाया। इराक जंग की ही वजह से एक कट्टरपंथी विचारधारा का विस्तार न सिर्फ मुस्लिम बहुल देशों तक हुआ, बल्कि इससे पश्चिम के देश भी नहीं बच पाए। जाहिर है इसकी पूरी-पूरी जवाबदेही अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और ब्रिटिश पूर्व प्रधानमंत्री टाॅनी ब्लेयर की है। इन दोनों के ही ऊपर युद्ध अपराध का माकूल मामला बनता है। जाॅर्ज बुश और टॉनी ब्लेयर ने इराक में जो कुछ किया, उसके लिए होना तो यह चाहिए था कि उन्हें हेग की अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक अदालत के कठघरे में खड़ा किया जाता और गुनहगार साबित होने पर उन्हें सजा दी जाती। इराक पर हमले के अमेरिका के फैसले में शामिल होने के ब्लेयर के निर्णय से सारी दुनिया को एक सबक जरूर सीखना चाहिए, दो देशों के बीच युद्ध हमेशा एक अंतिम उपाय होता है।

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