अमां मंदिर मस्जिद छोडो रोजी रोटी का जुगाड़ बताओ....

AYODHYA


अयोध्या से भाष्कर दत्त तिवारी। 6 दिसम्बर की सुबह बाबरी विध्वंस की 24वीं बरसी की सुबह मीडिया की टीमें अयोध्या की ओर रवाना हुई हम भी अयोध्या की राहन पर चल पड़े। इस प्राचीन धार्मिक नगरी के प्रवेश द्वार पर टेढ़ी बाज़ार पहुचते ही हमने अपनी गाडी पर ब्रेक लगाया और चाय की दूकान पर लोगों की भीड़ जमा देख उनसे बातचीत करने पहुचे गए,केतली में चाय उबल रही है थी और जबार मियाँ इंतज़ार में थे कुछ देर हमने लोगों को बातें करते सुना जिसमे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन पर लोग चर्चा कर रहे थे कुछ लोग नोटबंदी पर चर्चा में मशगूल थे कुछ दुनयाबी बातों में उलझे थे लेकिन इतने लोगों की भीड़ में किसी की जुबान पर उस मुद्दे को लेकर कोई चर्चा नही थी जिसकी तलाश में हम अयोध्या पहुचे थे फिर भी हमने अचानक जब्बर मियाँ से बाबरी विध्वंस और मंदिर मस्जिद पर चर्चा करनी चाही तो उन्होंने कहा अमां मंदिर मस्जिद छोडो रोजी रोटी का जुगाड़ बताओ पहले से ही धंधा मंदा चल रहा है मंदिर मस्जिद से अपना क्या भला होने वाले है इबादत ही करनी है तो वो किसी भी मस्जिद में कर सकते हैं खुदा तो हर मस्जिद में रहता है सियासी बातों में न उलझाओ कुछ धंधे पानी की बात करो तो तुम्हे टाइम दें ...आपने जब्बर मियाँ की बातों को सुना आपको इस बात का अंदाज़ा हो गया होगा कि अयोध्या की आवाम क्या सोचती है बाकि जिसे यौमे गम और शौर्य दिवस मनाना है मनाता रहे |

सन 92 की घटना को समाज के दोनों वर्गों ने शर्मनाक बताया

दुनिया भर में अयोध्या की पहचान तो भगवान् श्री राम की जन्मस्थली के रूप में है और दुनिया भर में बसे हिन्दू समाज के लोग इस नगरी को आस्था की दृष्टि से देखते है,अयोध्या के किनारे बहने वाली सरयू नदी में स्नान कर लोग अपने जन्म जन्मान्तर के पाप मिटाते है घाट के किनारे बछिया की पूँछ पकड़ कर जीवन रूप कालचक्र की वैतरणी पार करने की कोशिश करते है,अयोध्या के मंदिरों में दर्शन पूजन कर अपने जीवन को कृतार्थ करते है ये पहचान है अयोध्या की पर इसके अलावा भी अयोध्या की एक पहचान है जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आचरण के खिलाफ है और वो है अयोध्या में मंदिर मस्जिद के नाम पर बहा खून ....

अयोध्या का मतलब जहां कभी युद्ध नहीं हुआ 

अयोध्या का शाब्दिक अर्थ है जहां कभी युद्ध न हो अगर यह भगवान् श्री राम की नगरी है तो अपने चरित्र के चलते दुनिया भर में मर्यादा पुरुषोत्तम का दर्जा पाने वाले भगवान् राम को भी इस बात से कष्ट पहुचा होगा की उनकी नगरी में उनके मंदिर के लिए खून खराब हुआ जिस नगर के नाम का अर्थ यही है जहां कभी युद्ध न हो उस नगरी को सियासत की बिसात बनाकर सियासतदान अपनी ज़रुरत के मुताबिक़ चालें चल रहे है जिसका खामियाजा उठा रही है अयोध्या ...जो समय समय पर देश की राजनीती की दिशा दशा तो तय कर देती है लेकिन खुद के विकास की राह में कही भटक गयी है |

24 वर्षो में अयोध्या के लोगो को सुरक्षा की बंदिशों के सिवा नहीं मिला कुछ

सन 1984 में बंगाल से अपना घर बार बेचकर अयोध्या में गृहस्थी बसाने आये सुफल चन्द्र मौर्या उर्फ़ बंगाली दादा बीते 30 वर्षो से अयोध्या के हनुमानगढ़ी चौराहे पर प्रसाद की दूकान चलाते है,अपनी आँखों से अयोध्या आन्दोलन और ६ दिसंबर का मंज़र देख चुके बंगाली दादा कहते है आज से 24 साल पहले अयोध्या में कहीं भी कभी जाने की छूट थी लेकिन मंदिर के नाम पर यहाँ सुरक्षा इतनी बढ़ा दी गयी की अब लोग आने से कतराते है,वही राम जन्मभूमि बैरियर के पास प्रसाद बेचकर अपनी जीविका चलाने वाले राम प्रसाद का कहना है की यही पैदा हुए यही पले बढे पर हालत ये है की देर शाम अगर कही से घर आना हो तो अपने घर जाने के लिए सुरक्षा में तैनात लोगो को तलाशी और मिन्नत करनी पड़ती है,वही विवादित परिसर के पास ही कपडे की दूकान चलाने वाले अविनाश चन्द्र गुप्ता की माने तो अयोध्या की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन सुरक्षा के नाम पर यहाँ के आम लोगो से ज्यादती की जा रही है सामान से भरी गाडियों को रोक दिया जाता है जिस से व्यवसाय चौपट होने की कगार पर है |

जब जब हुए आन्दोलन तब तब ठंडी पड़ी यहाँ के लोगो के चूल्हे की आग

तारिख इस बात की गवाह रही है की अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 का आन्दोलन रहा हो साल 2003 का शिलादान कार्यक्रम रहा है अयोध्या पर फैसले की महत्वपूर्ण तारीख रही हो या विहिप की 84 कोसी परिक्रमा... सियासत कर मीडिया में अपने चहरे चमकाने तो देश भर से अलग अलग संगठनों के लोग अयोध्या आये पर इस तरह के आन्दोलनों का असर यहाँ की जनता पर ये रहा की पहले की सुरक्षा की जंजीरों में जकड़ी अयोध्या में इन आन्दोलनों को लेकर चौकसी इतनी बढ़ गयी की आम श्रधालुओ का अयोध्या में प्रवेश तक प्रतिबंधित हो गया,ऐसे में जिन श्रधालुओ और यात्रियों के सहारे अयोध्या की अर्थव्यवस्था टिकी हो अगर वही अयोध्या नहीं आ पाते तो जाहिर तौर पर अयोध्या में रहने वाली आबादी का करीब आधा हिस्सा फांका करने पर मजबूर हो जाती है| कुल मिलकर सन 1990 के आन्दोलन से लेकर आज की तारिख तक अगर अयोध्या के लोग खोने और पाने का आकलन करते है तो उनके हिस्से सिवाय बंदिशों दुश्वारियो और बेरोजगारी के सिवा कुछ नहीं मिलता और अयोध्या में रहने वाले आम नागरिक की जुबां से बस यही निकलता है की अगर कुछ करना ही है तो अयोध्या का विकास करो क्यूंकि भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता अयोध्या के लोगो के लिए राम जितने ज़रूरी है उतनी ही ज़रूरी रोटी भी है |
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