वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं

वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं


 पंकज के. सिंह @ उर्जांचल टाईगर 
हिंद महासागर क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए भारत द्वारा गंभीर रणनीतिक प्रयास शुरू किए गए हैं। भारतीय प्रधानमंत्री का हिंद महासागर दौरा कूटनीतिक तथा रणनैतिक दृष्टि से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है। भारत को इस संपूर्ण क्षेत्र में नए सिरे से काम करने की आवश्यकता है, क्योंकि सैन्य एवं सुरक्षा दृष्टिकोण से भारत हिंद महासागर क्षेत्र को कदापि नजरंदाज नहीं कर सकता। भारत को कई और ऐसे द्वीपों की ओर भी ध्यान आकृष्ट करना होगा, जो हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय हितों के मद्देनजर बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। सेशेल्स, मेडागास्कर, मारीशस अफ्रीकी तटों से अधिक नजदीक होने के कारण अफ्रीकी महाद्वीप का भी हिस्सा माने जाते हैं। चीन इस क्षेत्र में बहुत अधिक सक्रिय है और अनेक बड़े प्रोजेक्ट व परियोजनाओं के साथ वह इस क्षेत्र में एकाधिकार स्थापित करने के लिए बहुत व्यग्र व अधीर दिखाई पड़ रहा है। 

हालांकि दिखने में हिंद महासागर के ये छोटे-छोटे द्वीपीय देश आकार, आबादी और सामर्थ्य में यद्यपि बहुत छोटे हैं, परंतु सामरिक दृष्टि से ये बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं। चीन ने कई वर्ष पूर्व ही समय रहते इन द्वीपीय देशों के महत्व को पहचान लिया था और उसके अनुरूप ही अपने कूटनीतिक कार्यक्रमों को आकार दिया था। आज इसका लाभ चीन को स्पष्ट रूप से मिलता हुआ दिखाई पड़ रहा है। अनेक सुरक्षा विशेषज्ञ पिछले कई दशकों से यह कहते ही रहे हैं कि हिंद महासागर क्षेत्र में जिस देश का प्रभुत्व होगा, वास्तव में वही संपूर्ण विश्व पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकेगा। शीतयुद्ध के युग में हिंद महासागर क्षेत्र में अपना प्रभुत्व और एकाधिकार बनाए रखने के लिए अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के मध्य निरंतर होड़ बनी रही थी। 

सोवियत संघ के विघटन के उपरांत इस इलाके में ‘डिएगो गार्शिया’ द्वीप की सहायता से अमेरिका ने अपना दबदबा स्थापित कर दिया था। सोवियत संघ के समापन के बाद चीन उसका स्थान लेने का प्रयत्न कर रहा है और निश्चित रूप से उसे इस दिशा में काफी सफलता भी प्राप्त हुई है। भारत को भी इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सफलताएं अभी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। भारत को इस क्षेत्र में ठोस परियोजनाओं और प्रभावशाली सामरिक रणनीतियों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है, जैसा कि चीन द्वारा पिछले एक दशक में किया गया है। 

पिछले कुछ दशकों में भारत द्वारा वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में गंभीरता से प्रयास नहीं किए गए। विदेश नीति के मोर्चे पर ढुलमुल रवैया अपनाया गया। कूटनीतिक और सामरिक दृष्टि से भी एक तदर्थवादी दृष्टिकोण के कारण भारत ने क्षेत्रीय प्रभुत्व के संघर्ष में अपनी स्थिति बहुत कमजोर कर ली थी। चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच संपूर्ण एशिया क्षेत्र में भारत तुलनात्मक रूप से बहुत पीछे चला गया था। पिछले दो दशक विदेश नीति के स्तर पर भारत के लिए रणनीतिक शून्यता वाले रहे हैं। दीर्घकालिक नेतृत्व संकट का परिणाम यह रहा है कि गत कुछ वर्षों में क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर भारत का तेजी से क्षरण होता गया है। शक्ति और प्रतिष्ठा के लिहाज से चीन और भारत के बीच की खाई पिछले दो दशकों में और अधिक चौड़ी होती चली गई है। पिछले एक दशक में भारत के क्षेत्रीय प्रभुत्व में भी कमी आई है। यहां तक कि एक छोटे से देश मालदीव ने भी अत्यंत लापरवाह ढंग से भारत की अनदेखी की। 

मालदीव ने अपनी राजधानी माले से भारतीय एयरपोर्ट के संचालक को हटा दिया और किसी भी प्रकार के परिणाम की चिंता किए वगैर सार्वजनिक रूप से भारतीय राजनयिक को बुलाकर फटकार तक लगा डाली। इसी प्रकार नेपाल में भी भारत ने खुद को चीन के साथ प्रतिर्स्पधा में निरंतर पीछे ही पाया है। श्रीलंका में भी भारत, चीन से निरंतर पिछड़ता ही चला गया है। भारत के संदर्भ में यह विरोधाभास स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था जहां एक ओर लगातार तेजी से आगे बढ़ रही है, वहीं क्षेत्रीय प्रभाव की दृष्टि से भारत निरंतर पिछड़ता चला गया है। स्पष्ट है कि गत दो दशकों में गतिशील और दूरदर्शी नेतृत्व तथा दृढ़ रणनीतिक लक्ष्य के अभाव में भारत में आर्थिक विकास की प्रक्रिया एक सशक्त विदेश नीति में परिवर्तित नहीं हो सकी। 

प्रधानमंत्री के नेतृत्व में अब भारत ने पुनः अपनी विदेश नीति को नए ढंग से कसना शुरू किया है। क्षेत्रीय स्तर पर प्रभुत्व की पुर्नस्थापना के उद्देश्य से भारतीय कूटनीति ने रचनात्मक दिशा में कदम बढ़ाए हैं। अब भारत की पड़ोसी देशों के प्रति बदली नीति से नेपाल-भूटान में हालात पहले से बेहतर हुए हैं। इससे चीन बेचौन हो उठा है। नेपाल-भूटान सीमा पर सीमा सशस्त्र बल व खुफिया विभाग की रिपोर्ट के अनुसार चीन, नेपाल में भारतीय सीमा से जुड़े क्षेत्रों में अपने 22 अध्ययन केंद्र चला रहा है। इन अध्ययन केंद्रों में चीन की संस्कृति, परंपरा, शिक्षा, अर्थव्यवस्था के बारे में प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। 

भारत और नेपाल सीमा जिस तरह से खुली है, वैसे ही नेपाल-चीन सीमा पर भी आवाजाही पर कोई रोक-टोक नहीं है। नेपाल के माओवाद प्रभावित तराई जिले ‘झापा-इलाम’ में चीनी केंद्रों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। चीन ने नेपाल-भूटान सीमा पर भी दो दर्जन से अधिक बौद्ध मठों की स्थापना कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका मकसद सीमांत क्षेत्रों में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे तिब्बती मूल के युवाओं में चीन के प्रति घृणा के भाव को कम करना है। 

यद्यपि भारत सदैव से ही शांतिपूर्ण और सहिष्णु संबंधों की स्थापना का प्रयास करता रहा है। भारत ने ‘अतिथि देवो भवरू’ की अपनी प्राचीन परम्परा और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शालीन शिष्टाचार की आधुनिक परंपरा का अनुसरण करते हुए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत में पलक पांवड़े बिछा दिए, परंतु चीन के शक्तिशाली राष्ट्रपति ने एक ‘कूटनीतिक मुस्कुराहट’ के अतिरिक्त भारत को कुछ और नहीं दिया। न उन्होंने भारत में 100 बिलियन डॉलर के चीनी निवेश का वादा किया और न ही सुरक्षा परिषद में भारत को सदस्यता पाने में मदद का ही कोई वायदा उन्होंने किया। इसी प्रकार न ही जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के आक्रामक इरादों पर अंकुश लगाने का और न ही पिछले 60 साल से भारत के लिए नासूर बने सीमा विवाद को हल करने की दिशा में ही उन्होंने कोई रचनात्मक पहल करने की कोशिश ही की। 

भारतीय प्रधानमंत्री के स्पष्ट शब्दों में यह कहने पर कि सीमा विवाद हल हुए बिना दोनों देशों के मैत्री संबंध आगे नहीं बढ़ सकते, चीनी राष्ट्रपति ने बेहद ठंडे ढंग से मात्र इतना ही कहा कि यह विवाद लंबे इतिहास की देन है और उसे धीरे-धीरे ही सुलझाया जा सकेगा। उस दिशा में किसी ठोस पहल का उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया। चीनी राष्ट्रपति के इस टेढ़े रुख पर भारतीय मीडिया और राजनीतिक क्षेत्रों में आलोचनात्मक स्वर उठना स्वाभाविक ही है। चीन की कूटनीति के सूक्ष्म अध्येता और जानकार चीन के इस अति आत्मकेंद्रित व्यवहार पर कोई आश्चर्य नहीं कर रहे हैं। यह एक तथ्य है कि चीन अपने राष्ट्रीय हितों एवं सामरिक सुरक्षा के प्रति सदैव ही बहुत जागरूक और चिंतित रहा है। यहां तक कि उसने अपने कम्युनिस्ट साथी सोवियत संघ से भी सीमा विवाद पर कोई समझौता नहीं किया था। इसके कारण स्टालिन और माओत्से तुंग के संबंधों में खटास आ गई थी और 1962 तक रूस और चीन के रास्ते अलग हो गए थे।  

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