शहीदों का अपमान

शहीदों का अपमान


पंकज के. सिंह@ उर्जांचल टाईगर 

भारत में शहीदों का अपमान करने की एक स्थाई प्रवृत्ति बन गई है। भारतीय सीमाओं की रक्षा करते हुए प्रतिदिन वीर भारतीय सैनिक शहीद होते हैं, परंतु उनकी शहादत का कोई मोल देश को हासिल नहीं होता है और कुछ समय बाद फिर वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति बन जाती है। शहीदों की चिताओं पर अलगाववादियों और आतंकवादियों के साथ वार्ता की मेज सजा दी जाती है। भारत को अपने शहीदों की कीमत का संभवतः सही आंकलन नहीं है। इस संदर्भ में उसे अमेरिका से सबक लेना चाहिए। अमेरिका विश्वभर में अनेक सैन्य अभियान संचालित करता रहा है, परंतु अपने एक-एक सैनिक की जान की सुरक्षा के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है। अमेरिका अपने एक भी सैनिक को व्यर्थ शहीद नहीं होने देता। 

अमेरिका द्वारा विश्व के अनेक क्षेत्रों में आतंकवादरोधी सैन्य अभियान संचालित किए गए हैं, परंतु यदि एक भी अमेरिकी सैनिक हताहत हो जाए, तो अमेरिका में हंगामा मच जाता है और सरकार को सदन से लेकर सड़कों तक जवाब देना पड़ता है। अमेरिका अपने सैनिकों की रक्षा के लिए कई गुना खर्च कर उन्नत तकनीक और उपकरणों का प्रयोग करता है, ताकि उसके सैनिकों का जीवन सुरक्षित रहे। इसके विपरीत भारतीय सैनिक अपने ही देश की सीमाओं में आतंकियों की गोलियों और हमलों का शिकार होते रहते हैं। आतंकियों के हर हमले अथवा उनके साथ मुठभेड़ के बाद मात्र यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि घुसपैठियों तथा आतंकियों की खतरनाक गतिविधियों को सफल नहीं होने दिया जाएगा। इस प्रकार के हल्के-फुल्के दावों से भारत विरोधी शक्तियों में कहीं कोई घबराहट नहीं होती। भारत के उदार तथा उदासीन रवैये के कारण कई बार आतंकी गुटों के हौसले और अधिक बढ़ जाते हैं। यद्यपि फिलहाल निःसंदेह आतंकी गुटों के मंसूबे सफल नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि उनसे सुरक्षा करने के क्रम में देश को हमारे अमूल्य जवानों की आहुति देनी पड़ रही है। इस सिलसिले पर लगाम कैसे लगे, इस पर राज्य सरकार को भी नए सिरे से विचार करना होगा और केंद्र सरकार को भी। इसके लिए हरसंभव उपाय किए जाने चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि तमाम संसाधनों के बावजूद आवश्यक उपाय करने से बचा जा रहा है। इस तरह के तर्को को सुनते हुए अच्छा खासा समय हो गया है कि कश्मीर में मुट्ठी भर ही आतंकी बचे हैं और रह-रहकर जो हमले हो रहे हैं वे मुख्य रूप से सीमा पार से आए आतंकियों की ओर से किए जा रहे हैं।

एक चिंता का विषय यह भी है कि सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर भी कोई प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है। एक बार फिर यह कहा जा रहा है कि कश्मीर घाटी में मुश्किल से कुछ ही आतंकी गुट सक्रिय हैं। इस प्रकार के उदासीन एवं अपरिपक्व तथ्य प्रस्तुत कर स्वयं भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह संकेत दे रहा है कि कश्मीर में आतंकवाद की स्थिति काबू में है। कूटनीतिक दृष्टि से इस प्रकार के संकेत देना कदापित भारतीय हित में नहीं कहा जा सकता। यह आंकलन सही भी हो सकता है, लेकिन क्या इसकी गारंटी ली जा सकती है कि सीमा पार से आतंकी घुसपैठ नहीं होने दी जाएगी? 

आतंकी हमले रोकने के लिए और अधिक सक्रियता की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि रह-रहकर ऐसी खबरें आ रही हैं कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अभी भी सैकड़ों आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है और वे घुसपैठ की ताक में भी हैं। यह गंभीर स्थिति है और इसका मुकाबला तभी किया जा सकता है जब पाकिस्तान पर दबाव बनाया जाए। फिलहाल यह कहना कठिन है कि इस मामले में कोई उल्लेखनीय सफलता मिलती दिख रही है और शायद यही कारण है कि कश्मीर में आतंकियों की सक्रियता भी जारी है और उसके नतीजे में जवानों की शहादत का सिलसिला भी कायम है।
दुर्भाग्य से भारत एक ऐसा देश है, जहां क्रांति और शहादत को पड़ोसी के घर का काम माना जाता है। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के आंदोलन में भी लाखों शहीदों और क्रांतिकारियों की भूमिका को हमेशा कम करके देश की जनता की सामने रखा गया है। भारत की नई पीढ़ी के शैक्षिक पाठ्यक्रमों में जान-बूझकर शहीदों और क्रांतिकारियों को पर्याप्त सम्मान और स्थान नहीं दिया गया है। भारतीय क्रांतिकारियों और राष्ट्रभक्त शहीदों की शहादत का अपमान करते हुए भारत में ‘दे दी हमें आजादी, बिना खड्ग, बिना ढाल’ जैसे खोखले और ढपोरशंखी गीत रचे और गाए जाते रहे हैं। 

देश को और इसके 125 करोड़ नागरिकों को आज यह भलि-भांति समझ लेना चाहिए कि यदि अंग्रेजों ने 250 वर्षों तक भारत पर राज करने के बाद भारत को स्वतंत्र किया, तो न तो यह कोई मेज पर बैठकर निजी राजनीति चमकाने वाली गाल-बजाऊ वार्ताओं के कारण संभव हुआ था और न ही कोई अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्रता दान स्वरूप प्रदान की थी, वरन इसके पीछे क्रांतिकारियों और शहीदों की शौर्यगाथा थी, जिससे विदेशी आक्रांताओं को यह स्पष्ट अहसास हो गया था कि अब भारत में उनके लिए राज करना संभव नहीं होगा। सच तो यह है कि क्रांतिकारियों और शहीदों से घबराकर अंग्रेजों ने जान-बूझकर बेहद शातिराना ढंग से कांग्रेस में ब्रिटिश राज के प्रति उदार व वफादार नेताओं की एक ऐसी नई फौज उतार दी थी, जो वार्ताओं की आड़ में देश की जनता को उलझाकर दो से तीन दशक तक और भारत में ब्रिटिश राज को खींचने में सफल रही। यह दुर्भाग्य है कि बाद में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यही कथित उदार और वफादार नेता जबरन भारत के नायकों के रूप में देश की अज्ञानी और निरीह जनता पर थोप दिए गए। भारत की आज तमाम समस्याओं की जड़ वही राजनैतिक विरासत है, जो मानसिक रूप से ब्रिटिश राज की गुलाम थी और जिसे अंग्रेज अपने मानसपुत्रों के रूप में देश पर थोप गए थे।

Disclaimer : The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of Urjanchal Tiger.

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