वास्तव में जनता टैक्स चोर है?


आम आदमी को बदनाम मत करो। 

इक़बाल हिन्दुस्तानी 
हमारे देश में जनता का यह आरोप रहा है कि अपवादों को छोड़कर आमतौर पर नेता बेईमान और झूठे होते हैं। लेकिन नेताओं ने खुद को ईमानदार और सच्चा साबित करने की बजाये जनता को टैक्स चोर बताना शुरू कर दिया है।
पहले हमारे देश में यह धरणा बनाई गयी कि व्यापारी अकसर टैक्स चोरी करते हैं। इसके बाद इस दायरे का विस्तार करते हुए लगभग सारी जनता को को लपेटे में ले लिया गया। सरकार का कहना है कि देश की सवा सौ करोड़ आबादी में मात्र 3 करोड़ 60 लाख लोग ही इनकम टैक्स अदा करते हैं। सरकार का दावा है कि मुल्क में वास्तव में इतने कम लोग आयकर दाता कैसे नहीं हो सकते। जब हम 125 करोड़ और 3.6करोड़ के आंकड़े को आमने सामने रखते हैं तो वास्तव में ऐसा भ्रम होना स्वाभाविक है कि अधिकांश जनता कर चोरी कर रही है। कई बार मिथक और झूठ का इतना प्रोपेगंडा किया जाता है कि वह सच पर भारी पड़ने लगता है। इतनी बड़ी विशाल आबादी के समंदर से इतने कम लोगों का आयकर देना भी पानी की चंद बूंदों जैसा ही लगता है। इससे खुद ब खुद यह लगने लगता है कि हो न हो जनता कर ज़रूर चुरा रही है। हो सकता है कि ऐसा किसी हद तक सही भी हो। लेकिन जिस कुल आबादी से आयकर देनेवाले मामूली तादाद के लोगों की तुलना की जारही है। वह तुलना ही बिल्कुल गलत है। आज हम आपको इन आंकड़ों के पीछे छिपे असली खेल को समझायेंगे। हो सकता है यह ब्लॉग पढ़ने से पहले आप भी इस अपराध बोध से ग्रस्त हो कि वास्तव में जनता का अधिकांश हिस्सा टैक्स चोर होगा ही। 
आपको पता नहीं होगा कि 125 करोड़ की आबादी में खुद सरकार आंकड़ो के अनुसार 43 करोड़ तो 18 साल से कम आयु के युवा हैं। अगर आपको यह पता चल गया कि देश की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत तो नाबालिग है। जिस पर टैक्स लागू ही नहीं है तो आपको यह भी पता ही होगा कि अगर कोई युवा 18 साल से कम आयु का होकर भी काम धंधा करता है तो उसकी आय उसके संरक्षक यानी माता पिता के इनकम टैक्स रिटर्न में शामिल करके दिखाई जाती है। ऐसे में उस नाबालिग के परिवार वाले भले ही अप्रत्यक्ष रूप से उसकी ओर से सरकार को उसकी ओर वाजिब कर अदा कर दें। लेकिन वह नाबालिग तो सरकर के रिकॉर्ड पर आयकर दाता के तौर पर अलग से दर्ज होता नहीं। इससे कुल करदाताओं की तादाद भी उस नाबालिग के टैक्स अदा करने के बावजूद उतनी ही रहती है।वैसे अधिकांश नाबालिग कमाने की हालत मेंहोते भी नहीं। अब इन 43 करोड़ को अगर सवासौ करोड़ में से कम कर दें तो बाकी तादाद कुल आबादी में से 82 करोड़ बचती है। इनमें से 75प्रतिशत यानी 61.50 करोड़ किसान हैं। जिनकोस्वयं सरकार ने इनकम टैक्स की रेंज से बाहर रखा हुआ है। अब बाकी बचते हैं 20.5 करोड़लोग। इनमें से 5.5 करोड़ भूमिहीन और बीपीएल की श्रेणी में आते हैं। अब शेष 15करोड़ में से 11.40 करोड़ वरिष्ठ नागरिक घरेलू महिलायें और 18 साल से बड़े लेकिन बेरोज़गार नागरिक रह जाते हैं। 15 करोड़ में से 11.40करोड़ घटाकर देखिये तो 3.60 करोड़ लोग ही बाकी बचते हैं तो जनाब इतने लोग तो पहले सेही टैक्स दे रहे है। सरकार फिर किन लोगों के खिलाफ टैक्स चोर का शोर मचा कर पूरे देश को गुमराह कर रही है। यह माना जा सकता है कि किसान की आड़ में कई बड़े नेताओं से लेकर कारपोरेट तक अपनी काली कमाई को खेती की आय बताकर सफेद कर लेते हैं। लेकिन बेचारे आम आदमी को बदनाम मत करो। आबादी का आंकड़ा 125 करोड़ थोड़ा पुराना हो सकता है।आज की तारीख़ में जनसंख्या कुछ बढ़ गयी है।लेकिन जिन लोगों की चर्चा टैक्स न देने वालों में की गयी है उनका आंकड़ा भी पुराना ही है।

मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा,उसको छुट्टी ना मिली जिसने सबक याद किया।
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