बाबा की मैली चादर और बौना होता प्रशासक

अब्दुल रशीद।। नाबालिग से बलात्कार के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी ठहराने के साथ ही हरियाणा का आम तौर पर शांत और सहज रहने वाले पंचकूला शहर सुलगने लगा और हर तरफ मौत और तबाही का मंजर देखने को मिला। सवाल उठता है कि क्या इन हालात को टाला जा सकता था? 
यह पहला मामला नहीं इससे पहले जाट आरक्षण का मुद्दा और फिर संत रामपाल और अब डेरा सच्चा सौदा का मामला इन तीनो मामले में सरकार ने भीड़ को इकठ्ठा होने दिया जिसके कारण हालात इतना भयावह हुआ। वोट की राजनीति कहें या सरकार की अकर्मण्यता उपरोक्त ममाले में सरकार सख्ती से पेश आती नहीं दिखी। 
जब डेरा सच्चा सौदा के समर्थक इकठ्ठा हो रहे थे तो कहा जा रहा था यह आस्था का विषय है लोग गुरु के दर्शन के लिए आ रहे हैं। यह बात गले से इस लिए भी नहीं उतरती क्योंकि गुरु का दर्शन करना उद्देश्य था तो समर्थक सिरसा जाते न कि पंचकुला आते। सैकड़ों गाड़ियों के काफिले के साथ बलात्कार का एक आरोपी अदालत में पेश होने के लिए निकला। वो भी ऐसे, जैसे कोई गर्व से भरी शोभा यात्रा निकल रही हो। राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाली पुलिस ने सैकड़ों गाड़ियों को सिरसा से पंचकुला तक जाने दिया। लाखों की तादाद में समर्थकों को जमा होने दिया।ऐसा लगता है की सरकार के नुमाइंदे डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों को रोकने के लिए गंभीर प्रयास नहीं कर रहे थे जो उनके प्रति सरकार के उदारभाव को दर्शाता है। जाट और राम पाल मामले में भी कुछ इसतरह के भाव ही सरकार के तरफ से प्रदर्शित हुए था। 

क्या है वोट बैंक की राजनीती 

डेरा समर्थको का राजनीति में इतना अहमियत उनके वोट के कारण है जो हार जीत तय कराती है।सिरसा के अलावा हरियाणा के कई जिलों में डेरा का प्रभाव है जिसका फायदा 2014के चुनाव में बीजेपी को कई सीटों पर मिला और जीत हासिल हुई।जीत हासिल होने के बाद गुरमीत रामरहीम को धन्यवाद अदा करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ बीजेपी के उम्मीदवार सिरसा गए थे। चुनावी समर्थन का खेल ही असल अवरोधक होता है बाबाओं के खिलाफ सख्त कदम उठाने में। जब सत्ताधारी पार्टी के विधायक और मंत्री किसी संत के आगे माथा टेकता है तो अधिकारियों को क्या सन्देश जाएगा? 
डेरा समर्थक ज्यादातर दलित और पिछड़ी जाती से आते हैं इन लोग को डेरा सच्चा सौदा सम्मान से जीने और अपनी पहचान बनाने का मौक़ा देता है यही कारण है के डेरा के भक्त अपने बाबा पर पूरी तरह आस्थावान होते हैं।पिछड़े और दलित वर्ग का वोट लेने की चाह में राजनेता चुनाव के वक्त बाबा का आशीर्वाद लेने जाते हैं। गुरमीत राम रहीम भी अपने फायदे के मुताबिक़ राजनेताओं का समर्थन करते हैं। चाहे कांग्रेस हो ,बीजेपी या इंडियन नेशनल लोकदल,डेरा प्रमुख को कोई नाराज़ नहीं करना चाहता क्योंकि सभी पार्टियां उनसे वोट मांगने जाती रही है। 

सरकार का 'क्लैरिकल मिस्टेक' 

हाई कोर्ट में जब डेरा प्रमुख का केस लगा हुआ था तब एक वकील ने एक याचिका दायर किया था जिसमें सरकार पंचकुला में व्यवस्था बनाने में नाकामयाबी और हज़ारों लोग इकट्ठा होने से लोगों में असुरक्षा का भाव जिक्र किया गया।इस याचिका पर सरकार से कोर्ट द्वारा पूछे गए सवाल पर कि आपने क्या इंतज़ाम किए हैं के जवाब में सरकार ने कहा कि हमने सेक्शन 144 का ऑर्डर निकालकर निषेधाज्ञा लागू कर दी है। लेकिन जब उसे पढ़ा गया तो उसमें लिखा था कि शस्त्र ले जाने पर पाबंदी है, लोगों के जाने पर पाबंदी नहीं है।जब चीफ जस्टिस की बेंच ने पूछा कि यह क्या है तो सरकार ने कहा कि यह 'क्लैरिकल मिस्टेक' है,तो कोर्ट ने कहा कि इसमें सरकार और डेरा के बीच में मिलीभगत नज़र आ रही है। 

कड़े निर्देश की जरुरत 

जब डेरा के समर्थक पंचकुला में तांडव कर रहे थे उस वक्त मुख्यमंत्री खट्टर मीटिंग कर रहे थे। शहर तितर बितर हो गया राष्ट्र की सम्पत्ति जला दी गई, हाईकोर्ट ने नुकसान की भरपाई के लिए डेरा सच्चा सौदा के संपत्ति को जप्त करने का आदेश दिया है। लेकिन नेताओं को कुर्सी प्रेम ने इस कदर जकड़ लिया है,की इतनी तबाही के बाद भी कोई ठोस कदम उठाने के बजाय राजनीतिक उद्देश्य साधते दिखे। यह बात न केवल दुखद है बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी गहरी चोट पहुंचाता है।बलात्कार का एक आरोपी अगर 200 से ज्यादा ट्रेनें रद्द करवा दे, कई जिलों में कर्फ्यू लगवा दे, तो राज्य को अपनी पीठ थपथपाने के बजाय अपनी अक्षमता पर चिंतन करना चाहिए समझना चाहिए कि वह कितना पंगु हो चुका है। और फिलहाल इस पंगुता का सबसे बड़ा चेहरा मनोहर लाल खट्टर हैं।मुश्किल हालात में ही नेतृत्व की असली परीक्षा होती है। राम रहीम का मामला भी ऐसा ही था। और जिस तरह की हिंसा हुई, उससे साफ पता चलता है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री एक नाकाम प्रशासक हैं। 

सरकार यदि इतनी बड़ी तबाही से भी सबक लेते हुए कोई कड़े सन्देश उपद्रवियों को नहीं देती तो आने वाले 28 अगस्त को डेरा प्रमुख को सज़ा सुनाने के बाद स्थिति ख़राब नहीं होगा इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। 

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