सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं।

मुंशी प्रेमचंद जी की यादे

मुंशी प्रेमचंद 
"अगर स्वराज आने पर भी संपत्ति का यही प्रभुत्व रहे और पढ़ा-लिखा समाज यों ही स्वार्थांध बना रहे तो मैं कहूँगी , ऐसे स्वराज का न आना ही अच्छा।"
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राजेश वर्मा 
आज जब ग्रामीण जीवन का यथार्थ हाशिए पर चला गया गया है , तब प्रेमचंद जैसे साहित्यकार बेहद याद आते है , जो आखिरी सांस तक ग्रामिण समाज में हाशिए पर पड़े लोगों से जुड़े साहित्य रचते रहे । प्रेमचंद के समय का भारत और आज के भारत में काफी अंतर आ चुका है । स्वतंत्र भारत की कथा लूट , झूठ और टूट की कथा है । मध्यम वर्ग , शिक्षित वर्ग चंद अपवादों को छोड़ कर अपने में सिमट चुका है । ऐसे समय में जरूरत है प्रेमचंद काल के सामाजिक सांस्कृतिक पाठ की । प्रेमचंद ने जिस समाज की कल्पना की थी , उसी समाज में मानव मुक्ति संभव है । उनकी नजरो में स्वाधीनता का अर्थ केवल यही नहीं था कि अंग्रजों का स्थान भारतीय ले लें।

जैसे कि प्रेमचंद की एक कहानी ' आहुति ' में रूपमति कहती है," कम से कम मेरे लिए तो स्वराज का यह अर्थ नहीं है कि जॉन की जगह गोविंद बैठ जाए । वह प्रश्न उठाती है कि " जिन बुराईयों को दूर करने के लिए आज हम प्राणों को हथेली पर लिए हुए है , उन्हीं बुराईयों को क्या प्रजा इसीलिए सिर चढ़ाएगी कि वे विदेशी नहीं स्वदेशी हैं ? उसकी माँग स्पष्ट है , वह कहती है , " अगर स्वराज आने पर भी संपत्ति का यही प्रभुत्व रहे और पढ़ा-लिखा समाज यों ही स्वार्थांध बना रहे तो मैं कहूँगी , ऐसे स्वराज का न आना ही अच्छा ।"

प्रेमचंद ने गोदान के माध्यम से बताया है कि यहां व्यक्तियों की दुष्टता उन्ही के गरीब इंसान भाईयों के उत्पीड़न और शोषण का कारण नहीं है बल्कि शोषण समाज के भीतर की कुछ सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था का परिणाम है । प्रभावशाली वर्गों में अगर कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से अच्छे और दयावान हों भी तो उनके द्वारा उत्पीड़ित वर्गों के साथ कुछ बेहतर सुलूक नहीं होगा ।

भारत में जिस प्रकार की डेमोक्रेसी है , वे ऐसे डेमोक्रेसी के कभी पक्षधर नहीं रहे । प्रेमचंद गोदान के माध्यम से बताया है कि " जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं , व्यवहार में बड़े-बड़े व्यपारियों और जमींदारों का राज्य है और कुछ नहीं । चुनाव में वही बाजी ले जाता है , जिसके पास रुपये हैं । रुपये के जोर से उसके लिए सभी सुविधाएँ तैयार हो जाती है । बड़े-बड़े पंडित , बड़े-बड़े मौलवी , बड़े-बड़े लिखने और बोलने वाले , जो अपनी जुबान और कलम से पब्लिक को चाहे जिस तरह फेर दें , सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं ।"

हाशिए पर पड़े लोगों को प्रेमचंद ने साहित्य में जो स्थान दिया , क्या वर्तमान व्यवस्था उसे वह स्थान दे पाया ? क्या होरी और हल्कू की समस्या उपन्यासों और कहानियों में ही सिमट कर रह जाएगा ? क्या महिलाओं , दलितों और शोषितों की युगीन पिड़ा का कहीं अंत होगा या युगो तक चलता रहेगा ?
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