गुजरात चुनाव के लिए मध्य प्रदेश सरकार हमें बलि का बकरा क्यों बना रही

नर्मदा बचाओ आन्दोलन 

एल.एस. हरदेनिया
।।
मात्र गुजरात की भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, को प्रसन्न करने के लिए मध्यप्रदेश की सरकार हमें बलि का बकरा बना रही है। यह सर्वसम्मत राय है उन लोगों की जो किसी भी क्षण नर्मदा के पानी से डूब सकते हैं।

इस संवाददाता ने तीन दिन मध्यप्रदेश के उन क्षेत्रों का भ्रमण किया जो सरदार सरोवर बांध के कारण अपना सब कुछ खो सकते हैं। इन दिनों मैंने प्रदेश के धार एवं बड़वानी जिलों के अनेक गांवों का भ्रमण किया, जो डूब क्षेत्र में आते हैं। इन गांवों के रहने वालों को यह चेतावनी दी गई थी कि वे 31 जुलाई तक गांवों को खाली कर दें और उन स्थानों पर चले जाएं जहां उनके रहने की वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। इन गांवों के रहने वालों ने बताया कि पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में परिवर्तित कर दिया गया है, चप्पे-चप्पे पर पुलिस लगी हुई है। रात को पुलिस द्वारा वाहनों में लगे लाउडस्पीकरों द्वारा धमकाया जाता है, जिससे हमारे बच्चे और महिलाएं भयभीत हो जाती हैं।

हमने उन स्थानों को भी देखा जहां उनको बसाया जाएगा। इनमें कई स्थान ऐसे थे जहां न तो पानी की व्यवस्था है, ना ही प्रकाश की और ना ही सड़के हैं। कीचड़ व घास से भरे प्लाट आवंटित कर दिए गए हैं। कुछ स्थानों पर टीन के टपरे बना दिए गए हैं जिनमें रहना एकदम कठिन है। वे उतने ही भयानक हैं जैसे जेलों में खतरनाक कैदियों को रखा जाता है। हमें बताया गया कि इन टीन के खपरों में बिजली फिट करते हुए तीन लोगों की मौत हो गई है। वहां के लोगों का कहना है कि हम नर्मदा में डूबना पसंद करेंगे परंतु अपने घरों को नहीं छोड़ेंगे।

फिर विस्थापन का अर्थ अकेला रहने की सुविधा देना नहीं है। हम जहां रह रहे हैं वहां हमारे जीविका के साधन हैं, हमारी खेती है, अन्य व्यवसाय हैं। नीति के अनुसार हमें जमीन के स्थान पर जमीन मिलना चाहिए। परंतु हमें जहां जमीन दी जा रही है वह स्थान एक तो बसाहट से दूर है और जहां खेती के लिए अन्य साधनों का अभाव है।

डूब में आए लोगों की आवाज़ बुलंद करने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन की मंत्री मेधा पाटकर अपने 11 अन्य साथियों के साथ जिनमें 8 महिलाएं और 3 पुरूष हैं, पिछले दिनों से अनशन पर हैं। अनशन स्थान पर सैंकड़ों की संख्या में पुरूष-महिलाएं चैबीस घंटे बैठे रहते हैं। भजन-गीत गाते रहते हैं। बीच-बीच में नारे भी लगाते हैं। मेधा जी काफी कमज़ोर हो गई हैं परंतु उनकी इच्छाशक्ति अभूतपूर्व है। अनशन के नौ दिन बाद म.प्र. शासन ने उनकी खबर ली। इसके पूर्व एक भी भारतीय जनता पार्टी का नेता उनसे या डूब में आने वाले लोगों से मिलने नहीं गया।

मेधा जी के उपवास के नौवे दिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अधिकारियों की एक टीम मेधा जी से मिलने भेजी। इस टीम में इंदौर के आयुक्त संजय दुबे, मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अधिकारी चन्द्रशेखर बोरकर तथा धार के कलेक्टर तथा इंदौर के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अजय शर्मा शामिल थे। इस दल में इंदौर के एक आध्यात्मिक नेता भय्यू जी महाराज भी शामिल थे। अधिकारियों और मेधा जी तथा उनके टीम के सदस्यों, जिसमें महिलाएं व आदिवासी शामिल थे, के बीच लगभग तीन घंटे से ज्यादा बातचीत हुई। बातचीत के दौरान अधिकारी मेधा जी की शंकाओं का एक भी संतोषजनक समाधान नहीं बता सके। जब बातचीत हो रही थी तब अनशन स्थान पर लगभग 1,500 लोग बैठे हुए थे, जिनमें आधे से ज्यादा महिलाएं थीं। बातचीत के बाद नारों के बीच मेधा जी ने घोषित किया कि अनशन समेत हमारा सत्याग्रह जारी रहेगा।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की मुख्य मांगे निम्न प्रकार हैंः

  • नर्मदा ट्रिब्यूनल फैसला म.प्र. राज्य की पुनर्वास नीति एवं सर्वोच्च अदालत के 2000, 2005 व 2017 के फैसले अनुसार डूब के सम्पूर्ण पुनर्वास हो उसके लिए ज़रूरी है कि पात्रता होते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश 2017 के अनुसार सभी 1358 परिवारों को तथा उसी तरह फर्जी रजिस्ट्री में फंसाए गए अन्य परिवारों को भी 15 लाख रू. का पैकेज दिया जाए।

  • पुनर्वास स्थलों पर नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (एनडब्ल्यूडीटी) के निर्णय एवं म.प्र. शाासन की पुनर्वास नीति के अनुसार सभी सुविधाएं उपलब्ध हों।

  • डूब क्षेत्र के एनडब्ल्यूडीटी के निर्णय एवं राज्य की पुनर्वास नीति जो भी अन्य सुविधाएं प्रभावित परिवारों को मिलना हैं, उसे भी सुनिश्चित किया जाए।

  • एनडब्ल्यूडीटी के निर्णय के अनुसार ‘पहले पुनर्वास फिर 6 महीने बाद डूब’ के सिद्धांत अनुसार सभी सुविधाएं एवं सभी परिवारों को उनका सम्पूर्ण विस्थापन एवं स्थायी आवास मिलने के बाद ही गांवों में पानी भरा जाए।

  • अधिकारियों द्वारा गलत आंकड़े दिए जा रहे हैं आज भी करीबन 40,000 परिवार मूल गांव में रह रहे हैं। जिनके पुनर्वास के बिना बांध में पानी नहीं भरा जाए।

  • जिन 15,846 परिवारों को डूब क्षेत्र से बाहर किया गया है, उनका अधिग्रहण कर उन्हें आधी अधूरी सुविधा दी गई है, या तो उन परिवारों का सम्पूर्ण पुनर्वास किया जाए या उनकी संपत्ति पुनः उनके नाम पर की जाए।

  • जिन विस्थापितों के आवेदन अपने हक के लिए प्रलम्बित हैं, उनकी संख्या भी 8,000 से ज्यादा है, उन्हें भी उनका हक दिया जाए।

  • भूमिहीन लोगों के लिए एक्शन प्लान 1993 के अनुसार ‘‘व्यावसायिक पुनर्वास’’ के तहत कम से कम 5 लाख रू. का मुआवज़ा भुगतान दिया जाए।

  • लोगों को अस्थायी निवास की जगह स्थायी निवास की व्यवस्था के लिए हर पट्टेधारी को 8 लाख तक की रकम घर प्लाट की स्थिति अनुसार भराव, समतलीकरण व नव निर्माण के लिए दिए जाएं।

इतनी सब समस्यों के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार इन सब प्रभावितों को हटाने को कटिबद्ध है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है जिससे गुजरात सरकार अपने राज्य के लोगों कोे यह बताए कि हमने उन्हें नर्मदा का पानी देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की है। उनका विश्वास है कि इससे विधानसभा के लिए शीघ्र होने वाले चुनाव में उन्हें लाभ मिलेगा। गुजरात की जीत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए प्रतिष्ठा का विषय है।

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