टमाटर के बाद प्याज का क़हर

टमाटर के बाद प्याज का क़हर

एक तरफ जहां  किसान टमाटर और प्याज का वाजिब दाम पाने को तरस रहें हैं  वहीं दूसरी ओर इन चीजों की कीमत आसमान छू रहा है जिससे आम लोग  खरीद पाने में असमर्थ दिख रहें  हैं।
अब्दुल रशी।।बाजार में पहले टमाटर की कीमतें आसमान चढ़ीं और अब प्याज की कीमतें उपभोक्ता को रुला रही हैं। कुछ बुद्धि जीवियों का मानना है के जब किसानों को पैदावार की वाजिब कीमत दिया जाएगा तो कृषि उत्पादों की कीमत बढ़ जाएंगी।  लेकिन सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि एक तरफ किसान टमाटर और प्याज का वाजिब दाम पाने को तरस गए, तो दूसरी ओर हर रसोई का हिस्सा और रोजमर्रा की इन चीजों की बढ़ी हुई कीमत के कारण आम लोगों द्वारा  इन चीजों को खरीद पाना बेहद मुश्किल हो रहा है। पिछले दो महीनों के भीतर टमाटर के दाम कई गुना बढ़े हैं, सौ रुपए प्रतिकिलो तक भी पहुंच गए। जबकि मई में कई जगह लागत-मूल्य भी न निकल पाने के कारण टमाटर फेंक दिए जाने की खबरें आई थीं। उसी चीज का दाम खुदरा बाजार तक आते-आते चार सौ-पांच सौ फीसद तक कैसे चढ़ गया? आखिर यह बीच का इतना भारी अंतर क्यों? यही हाल प्याज का भी है। कई जगह पचास पैसे प्रतिकिलो तक की दर से किसान प्याज मंडियों में बेचने को मजबूर हुए। गुजरात के अमरेली में तो मई में हजारों किलो प्याज किसानों ने सड़कों पर फेंक दिया था। लेकिन उसी चीज की कीमत बाजार में एक महीने में तीन गुनी हो चुकी है। कीमतों में इतनी तेज बढ़ोतरी न तो कोई नई बात है न रहस्य ही।

कृषि अर्थशास्त्र का ककहरा जानने वाले भी  जानते हैं कि जब तक किसान विक्रेता की भूमिका में रहते हैं तब तक उनके उपज कि कीमत काफी गिरी रहती है, और जब किसान अपने उपज को बेच कर विक्रेता से क्रेता बन जाता है तब कृषि उत्पादों के दाम तेजी से बढ़ने लगते हैं। साफ है कि बाजार में जो कीमत उपभोक्ता चुकाते हैं उसका लाभ किसानों को नहीं मिलता, यह मुनाफा  व्यापारियों, बिचौलियों, जमाखोरों और सट्टेबाजों को मिलता है। 

कृषि उत्पादों की कीमतों की बढ़ोतरी के कारण

आयात-निर्यात के गलत या संदिग्ध फैसले। कई बार यह देखा गया है कि पैदावार अच्छी हुई, मगर अचानक निर्यात पर रोक लगा दी गई, या उसी चीज के आयात पर शुल्क हटा लिया गया। 
भंडारण की बदइंतजामी भी एक कारण है। मध्यप्रदेश में भंडारण की उचित व्यवस्था न होने से प्याज सड़ने की खबर आई है। हमारे देश में भंडारण और प्रसंस्करण की पर्याप्त सुविधाएं न होने के चलते, एक मोटे अनुमान के मुताबिक, एक लाख करोड़ रु. के कृषि उत्पाद हर साल नष्ट हो जाते हैं।

देश में शीतगृहों की भंडारण क्षमता में तीस लाख से चालीस लाख टन की कमी है। यों तो उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से ढांचागत विकास पर बहुत जोर दिया जाता रहा है, यह कहते हुए कि यही विकास की सबसे अहम कुंजी है। लेकिन कृषि उत्पादों की भंडारण व प्रसंस्करण व्यवस्था को और सक्षम बनाने को कभी प्राथमिकता नहीं दी गई, जबकि यह लोगों की कहीं ज्यादा बुनियादी जरूरत से जुड़ा मसला है। टमाटर और प्याज की कीमतों के बढ़ने को यदि  किसानों और उपभोक्ताओं के नज़रिए से देखेंगे तो यह एक ऐसा छलावा दिखेव जिसमें एक ठग गिरोह द्वारा आम जनता को ठगे जाने का खेल दिखेगा।
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