मध्य प्रदेश-192 गांव के 40,000 परिवार होंगे बेघर


डूब से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के बाद विस्थापन की मांग को लेकर मेधा पाटेकर अन्य 11 लोगों के साथ बीते 10 दिन से उपवास पर हैं, उनकी हालत बिगड़ती जा रही है।
न्यूज डेस्क उर्जांचल टाइगर ।। देश और दुनिया में संस्कृति और सभ्यता की खोज के बड़े-बड़े अभियान चलते हैं। इसके लिए सरकारें विभाग नाकर बेहिसाब धन खर्च करती हैं, मगर मध्य प्रदेश में ठीक इसके उलट होने जा रहा है। यहां मोहनजोदड़ो से भी पुरानी सभ्यता और संस्कृति वाले इलाके नर्मदा घाटी को डुबाने के पूरे सरकारी इंतजाम कर दिए गए हैं। यह वह इलाका है, जहां एशिया के पहले किसान ने खेती शुरू की। लेखक चिन्मय मिश्र कहते हैं, “नर्मदा घाटी वह इलाका है, जिसकी सभ्यता और संस्कृति बहुत पुरानी है। यहां मोहनजोदड़ो की सभ्यता से भी बेहतर सभ्य समाज (सिविलाइज्ड सोसायटी) के अवशेष मिलते हैं। इतना ही नहीं, यह वह इलाका है, जिसने बड़े बदलाव देखे हैं। यहां कभी चावल पैदा होता था, इसलिए यह इलाका शुतुरमुर्ग का क्षेत्र यानी रेगिस्तान में बदल गया और फिर उपजाऊ बन गया है।” मिश्र अपनी पुस्तक ‘प्रलय से टकराता समाज व संस्कृति’ में लिखते हैं कि यह वह इलाका है, जहां पहला मानव किसान हुआ। यहां की सभ्यता हजारों वर्ष पुरानी है।
बता दें कि नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाकर 138 मीटर किए जाने से मध्यप्रदेश के 192 गांव के 40 हजार से ज्यादा परिवार प्रभावित होने वाले हैं। हंसती-खिलखिलाती जिंदगी बदरंग होने की कगार पर है। हजारों पेड़ और उपजाऊ जमीन जलमग्न होने में ज्यादा दिन नहीं लगने वाले। वैसे तो नर्मदा नदी को जीवनदायनी कहा जाता है, मगर एक बांध की ऊंचाई बढ़ जाने से इस क्षेत्र के लिए यह ‘जीवन लेने वाली नदी’ बन जाएगी।
नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर कहती हैं, “मध्यप्रदेश, गुजरात और केंद्र की सरकार को न तो जीवित इंसान की चिंता है और न ही सभ्यता और संस्कृति की, तभी तो एक राज्य में चुनावी फायदे के लिए दूसरे राज्य को डुबाने में कोई तरस नहीं खा रहा है। वर्तमान में सरकारें उद्योगपतियों के लिए काम कर रही हैं। उनके लिए गरीब, किसान और आम इंसान की कोई कीमत नहीं है।”
Reactions:

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget