'रेरा' से राहत

'रेरा' से राहत



 मध्य प्रदेश में 700 प्रोजेक्ट्स और एजेंटों ने आवेदन किए हैं, तो कर्नाटक में प्रोजेक्ट्स एवं एजेंटों के कुल 220 आवेदन रेगुलेटर पास आए हैं।

आलोक कुमार
पहली मई से देश भर में रेरा यानी रियल इस्टेट रेग्युलेशन बिल लागू है। इसे आवास और शहरी विकास मंत्रालय ने निजी बिल्डर्स और डेवलपर्स पर लगाम कसने के लिए तैयार किया है। संसद के समक्ष इसे चार साल पहले लाया था। इस विधेयक के आधार पर राज्यों को कानून बनाने का जिम्मा दिया गया। अद्यतन स्थिति के मुताबिक 23 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों ने रेरा कानून को अधिसूचित कर दिया है। जबकि छह राज्यों ने कानून का मसविदा तैयार कर लिया है। वहां अधिसूचित किया जाना बाकी है।

इसे लागू करने के लिए राज्यों को स्थायी रेगुलेटर नियुक्त करना है। फिलहाल चार राज्यों ने स्थायी रेगुलेटर नियुक्त किए हैं जबकि 19 राज्यों ने अंतरिम रेगुलेटर नियुक्त किया है। रेरा के रेगुलेटरी ऑथरिटी में बिल्डर्स और एजेंट का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा दस हजार प्रोजेक्ट्स और सात हजार एजेंटों ने रेगुलेटर में रजिस्ट्रेशन के लिए आवदेन किया है। गुजरात में करीब 110 प्रोजेक्ट्स और सत्तर एजेंटों के आवेदन आए हैं। जबकि दिल्ली से लगे हरियाणा में रेरा के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का काम जारी है। मध्य प्रदेश में 700 प्रोजेक्ट्स और एजेंटों ने आवेदन किए हैं, तो कर्नाटक में प्रोजेक्ट्स एवं एजेंटों के कुल 220 आवेदन रेगुलेटर पास आए हैं। जिन निर्माणाधीन और नई परियोजानओं का निर्धारित समयसीमा तक रेरा में रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया गया है, उनपर कानूनी नियमों के अनुपालन नहीं करने का हवाला देते हुए जुर्माने की व्यवस्था की गई है। अब देखना बाकी है कि राज्य सरकारें अभी ही कानूनी कार्यवाही शुरु कर देती हैं या स्थायी रेगुलेटर नियुक्त नहीं होने का हवाला देते हुए समय का मोहलत देती हैं।

रेरा की सख्ती के खिलाफ कई बिल्डर्स ने हाई कोर्ट की शरण ली है। रेरा के असर से बचने के लिए विभिन्न हाई कोर्ट में दायरे याचिकाओं के जरिए रेरा की कानूनी वैधता को चुनौती गई है। इसके खिलाफ आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय ने सुप्रीम कौर्ट में याचिका दायर की है औऱ आग्रह किया है कि रेरा के खिलाफ दायर सभी मामलों को एक साथ किया जाए ताकि इसका फैसला एक कोर्ट में हो सके। प्रभावशाली लोग अक्सर कानूनी शिकंजे से बचने के लिए इसी तरह का प्रपंच रचते हैं।

इसका मकसद मकान देने के नाम पर कोरे वायदे के आधार पर जारी ठगी खत्म हो। उपभोक्ताओं को मकान का सब्जबाग दिखाकर पैसा ऐंठने वाले बिल्डर्स की मुसीबत बढ जाए और वह वायदे के अनुरुप निवेशक उपभोक्ताओं को आवास दे पाएं। रेरा लागू होने के ऐन पहले बिल्डर्स के जेल जाने की रफ्तार बढ गई है। घबराहट में कई बड़े बिल्डर्स ने खुद को दिवालिया घोषित करने का उपक्रम शुरु कर दिया है। संबंधित राज्य सरकारों से बिल्डर्स के हाथों ठगे गए निवेशकों को मकान देने की उम्मीद बढ गई है। पुलिस पर नया दबाव बढ गया है। रेरा के आधार पर मकान खरीददारों के हितों की संरक्षण के लिए राज्यों में अधिकृत ऑथरिटी का गठन किया जा रहा है। यह खरीददारों व निर्माताओं के हितों का संरक्षण करेगी। रेरा खरीददारों के धन का बिल्डर्स के हाथों मनमौजीपूर्ण इस्तेमाल पर लगाम कसेगा। रेरा का उद्देश्य खरीददारों को ब्रोकर्स के झांसे में आने से बचाना है। मकान के सपने को लेकर हाल में बिल्डर व ब्रोकर के हाथों छले गए मध्यम वर्ग में खौफ का माहौल है।

केंद्र सरकार के आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय ने कानून मंत्रालय से रेरा के खिलाफ दायर याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने का प्रस्ताव रखा है। इस बारे में बॉम्बे हाईकोर्ट की पुणे बेंच को यह जानकारी दी गई है। नागपुर बेंच और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सरकार को अपना रुख रखना पड़ा है कि वह रेरा के कानूनी प्रावधानों को लागू करने के लिए कृतसंकल्प है। अदालत पहुंचे बिल्डर्स को मुख्य आपत्ति सभी निर्माणाधीन प्रॉजेक्ट्स को रेरा के अंतर्गत लाने के प्रावधान से है। उनका मानना है कि प्रोजेक्ट बुकिंग के समय यह कानून अमल में नहीं था। पूर्व में पारित प्रोजेक्ट पर नए कानून के प्रावधान को लागू करना न्यायसंगत नहीं है। तर्क दिया जा रहा है कि जमीन से जुड़ा मामला राज्य सरकार के अधीन आता है, उसपर केंद्र सरकार के दखल नहीं होना चाहिए। रेरा के तहत रेगुलेटर के पास प्रोजेक्ट्स का डीटेल जमा करने से बिल्डर्स को एतराज है। उनका कहना है कि इससे निजता के अधिकार का हनन होगा।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एनसीआर से लगने वाले उत्तर प्रदेश के नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ की स्थिति के बारे में प्रदेश के औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने बताया कि बिल्डर्स की लापरवाही की वजह से इस समय लाखों निवेशक परेशान हैं। एक प्रोजेक्ट पूरा करने के बजाए निवेशकों से लिया गया पैसा दूसरे प्रोजेक्ट में लगा दिया जा रहा है। ऐसे में अधिकांश प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हुए हैं। छले गए निवेशकों को न्याय दिलाना प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है। इसके लिए विधानसभा से पारित रेरा विधेयक कानून का राज बहाल करने में मददगार हो। 

मकान निर्माण के क्षेत्र में बीते दो दशकों से बहार आई हुई थी। शहरीकरण का पूरा दारोमदार सरकार के हाथों से सरककर निजी बिल्डर्स और ठेकदारों के हाथों में पहुंच गया था। सच है कि शुरुआती दौर में निजी बिल्डर्स ने सरकार का काम आसान किया। पश्चात्य जगत के तर्ज पर अंतर-बाह्य सज्जा वाले मकान बनाए जाने लगे। कई कॉलोनियों को ब्रिटेन अमेरिका की तर्ज पर साज दिया गया। निजी हस्तक्षेप की वजह से आर्किटेक्ट इंजीनियरिंग ने मकान निर्माण की सूरत और सीरत बदल दी।

समय पर मकान पोजेशन में आई दिक्कतों के बीच यह तय है कि तेज रफ्तार से लाखों लोगों के सिर पर छत देने में सफलता मिली। बदले में बिल्डर्स ने मोटी कमाई की। देखते देखते भवन निर्माण का काम सर्राफा व्यापार की तरह सर्वाधिक फायदे के धंधे में तब्दील हो गया। लेकिन ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने और वादाखिलाफी की वजह से इसके उल्टे नतीजे आने लगे। धनबल के सहारे बेइमानी का बोलबाला बढ़ता गया। बिल्डर्स का प्रभाव बढ़ता गया।

सरकारों का काम किसानों से अधिग्रहित भूमि को विकसित कर बिल्डर्स को सुपुर्द करने तक सीमित रह गया। किसी ठोस नियामक के अभाव में नए मकान बनाकर मध्यम वर्ग को देने के इस काम में शिकायतों के अंबार लग गए। प्रोजेक्ट पूरा करना और उसे खरीददारों के हाथों सुपुर्द करने की रफ्तार सुस्त पड़ गई। रातोंरात कमाई के लिए राजनेता व भ्रष्ट अधिकारी रियल एस्टेट के बड़े निवेश बन गए। रियल एस्टेट कारोबार उल्टे सीधे लाभ हासिल करने के राजनीतिक चंदे का बड़ा आधार बन गया। इसकी वजह से मकान की कीमतें आसमान छूने लगीं। खरीददारों को धोखा देने का सिलसिला तेज हो गया। फ्लैटों को लेकर ऑथरिटी से स्वीकृत मानदंड का उल्लंघन आम हो गया।

ग्रेटर नोएडा के ओमिक्रॉन सेक्टर के एक प्रोजेक्ट में गृहप्रवेश करने बाद भी फ्लैट से कई खरीदार हाथ धो बैठे। खरीददार मदन झा बताते हैं कि उनके कम्पलेक्स में हजारों लोग हैं, जो बिल्डर्स के फरेब में फंस गए। अपनी गाढ़ी कमाई मकान में फूंक दी। कई खरीदार घर छिन जाने के बावजूद बैंकों को किस्त भरने को मजबूर हैं। बिल्डर्स ने धोखे में रखकर बैंक से लोन दिलवाया और मकान बेच दिया। फिर रजिस्ट्री करवाने में आनाकानी करने लगा। जब इसकी शिकायत आथरिटी से की गई, तो पता लगा कि बिल्डर ने स्वीकृति से ज्यादा फ्लोर बना रखा थे।

लोगों को इस उम्मीद में पजेशन दे दिया गया कि आथरिटी खरीददारों के दबाव में आकर अस्वीकृत फ्लोर को मंजूरी देने के लिए विवश हो जाएगी। लेकिन सरकार बदली तो नीयत बदल गई। ऑथरिटी ने रुख सख्त कर लिया और अदालती आदेश के साथ अवैध बने फ्लैटों को सीलबंद कर दिया।

बिल्डर्स के धंधे में फ्लैट अथवा मकान खरीरदार के पैसे को चालू प्रोजेक्ट पूरा करने के बजाए नए प्रोजेक्ट में लगाने की शिकायत आम हो गई थी। फिर खरीददारों के पैसे को “माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम” के अंदाज में बिल्डर्स ने निजी जिंदगी को बदलने में लगा दिया। रातोंरात मंहगी गाड़िया खरीद ली। उन्नत जीवनशैली अपना ली। पांच सितारों होटलों में ठहरना और मौजमस्ती के लिए विदेशों का सैरसपाटा नवधनाढ्य बिल्डर्स-ब्रोकर के फितरत में शामिल हो गया था। ब्रोकर के हाथों बिल्डर्स तक पहुंचने वाले खरीददार के पैसे मकान निर्माण में नहीं लगाए जा रहे, यह खरीददार खुली आंखों से देखते रहे लेकिन कानून के अभाव में कसमसाकर रह जाने को विवश हो गए।

हालांकि बिल्डर्स की ओर से खरीददारों में विश्वास बहाली के लिए कन्फेडरेशन ऑफ रियल स्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) का गठन किया गया। क्रेडाई की ओर से खरीददारों में विश्वास बहाली के लिए हाल में कई उपाय किए गए हैं। यह निरंतर यकीन दिलाने की कोशिश है कि सभी बिल्डर्स एक जैसे नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मकान निर्माण क्षेत्र में आई मंदी को दूर करने की चेष्टा में क्रेडाई के एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए भरोसा दिया कि ईमानदार बिल्डर्स के काम में आने वाली दिक्कतों को दूर किया जाएगा। यह सच है कि हजार ठगे गए हैं तो आज भी एनसीआर, नवी मुंबई, चेन्नई जैसे महानगरों में लाखों की संख्या में बिल्डर्स लोगों को मकान देने का काम कर रहे हैं। बदले रुख में क्रेडाई की ओर से ही पारदर्शिता की पुरजोर पैरवी की जाने लगी है। अब बिल्डर्स की संस्था ही ठगी कर पेशे को दागदार बनाने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करवाना चाहते हैं।

हालांकि रेरा के प्रावधानों के लागू होने के बाद मामला क्रेडाई जैसी निजी संस्था के हाथ से बाहर निकल गया है। अब मकान बुक कराके बिल्डर के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। बल्कि बिल्डरों को इतने पैबंदों से कस दिया गया है कि वो खरीददार के धन का निजी मौजमस्ती में इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। रेरा कानून मार्च, 2016 में संसद में पारित किया गया था। जिसे पहली मई 2017 को पूरे देश में लागू कर दिया गया। रेरा को ड्राफ्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले शहरी विकास मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक अगर आपने किसी बिल्डर प्रोजेक्ट में घर बुक कराया है और बिल्डर आपको अभी तक घर बना कर नहीं दे रहा है, तो इस तरह के मामलों में भी रेरा आपकी मदद करेगा, क्योंकि ऐसे सभी मामले अब रेरा के दायरे में होंगे।

ऐसा नहीं है कि नया कानून बिल्डरों के गले पर फंदा है बल्कि इससे जो बदलाव आएगा उससे बिल्डरों को ज्यादा खरीदार मिलेंगे और ज्यादा खरीदार मिलने से बाजार तरक्की करेगा। इस कानून के लागू होने से खरीददार किंग बन जाएगा। शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने रेरा कानून बनने की प्रक्रिया के बारे में बताया कि सलेक्ट कमेटी ने बिल्डर को 50 फीसदी पैसा बैंक में जमा करने की सिफारिश की थी लेकिन उसे 70 फीसदी किया। सलेक्ट कमेटी की सिफारिश सिर्फ आवासीय प्रोजेक्ट के लिए थी लेकिन इसमे बिल्डर्स के व्यवसायिक प्रोजेक्ट को भी शामिल किया गया।

विधानसभा से रेरा संबंधी कानून के पारित होते ही प्रोजेक्ट पूरा होने और खरीददार को पजेशन देने के पांच साल बाद तक अगर स्ट्रक्चर में कोई खराबी आती है तो उसकी जिम्मेदारी बिल्डर्स की होगी। बिल्डर को खरीददार से लिया 70 फीसदी पैसा प्रोजेक्ट के अकाउंट में ही रखना होगा। निर्माणाधीन प्रोजेक्ट को तीन महीने में नियामक प्राधिकरण में रजिस्टर्ड कराना होगा। जिनको कंपलीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला वो प्रोजेक्ट भी रेरा के दायरे में आएंगे। रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट की पूरी जानकारी प्राधिकरण के पास होगी।

इसके अलावा अब कारपेट एरिया पर घर बेचे जाएंगे ना कि बिल्ड-अप एरिया पर। इससे बिल्डर्स की ओर से कीमतों में हेराफेरी करने की गुंजाईश कम होगी। राज्य नियामक प्राधिकरण वायदा पूरा न करने या फिर धोखाधड़ी करने पर बिल्डर को तीन से पांच साल तक जेल भिजवा सकती है। इसके लागू होने के बाद मकान बनाने वाला बिल्डर, डेवलेपर एक प्रॉजेक्ट का पैसा दूसरे में नहीं लगा सकता। उम्मीद की जानी चाहिए कि हरियाणा, महाराष्ट्र के बाद अब उत्तर प्रदेश की विधानसभा मौजूद रेरा कानून बनते ही मकान निर्माण के क्षेत्र में प्रत्याशित गति आएगी। यह सन 2022 तक सबके सिर अपना छत देने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के घोषित लक्ष्य को हासिल करने में मददगार साबित होगा।
(लेखक तीन दशकों से मुख्यधारा की पत्रकारिता में हैं। प्रमुख समाचार पत्र-पत्रिकाओं व टीवी चैनल्स में अरसे तक काम किया है। फिलहाल रेडियो और वेब जनर्लिज्म के लिए लेखन के साथ पठन पाठन में सक्रिय हैं।)
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