5 साल में नेताओं की 500 गुना कमाई


हेमेन्द्र क्षीरसागर@उर्जान्चल टाइगर
देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को मालिक और जनप्रतिनिधी को सेवक माना गया है लेकिन हो उल्टा रहा है तंत्र में मालिक कंगाल और सेवक मालामाल है। हॉं, हो भी क्यों ना राजनीति के मायने जो बदल गए है सेवा तो एक बहाना है असली मकसद तो सत्ता हथिया कर माल कमाना है। भेडचाल में पहले लगाओं बाद में पाओ की तर्ज पर एक के दस का रिवाज है, कवायद को सियासतदारों ने निभाया तो क्यां गुरेज है? हिसाब-किताब तो चाकचौबंद रहना चाहिए, वो अलग बात है कि हम अपने मत का मूल्य नहीं जानते इसका मतलब नहीं कि नेता भी मूल का सूत ना वसूले यह तो गैरवाजिब है। 

भाई! इस बिरादरी में 5 साल में 500 गुना कमाई का वसूल है बदस्तुर कायम तो रखना ही होगा। आपाधापी में नेताओं की संपत्ति में बेपनाह वृद्धि होना लाजमी है। लिहाजा, नेतागिरी से अच्छा कोई धंधा नहीं जो दिन दूनी, रात चौगनी कमाई से सराबोर कर दे। बकौल हालात ऐसे बने रहे तो एक दिन भारत फिर से सोने की चिडिया बन जाएंगा! है, ना कमाल की बात! जो काम 125 करोड लोग मिलकर नहीं कर सकते वह चंद मुट्ठी भर नेताओं ने कर दिखाया। काश! ऐसी बरकत सभी पर बरस जाए तो क्या कहने ना कोई भूखा, ना कोई बेघर और ना कोई लाचार तरबतर में चंहुओर होगा नवउदार। खैर, नसीब अपना-अपना आज नेताओं की बारी है वह जहां पैर रख दे वहां कुबेर का खजाना निकल आए, लूटने का तो सवाल ही नहीं उठता। उस पर दिखाने को सेवा खाने को मेवा, ऐसा मौका कौन छोडेगा?

दूसरी ओर फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों थोमापिकेती और लुकासॉसेल के एक अध्ययन में सामने आया कि मूल्क में 1 फीसदी जन के पास 22 फीसदी दौलत है। रफ्तार यूंही बनी रही तो भारत को अंग्रेजीराज से अरबपति राज तक पहुचने में देर नहीं लगेगी। बेबसी में 186 देशो में भारत का गरीबी देशो की सूची में 136 वां स्थान हैं। अपृष्यता में गरीबी, अमीरी और नेतागिरी की खाई देश के अर्थतंत्र को खस्ता बना रही है।

बहरहाल, सियासी दावपेंच से कमाई गई अकूत संपत्ति की चकाचौंध से सारा देश भौचक्का रह गया जब एक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में तल्ख टिप्पणी करते हुए 2 चुनावों के बीच में नेताओं की बेशुमार पूंजी पर गहरा अफसोस जाहिर किया। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बेहिसाबी धनपति नेताओं की सूची रिपोर्ट के साथ पेश करने का निर्देश दिया। जिसमें सरकार को यह बताना होगा कि अभी तक क्या-क्या कदम उठाए गए है। गौरतलब रहे कि इस फेहरिस्त में तकरीबन हरेक राजनैतिक दलों के 289 नुमाइंदें शामिल है। आश्चर्यचकित कई मामलों में दिलचस्प मोड यह है कि 5 साल में नेताओं की 500 गुना कमाई हुई है। कडी में न्यायालय 2014 के लोकसभा चुनावों में 30 हजार करोड के खर्च को सुनकर हैरान है। दौरान दलील में बताया गया कि एक दल ने चुनाव में 400 करोड रूपये खर्च किए है, इसमें उम्मीदवारो का अनाप-शनाप खर्च अलग है। सोचिए! इसे भी मिला दिया जाए तो खर्चे की चर्चा कहां तक जाएंगी। बतौर आंकडों की भरमार से न्यायालय को कहना पडा ऐसे खर्चीले चुनाव तो रोज होना चाहिए सहभागिता में कमशकम लोगों को रोजगार तो मिलेगा।

अंततः देश की चिंता से बेफिक्र लुटेरे नेताओं को हायतौबा करने का वक्त आ गया। अन्यथा जिस गति से यह कमाई कर रहे उससे तेजी से यह लोगों को त्राहिमाम-त्राहिमाम कर देगें। अलबत्ता नोट के बदले वोट नहीं चोट दे तभी राजनीति कारोबार नहीं अपितु सेवा का द्वार कहलाएंगी। 
Reactions:

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget