बुलेट ट्रेन नही, हमे तो चाहिए लेट ट्रेन


ताश खेलते हुए जब स्टेशन आ जाता है तो ऐसा महसूस होता है मानो कोई हमारी प्रॉपर्टी हमसे छीने ले रहा है. यहा जब लोग समय काटने के लिए ट्रेन की यात्रा करते है तो समय बचा कर क्या लूडो की एक बाजी घर में खेल लेंगे ? 
मो० शहाबुद्दीन खान।।अपने देश की बैलगाड़ी कब बुलेट ट्रेन में तब्दील हो जाएगी सोचा ही न था. यहां तो जब से होश संभाला है तब से बुलेट ट्रेन की नहीं बल्कि आठ-दस घंटे लेट होने वाली लेट-लतीफ ट्रेन की आदत है. हमारे देश में मानसून और ट्रेन दोनों ही परंपरागत रूप से लेट होने के लिए ही जाने जाते है. इधर जब से बुलेट ट्रेन की बात चली है तब से अंदर से न जाने क्यों बुलेट ट्रेन वाली बात अपचनीय सी लग रही है. अपनी परंपरागत ट्रेन का आनंद इस आधुनिक बुलेट ट्रेन के आगे फीका न पड़ जाए इसी बात की चिंता है. बुलेट ट्रेन के आने के बाद इस समय अपनी पुरानी ट्रेनों के बारे में वही ख़यालात आ रहे हैं जो सनी लियोन के आ जाने के बाद राखी सावंत के लिए आते हैं. बुलेट ट्रेन रफ़्तार का प्रतीक होती है तो आम ट्रेन संस्कार की वाहक होती है. बुलेट ट्रेन समय की बचत करती है तो आम ट्रेन में टाइम पास करने का स्कोप होता है. बुलेट ट्रेन आधुनिकता का पर्याय है तो आम ट्रेन हमारी समृद्ध परंपरा की वाहक. बुलेट ट्रेन में लेट होना मना होता है तो आम ट्रेन का लेट होना उसका मौलिक अधिकार माना जाता है.

बुलेट ट्रेन में कैसे 'चाईइया' वाली आवाज़ लगाकर कोई आपको चाय का तलब मिटाएगा ? वहां कौन आपके लिए हर स्टेशन पर चढ़ और उतर कर आपकी पान-मसाला वाले नवाबी शौक को पूरा करेगा ? बुलेट ट्रेन में कौन भिखारी आपको अल्ताफ़ राजा का 'तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे' वाला गाना गा कर मनोरंजन कर के अपनी भीख का हक मागेगा ? वहां कौन किसी सीट पर रुमाल रख कर उसे देसी स्टायल में आरक्षित कर के अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता दिखायेगा ? कौन बुलेट ट्रेन में 'रेल हमारी संपति है' वाले सूत्रवाक्य पर चलते हुए उसकी दीवारों पर 'आई लव यू एंजिल लिखेगा ? बुलेट ट्रेन में वो मजा कहां मिलेगा जो आम लोकल ट्रेन बक्सर-मुग़लसराय 'ईएमईयू' पैसेंजर और दिलदारनगर-ताड़ीघाट पैसेंजर की धक-धक चूक-चूक की आवाजें सुनने को मिलती है ? कहां से सुनने को मिलेगी किन्नरों के ताल-ठोक कर इमोशनल अंदाज में पैसा वसूलने की वो आवाजें ? आखिर कैसे कोई बुलेट ट्रेन में मूंगफलियां खाकर छिलकों को सीट के नीचे खिसकाने वाला हुनर दिखा पायेगा ? और सबसे बड़ी चिंता तो किन्नरों की है जिन्हें अपने वसूली वाले टैलेंट का प्रदर्शन करने के लिए मोहताज कर दिया जायेगा. बुलेट ट्रेन को चलाने से पहले कम से कम उन 'सिमरनों' के बारे में भी सोच लिया होता जिन्हें अपने 'राज' को घंटो लाइन लग कर टिकट लेना और किसी न किसी चलती हुई ट्रेन में दौड़ते हुए पकड़ना होता है.

अब नया दौर है तो नयी कहानी लिखी ही जाएगी. ऐसे ही हमारे मित्र कुँअर नसीम रज़ा जी सुबह-सुबह अखबार पढ़ते हुए बुलेट ट्रेन की खबर को देखकर दार्शनिकता का लबादा ओढ़ते हुए बोले - 'यार शहाब.! एक बात बताओ आखिर बुलेट ट्रेन से फ़ायदा क्या होगा ? आखिर काहे लाखों करोड़ों पैसा फूंक कर तमाशा देखने का बंदोबस्त किया जा रहा है ? हमारे अन्दर भी देश की तरक्की के कीटाणु फुल फॉर्म में हिलोरे मार रहे थे. इसलिये हमने भी तर्कों के तरकश से तीर निकालने शुरू कर दिए - देखो नसीम रज़ा जी.! 'बुलेट ट्रेन का सबसे बड़ा फायदा समय की बचत है. हर यात्रा में आप दो-दो घंटे बचाओगे' हमारे तर्क की मिसाइल अभी लक्ष्य भेद ही न पायी थी कि उन्होंने अपनी हवा में मार गिराने वाली कुतर्क की मिसाइल छोड़ दी. यार एक बात बताओ, यहां कौन सा हम बिल गेट्स है जो हमें गिरे हुए को उठाने का टाइम नही है. सुबह दो घंटे अख़बार घोरने में, दोपहर को दो घंटे झपकी मारने में और शाम को दो घंटे दिलदारनगर के नेहरूवा मिठाईवाला चाय की दुकान पे चौपाल लगाने के बाद हमारे पास मतलब भर का टाइम फेसबुक, वाट्सऐप, ट्विटर चलाने का भी मिल जाता है. अब आप ही बताइए ऐसे लोग काहे ज्यादा पैसे फूंक कर समय बचायेंगे ? यहां साला ताश खेलते हुए जब स्टेशन आ जाता है तो ऐसा महसूस होता है मानो कोई हमारी प्रॉपर्टी हमसे छीन ले रहा है. यहां जब लोग समय काटने और उसका मजा लेने के लिए ट्रेन की यात्रा करते है तो समय बचा कर क्या लूडो की एक बाजी घर में खेल लेंगे ? नसीम रज़ा जी की बात में दम था. ट्रेन भले ही बुलेट वाली चल जाए लेकिन लेट वाली ट्रेन के साथ जो मजा है, वह इसमें कहां !
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