तीन सौ तीस साल पहले पड़ी थी दिलदारनगर की बुनियाद

तीन सौ तीस साल पहले पड़ी थी दिलदारनगर की बुनियाद


आज मुहर्रम की सातवीं तारीख है। आज ही के दिन मु0 दीनदार खां ने दीनदारनगर की स्थापना किया था। इस नगर को बसे 330 साल हो गये। 
एम.अफसर खां सागर
शेक्सपियर ने कहा था नाम में क्या रखा है। मगर जब किसी नाम का एक शब्द भी इधर से उधर हो जाये तो चाहे स्थान हो या इंसान अपनी असली पहचान खो देता है। शायद यही हुआ उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर के एक नगर दीनदारनगर के साथ! स्दियों पुरानी असली पहचान खो कर यह नगर अब नये नाम दिलदारनगर से जाना जाता है। मु0 दीनदार खां के दसवीं पीढ़ी के वंशज कु0 नसीम रजा खां बताते हैं कि 330 साल पहले राजा मु0 दीनदार खां उर्फ कुंवर नवल सिंह ने सात मुहर्रम 1110 हिजरी को मौजा अखंधा, टप्पा कमसार, परगना मदन बनारस उर्फ जमानियां, सूबा इलाहाबाद को 592 आलमगीरी मुद्रा में क्रय किया, जो कि मुगलकालीन दस्तावेज कबालानामा (क्रयपत्र) में दर्ज है। 

कु0 नसीम रजा खां बताते है कि फारसी दस्तावेजों के मुताबिक बादशाह औरंगजेब आलमगीर ने 1085 हिजरी में दीनदार खां उर्फ नवल सिंह के भाई मियां दानिश खां को सपरिवार लाहौर बुला कर पूरे राजकीय सम्मान के साथ अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया, बादशाह के इस व्यवहार से खुश हो कर इन्होने सपरिवार इस्लाम धर्म कुबूल कर लिया। जिसका जिक्र बादशाह द्वारा लाहौर से जारी शाही फरमान फरजंदनामा (गोदनामा) में मिलता है। समहुता निवासी पुर्व प्रधनाचार्य शिवजी सिंह बताते हैं कि इस्लामी संस्कृति के अनुरूप पूरे परिवार का नामकरण हुआ इस वजह से कुंवर नवल सिंह से मु0 दीनदार खां बन गये। मु0 दीनदार खां ने बादशाह से अपनी पुश्तैनी जगह आने की इच्छा जाहिर किया, जिसे बादशाह ने कुबूल कर लिया। वह पहले से ही इस्लामगढ़ के जमींदार थे, इसी कड़ी में बादशाह ने दीनदार खां को 1000 सैनिक, घोड़ों व हथियार के साथ ‘राजा’ एवं ‘खान’ की उपाधि व बहुत सी इनामात के साथ रवाना किया। लाहौर से आकर मौजा अखंधा, टप्पा कमसार, परगना मदन बनारस उर्फ जमानियां, सरकार गाजीपुर सूबा इलाहाबाद में स्थित अपनी जागीर के एक बहुत बड़े कोट पर आबाद हो गये और परगना की जागीरदारी सम्भलने लगे। कुछ महीनों के बाद सात मुहर्रम 1110 हिजरी को मौजा अखंधा को 592 आलमगीरी मुद्रा में क्रय किया। जिसके बादे उस पूरे इलाके को दीनदारनगर के रूप में जाना जाने लगा। जिस कोट पर बसे वह राजा मु0 दीनदार खां के कोट के नाम से मशहूर हुआ। मु0 नसीम रजा खां बताते हैं कि सन् 1839 से 40 ई0 तक के भू-राजस्व सहित अन्य दस्तावेजों में दीनदारनगर का नाम दर्ज है। इसके बाद इस नगर का नाम न जाने कैसे दिलदारनगर हो गया। इसके बारे में एक यह भी तर्क दिया जाता है कि शाब्दिक गतलती भी दीनदारनगर को दिलदारनगर में तब्दील करने की एक अहम वजह हो सकती है। 

आज मुहर्रम की सातवीं तारीख है। आज ही के दिन मु0 दीनदार खां ने दीनदारनगर की स्थापना किया था। इस नगर को बसे 330 साल हो गये। इतिहास के पन्नों में यह इलाका दीनदारनगर के नाम से दर्ज तो है मगर आज अपने असली नाम से महरूम है। लोग इसे दिलदारनगर के नाम से जानने लगे हैं। कौमी इकजहती के लिए मशहुर कमसार व बार का यह खित्ता लोगों के जेहन में अपनी विरासत की असली निशानी को दस्तावेजी रूप से बता पाने में आज भी नाकाम है। मुगलिया जागीरदार राजा मु0 दीनदार खां के वंशज कु0 नसीम रजा खां ने अपनी विरासत के औराक संजोने का काम जरूर किया है मगर इस नगर को उसकी असली पहचान व नाम दिला पाने में आज भी लगे हुए हैं। इनकी लगन व मेहन का ही नतीजा है कि खनदानी विरास के साथ इलाके के इतिहास को संजो कर इन्होने म्यूजियम रूपी गुलदस्ते को कायम किया हुआ है। सन् 2016 में इनके मेहनत और लगन को देखते हुए सूबे के तत्कालीन पर्यटन मंत्री ने राजा मु0 दीनदार खां के कोट पर पर्यटन विभाग की तरफ से दीनदार म्यूजियम के स्थापना का निर्णय लिया, जो कि निर्माणाधीन है। दीनदारनगर की स्थापना के 330 साल पूरे होने पर इन्होने मु0 दीनदार खां एक मुगलिया जागीरदार नामक दस्तावेजी स्मारिका के प्रकाशन का निर्णय लिया है, जो लगभग तैयार है। आज जरूरत है इस इलाके को उसकी असली नाम व पहचान दिलाने की।

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