न्यू इंडिया में सिसकती मदर इंडिया


अब्दुल रशीद।। जिस देश में गाय को मां का दर्जा दिया जाता है उस देश में बच्चों के मौत पर चीखती माताओं के चीख को अनसुना कर दिया जाए और देश के सबसे बड़े संसदीय क्षेत्र वाले प्रदेश के मुखिया कहते हैं की कहीं बच्चों के पालने की जिम्मेदारी सरकार की है न समझ ले जनता, तो यह संवेदनहीनता कि पराकाष्ठा नहीं तो और क्या? बच्चों की मौत का कारण कहीं जापानी इंसेफेलाइटिस तो कहीं कुपोषण है।भारत सरकार की एजेंसी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनपीएसएस) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 93.4 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। 

जापानी इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार 

इस साल उत्तर प्रदेश के गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 1250 बच्चों की मौत हो चुकी है जिसमें सबसे ज्यादा मौत जापानी इंसेफेलाइटिस से होना माना जाता है।बच्चों के मौत का सिलसिला अभी थमा नहीं।मानसून के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार झारखण्ड,ओडिशा और असम में जापानी इंसेफेलाइटिस के चलते बच्चों की मौतें की संख्या बढ़ जाती है।देश के 100 से अधिक जिले इसके संक्रमण की चपेट में हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी बुखार के चलते 1980 से लेकर अब तक बारह हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। 

कुपोषण का कहर 

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में पांच वर्ष तक के 47.8 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं. इनमें से चार लाख बच्चे अति कुपोषित हैं।पूरे देश में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे झारखंड में हैं।बिहार और उत्तर प्रदेश की स्थिति भी खराब है।रिपोर्ट यह भी बताती है कि एक साल तक के बच्चों की मौत के मामले में उत्तर प्रदेश पूरे देश में पहले नंबर पर है।पिछड़े राज्यों में गर्भवती महिलाओं और बच्चों में कुपोषण की समस्या अधिक पायी जाती है।गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पूरी तरह से पोषाहार नहीं मिलने से उनके बच्चे अत्यधिक कमजोर पैदा होते. ऐसे बच्चों को बचा पाना चुनौती भरा होता है।


जमशेदपुर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पिछले चार महीने में ही 164 बच्चों की मौत हुई है। अधिकतर बच्चों की मौत का कारण कुपोषण है।जांच के लिए चार सदस्यों की कमेटी भी बन गई. हमें बताया गया कि कुपोषण के कारण ज्यादातर बच्चों की मौत हो रही है. ये सभी ग्रामीण क्षेत्र के हैं।राजस्थान के बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में जुलाई-अगस्त के महीने में 90 बच्चों की मौत हो गई है।इनमें से 43 की दम घुटने से मौत हुई है।राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने ज़िला कलेक्टर को जांच के आदेश दिए हैं।जुलाई महीने में 50 बच्चों अगस्त में 40 बच्चों की मौत हुई है अप्रैल में भी 20 और मई में 18 बच्चों की मौत हो गई है।इन बच्चों और इनकी माओं में कुपोषण कारण बताया गया है। 

सवास्थ्य सुविधाओं का आभाव 

यदि निष्पक्ष होकर सरकारों के दावों पर गौर करेंगे तो आपको इस बात का अहसास होगा के ज्यादातर सरकारें दावों को अमली जामा पहनाने मे असफल रहें हैं।मरीजों के लिए बुनियादी सुविधा देश के अधिकतर राज्यों में खुद ही वेंटीलेटर पर है।स्वास्थ्य केन्द्रों की या तो कमी है या आम जनता के पहुँच से दूर है।चिकित्सकों के खाली पद भरने में कोताही बरती जाती है।नवजात बच्चो के इलाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण मशीन वेंटीलेटर और इन्क्यूबेटर की ज्यादातर अस्पतालों में पर्याप्त सुविधा नहीं होती। 

जागरूकता और सफाई का अभाव 

स्वास्थ्य जानकारों का मानना है कि यदि हम अपने आसपास सफाई का ध्यान रखें तो बच्चों की जान बचाया जा सकता है लेकिन ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य जागरूकता का आभाव है, जिसके चलते बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। 
पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोकने के उद्देश्य से गांवों में स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत हुई थी।सीएजी के 2011 से मार्च 2016 तक का रिपोर्ट देखकर आपको हैरानी होगी,रिपोर्ट के अनुसार 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च किया ही नहीं।2011-12 में खर्च न होने वाली राशि 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई।6 राज्य ऐसे हैं जहां 36.31 करोड़ की राशि किसी और योजना में लगा दी गई। यदि जनता ऐसे रिपोर्ट पर हैरान होने के बजाय रियेक्ट करे तो सुधार की उम्मीद की जा सकती है नहीं तो घटना घटेगी ब्रेकिंग न्यूज बनेगा जांच कमेटी बनेगी कुछ लोगों का तबादला और कुछ का निलंबन मामला रफ़ा दफ़ा।
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