चुनाव बार-बार या एक बार

चुनाव बार-बार या एक बार


शब्बीर कादरी।।चुनाव आयुक्त ओपी रावत द्वारा हाल ही में अपने भोपाल प्रवास के दौरान दी गई इस जानकारी से कि सितम्बर 2018 तक चुनाव आयोग, लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में सक्षम हो जाएगा से यह बहस तेज हो गई है कि क्या आगामी वर्ष के अंत तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाने की संभावना है। देशभर में इस मुद्दे पर मीडिया मंथन चल रहा है हालांकि उन्होने यह भी कहा कि हम नहीं बता सकते कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कब से कराए जा सकेंगे। गाहे-बगाहे कहीं प्रतिध्वनियों में दूर से यह भी सुनाई देता है कि सत्तारूढ़ दल समयपूर्व लोकसभा चुनाव की पहल कर सकता है या कि कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ इसकी कवायद कर सकता है। यद्यपि स्वतंत्रता के बाद से ही इंदिरा काल तक विधानसभा और लोकसभा साथ ही संपन्न कराए जाते रहे हैं पर राजनीतिक विद्वेष और सत्ता की चाहत के चलते बाद के वर्षो में चुनाव कार्यक्रमों को इच्छानुसार रूप देकर ऐसा ढ़ंाचा तैयार किया गया कि अब वर्ष भर देश में कहीं न कहीं चुनावी उत्सव दिखाई दे जाता है। इस अनवरत् चलती चुनाव श्रंखला के कारण जनकल्याणकारी योजनाऐं और नागरिक सेवा से जुड़े कई जरूरी और नितांत आवश्यक प्रशासनिक कार्य लंबित हो जाते हैं। न केवल इस व्यवस्था से व्यवस्था पर आर्थिक बोझ बार-बार पड़ता है वरन् आमजन को भी अपने महत्वपूर्ण कार्य बीच में छोड़कर चुनावी घात-प्रतिघात का भी शिकार होना पड़ता है। चुनावों का यह क्रम सत्तारूढ़ दल के समक्ष यह दुविधा भी पैदा करता है कि वह जनहित की कई प्रभावशाली योजनाओं को लागू करने में सहज नहीं हो पाता और यह भी कि कई कल्याणकारी योजनाओं को मूर्तरूप प्रदान करने में संशय का शिकार हो जाता है। इस विषम परिस्थिति से सरकार में शामिल दल लोकलुभावन तात्कालिक योजनाऐं लागूकर समर्थकों और मतदाताओं में अपनी पकड़ बनाए रखने की पहल करते हैं। एक बार के चुनाव से सत्तारूढ़ दल कल्याणकारी फैसले एकस्वर से लेकर उन्हें फलीभूत कराने की शक्ति और साहस दिखा पाऐंगे जिससे लोकतंत्र भी सशक्त होगा, धन भी अधिक व्यय नहीं होगा और आमजन को भी एक ही बार इस प्रक्रिया से गुजरना होगा।

एक साथ चुनाव के सवाल को संदिग्ध दृष्टि से देखने और समझने वाले इस बार-बार के चुनावी विकारों को सिरे से खारिज करते हैं। एसोसिेएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफामर््स के सह संयोजक प्रो. जगदीश छोकर का मत है कि ऐसा किया जाना संवैधानिक तौर पर संभव नहीं है क्योंकि संविधान में हमारे यहां केन्द्र और राज्य सरकारें अलग-अलग इकाईयां हैं जिनके अनुच्छेद भी अलग-अलग हैं इन इकाईयों का कार्यकाल पांच वर्ष उद्धत है जैसी ही कोई सरकार का गठन होता है तब से लेकर पांच वर्ष तक उसकी कार्यावधि होती है। आजादी के कुछ दशक बाद लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल में अंतर इसलिए आ गया कि या तो कुछ सरकारे अपने राजनीनिक क्षुद्रस्वार्थ के चलते कार्यकाल पूरा न कर समयपूर्व गिर गईं या षणयंत्रपूर्वक गिरा दी गईं। प्रो.छोकर मानते हैं कि एक साथ दोनों विधायिकाओं के चुनावों कराए जाने से संविधान में कम से कम पांच अनुच्छेदों को संशोधित करना होगा जो वर्तमान में मौजूद राजनीतिक विसात के चलते कुछ असंभव जरूर है। जब-जब सरकारें बहुमत के आधार पर सत्तासीन होती हैं तो वे इस प्रकार की कवायद की पहल करती रही हैं।


इस संदर्भ में हमें याद रखना होगा कि भाजपा द्वारा नियंत्रित राजग ने 1999 के लोकसभा चुनावों के लिए अपने दिग्गज नेता अटलबिहारी वाजपेयी के समक्ष जो एजंेडा जारी किया था उसमें एक वाक्य कि विधानमंडलों सहित सभी निर्वाचित निकायों की कार्यावधि (पाचं वर्ष) सुनिश्चित करने के उपाय किए जाएंगे को शामिल किया था और तब भी इसके समर्थन या विरोध में राजनीतिक दलों और व्यक्तियों की और से जोरदार आवाज उठाई गई थी। बाद के वर्षों में भाजपा द्वारा इस प्रक्रिया को मूर्तरूप नहीं दिया जा सका। यह सच है कि कभी-कभी एक या दो सदस्यीय दल बड़े दलों को सहयोग कर उनसे अपने हितों का मोलभाव करते हैं ताकि वे स्थायित्व के नाम पर सत्ता की मलाई पाते रहें। प्रो. छोकर के अनुसार केशवानंद भारती मामले पर 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो है किंतु वह संविधान के आधारभूत ढ़ंाचे में बदलाव नहीं कर सकती, हमारे यहां का आधारभूत ढ़ांचा संघीय है इस एकीकृत ढ़ांचा बनाने की किसी भी कोशिश को अदालत से मंजूरी नहीं मिलेगी। सरकारें जब बहुमत के साथ सत्ता में होती हैं तो वे इस प्रकार के प्रयोग कर जनमत को अपने पक्ष में प्रभावित करने के हर बिंदु को आजमाती हैं हालांकि बार-बार के चुनाव को भारतीय राजनीति की ऐसी विफलता कहा जा सकता है जिस पर गंभीर विमर्श आज के राजनीतिक परिवेष की नितांत आवश्यकता है। पर वर्षों पूर्व समाजवादी नेता डा.राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतेजार नहीं करतीं। इस सूत्र को रेखाकित करते हुए सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने लिखा है कि हमें स्थायित्व किसका चाहिए देश का या सरकार का यदि देश का तो यह स्थिरता स्वस्थ्य लोकतंत्र की प्रतिष्ठिा से प्राप्त किया जा सकता है तानाशाही से नहीं, ग्यारहवी लोकसभा के गठन के बाद जब तेरह दिन में ही रजग सरकार गिर गई थी तब भाजपा ने ही इस को समस्या का नाम देकर पांच वर्ष में एक बार चुनाव की वकालत की थी जहां तक बार-बार चुनाव में होने वाले खर्च की चिंता तो इस प्रकार दूर की जा सकती है कि पचास वर्ष में एक ही बार चुनाव कराए जाऐं तब तो खर्च बिल्कुल ही नहीं आएगा। किसी भी तरह सत्ता में बना रहने की मानसिकता तानाशाही का सूचक मानी जाती है जबकि स्वस्थ्य लोकतंत्र को देशहित में गहराई से समाज के हर तबके, वर्ग तक प्रतिष्ठित करने की निष्पक्ष प्रक्रिया आमजन के लिए कहीं अधिक आवश्यक और संविधान अनुसार है और यही देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित करेगा।
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