एक शाम ब यादगारे हारून रशीद (अलीग)

एक शाम ब यादगारे हारून रशीद (अलीग)

उर्दू कलमकार हारून रशीद अलीग की याद मे रायपुर के बृन्दवान हाल मे आयोजित की गई सेमिनार 
मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
रायपुर(छत्तीसगढ़)।। उर्दू भाषा के सुप्रसिद्ध पत्रकार हारून रशीद खान अलीग की याद मे गुरुवार शाम पाँच से रात दस बजे प्रोत्साहन समाजिक एवं सांस्कृतिक मंच और बेनजीर अंसार एजुकेशन एण्ड सोशल वेलफेयर सोसायटी द्वारा छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित सिविल लाईन्स वृन्दावन हॉल मे एक  सेमिनार आयोजित की गई। इस प्रोग्राम के आयोजक आई.पी.एस. डीजीपी वज़ीर अंसारी रायपुर छत्तीसगढ़ रहे और प्रायोजक प्रोत्साहन सामाजिक एवं सांस्कृतिक मंच के अध्यक्ष रिटायर्ड डीआईजी रायपुर जयन्त मोरात तथा चश्मबराह जनाब सैयद इनामुल्लाह शाह रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज रायपुर थे।
हारुन रशीद अलीग का जन्म एक मध्यम वर्गीय परिवार मे 31 मई सन् 1942 ई० को मुंबई में हुआ था। इनके पिता का नाम इस्माईल खान और माता का नाम हिफाजत बीबी थी। इनके पिता समाजसेवी के साथ-साथ एक मामूली सा मुंबई मे टेक्सी ड्राइवर भी थे और माता घरेलू खातून थी। यूपी जिला ग़ाज़ीपुर के मुस्लिम बहुमूलिय इलाका कमसार-व-बार क्षेत्र के मौज़ा उसिया गाँव के रहने वाले हारून रशीद अलीग के पिता इस्माईल खाँ ने क्षेत्रिय बच्चो की शिक्षा के लिए हॉस्टल के रूप मे सन् 1962 ई० को दिलदारनगर मे हाजी लॉज का निर्माण कराया। एक साधारण से दिखने वाले हारुन रशीद अलीग को उनके नेक कर्मो ने असाधारण बना दिया। बात है सन् 1960 ई० की जब हारून रशीद कक्षा चार की पढ़ाई गिरगांव मुंबई के चौपाटी म्युनिसिपल स्कूल से पूरा कर कक्षा पाँचवी की पढ़ाई के लिए मुंबई मे उर्दू के मशहूर अंजुमन इस्लाम बॉयज 'व्ही.टी' हाई स्कूल दाखिले के लिए गए तो उस स्कूल के प्रिंसिपल ने उनका दाखिला न लेकर ये कहकर स्कूल से भगा दिया गया की बेटा आपके लिए ये स्कूल नही है, आपके अब्बु इस कॉलेज का फीस एफोर्ड नही कर पाएंगे। इस वाकिये के बाद जब वे रोते हुए 'व्ही.टी.' स्कूल से चरनी रोड के रास्ते घर वापस लौट रहे होते है तो उनकी मुलाकात एक अजनबी इंसान से होती है। उस अजनबी ने बच्चे को रोते हुए देखकर मामले की पूछताछ की और अपनी कार मे बिठाकर उस स्कूल के रजिस्टार के दफ्तर पहुंच उनका दाखिला कराकर हारुन रशीद के चेहरे पर हंसी लाकर ही दम लिया। वहां से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सन् 1964 ई० मे कक्षा - 11 वी के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विस्वविद्यालय मे प्रवेश लिया। उसके बाद वही से इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन के बाद उर्दू से 'एम०फील' की डिग्री हासिल कर अपने नाम के सामने 'अलीग' का इजाफा कर के ही दम लिया।

हारुन रशीद अलीग समाज सेवा लेखन के साथ-साथ खेल कूद मे खासी दिलचस्पी थी। वो क्रिकेट खेलते जो उनका पंसंदीदा खेल था। वो अक्सर इंडिया-पाकिस्तान का मैच देखा करते थे। अलीगढ़ अध्यापन के दरमियान ही हारून रशीद अलीग को सन् 1964 ई० से सन् 1970 ई० तक हर साल बेहतरीन तकरीर के लिए पुरस्कृत किया गया।
तालीम के दरमियान ही इनकी शादी इस्लाह फाउंडर रेलवे डी.टी.एस. मैन खान बहादुर मंसूर अली गोड़सरावी के परिवार मे हाजी जंगा खान की लड़की से लखनऊ हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद घर की हालात देखते हुए हारून रशीद ने मुंबई का रुख किया। वहां कई छोटी-मोटी नौकरीया भी की पर उनको जमा नही, फिर उन्होने लिखना शुरू किया। उनका लिखा अनेको उर्दू लेख उर्दू टाइम्स, अखबारे-नौ, इन्कलाब इतियादी पेपरो मे छपा जिसे कई संपादको के द्वारा खूब सराहा गया। उर्दू जबान-व-अदब पर उन्होंने ऐसी महारत हासिल की थी कि देखते ही देखते उन्हें मुंबई के साथ-साथ हैदराबाद जैसे बड़े शहरो के उर्दू अखबार रसालों मे भी उनके मज़ामीन प्रकाशित होने शुरू हो गए। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से एक आजाद सहाफी के रूप मे समाज के बीच एक अच्छी पहचान बनाई। इनकी स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए महाराष्ट्र उर्दू - अकादमी द्वारा सन् 1980 ई० बेहतरीन पत्रकार का पुरस्कार प्रदान किया। इसके बाद सन् 1977 ई० मे मशहूर शायर हसन कमाल से इनकी मुलाकात हुई और उर्दू बिल्टज मे बतौर सहाफी काम किया और सन् 1979 ई० मे हारून रशीद अलीग उर्दू बिल्टज के संपादक बनाये गये। इस दौरान ही इन्होने रोजनामा इन्कलाब मे 'खेल की दुनिया' और 'आलम-ए-इस्लाम' नामक बेहतरीन कालम लिखतेे और अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत इन्कलाब की शुरुआती दौर मे ही अवल दर्जे का उर्दू अखबार बना दिया। जिसे देखते हुए उन्हें पाँच वर्षो तक बतौर रोजनामा इन्कलाब मे संपादक बने रहे।

नेक दरिया दिल इंसान होने के नाते सन् 1992 ई० मे बाबरी मस्जिद केस के दरमियान हिंदू-मुस्लिम भाईचारा को बनाये रखने के लिए सामने आए जिसका नतीजा ये हुआ कि मुंबई ठाकुरद्वारा स्थित मकान को दंगे मे जला दिया गया। जिसका नतीजा ये मिला की अपनी जिंदगी की सारी मेहनत-मशकत की कमाई को पूरी लाइब्रेरी ही जलकर खाक हो गई। जब तक सांसे चली तब तक कौमी एकता के लिए काम किये और एक वो भी दिन आया जो अपनी तीन बच्चियो और एक बच्चे को छोड़कर 4 मार्च सन् 2000 ई० को अलविदा कर गये। इनकी मृत्यु निःसंदेह उर्दू साहित्य जगत के लिए एक अपूणीय क्षति थी। उनकी कही हुई वो बात को अम्ल करते हुए उनकी मिट्टी उनके पैतृक गांव उसिया सातहवाँ मोहल्ला कब्रिस्तान मे दफ़न कर दिया गया। 

समाजसेवी डीजीपी वज़ीर अंसारी ने अपनी स्पीच मे कहा कि जिस प्रकार लेखक मुंसी प्रेमचन्द्र को हिंदी भाषा का कलम का सिपाही माना जाता है यूं ही कलमकार हारुन रशीद अलीग भी अपने दौर का उर्दू भाषा का 'कलम की सिपाही कह लीजिए। आज हमारे बीच वो नही है फिर भी उनके लेखन मे उनकी दर्द भरी जोसिली कारनामे आज भी लोगो के बीच जिंदा है और इंशाहल्लाह आगे भी जिंदा रहेगा। 
प्रोग्राम के चीफ गेस्ट तजेंद्र सिंह 'गगन' रहे और तमाम मेहमान खुशुसी कवि और शायर मे श्रीमती शीला गोयल, श्री गोविंद देव अग्रवाल, श्री राजेंद्र मौर्य विलासपुरी, श्री भवानी शंकर बेगाना, श्रीमति उर्मिला देवी उर्मी, मोहतरमा सबा खान दुर्ग, जनाब सलीम कुरैशी महासमुंद, जनाब फ़ज़ल अब्बास सैफी, जनाब मीसम हैदरी, मोहतरमा डॉ० कमर सुरूर अहमदनगरी, जनाब अफ़ज़ल दानिश बुरहानपुरी जैसे ख़ास व आम प्रोग्राम मे मौजूद रहे।
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