नौकरशाही को सरंक्षण देने की निर्लज्जता

नौकरशाही को सरंक्षण देने की निर्लज्जता


प्रमोद भार्गव।। राजस्थान में लोकसेवकों और न्यायाधीषों के विरुद्ध परिवाद पर जांच से पहले अनुमति की अनिवार्यता वाला विवादित विधेयक विपक्ष, मीडिया और जनता के जबरदस्त विरोध के कारण पारित नहीं हो पाया। काले कानून की यह खिलाफत लोकतंत्र की रक्षा का सुखद संदेश है। इस विधेयक के प्रावधानों से असतुष्ट भाजपा विधायक घनष्याम तिवाड़ी और भाजपा को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक माणकचंद सुराणा भी सत्ता पक्ष के विरुद्ध खड़े दिखाई दिए। लोकसेवकों के कथित हितों की रक्षा के बहाने भ्रष्ट नौकरशाही को सुरक्षा कवच देने वाले इस विधेयक पर राजस्थान उच्च न्यारयालय ने भी तल्ख टिप्पणी की। इस बाबत प्रस्तुत एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘यह निक्कम्ी सरकार है और निकम्मे लोग हैं। अब तो हद हो गई है कि सरकार इन निकम्मों को बचाने के लिए अध्यादेश तक ला रही है।‘ अदालत की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार की सामंती सोच की निर्लज्जता पर कुठाराघात है। इस अध्यादेश के प्रावधानों में प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी बाधित करने के अलोकतांत्रिक उपाय किए गए थे, यहां तक कि सोषल मीडिया पर भी आम-आदमी अपनी तकलीफ बयान नहीं कर सकता था। अब चयन समिति इसके प्रारूप पर पुनर्विचार करेगी।

अब तक किसी भी भारतीय नागरिक को निजी इस्तगासा के मार्फत अपने ऊपर हुए अत्याचार या किसी लोकसेवक द्वारा बरते गए कदाचरण को संज्ञान में लाने का अधिकार है। किसी नौकरशाह द्वारा बरते गए दुष्ट आचरण की शिकायत जब थाना में नहीं सुनी जाती तो पीड़ित व्यक्ति निजी इस्तगासा दायर कर अपने हक में कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। किंतु विधेयक के माध्यम से वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ऐसे लोगों के मुंह सिल देना चाहती हैं, जो भ्रष्ट नौकरशाहों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने को आमादा रहते हैं। इस संषोधन विधेयक के जरिए आईपीसी की धारा 228 में 228 बी जोड़कर प्रावधान किया गया है कि सीआरपीसी की धारा 156 और धारा 190 सी के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल का कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीष, मजिस्ट्रेट व लोकसेवक के खिलाफ अभियोजन की स्वकृति मिलने से पहले उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाषन व प्रसारण भी नहीं किया जा सकेगा। हालांकि न्यायपालिका को षक के दायरे में लाने से पहले उच्च न्यायालय की मंजूरी आवष्यक है। लोकसेवकों, यानी कार्यपालिका को तो इनकी आड़ में जोड़कर उनके भ्रष्ट आचरण को सुरक्षा प्रदान की जा रही थी। यह उपाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस नारे की भावना का भी उल्लघंन है, जिसमें वे 56 इंची सीना तानकर वे कहते रहे हैं कि ‘न खऊंगा और न ही खाने दूंगा।‘

भ्रष्टाचार से मुक्ति देश की राष्ट्रीय आकांक्षा है। देश की तमाम लोक-कल्याणकारी योजनाएं केवल भ्रष्ट नौकरशाही के कारण नाकाम हो जाती हैं। बावजूद राजस्थान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को सरंक्षण देने के ऐसे उपाय करना जिससे आरोपितों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने तक कोई कार्यवाही न हो तो सरकार मंषा पर भी सवाल उठना लाजिमी है। दरअसल वर्तमान राज्य सरकारों के नेतृत्वकर्ता धन उगाही, गाहे-बगाहे नौकरशाही के माध्ययम से ही कर रहे हैं। यह उगाही राजनीतिक चंदे के लिए की जा रही हो अथवा निजी वित्तपोशण के लिए, नौकरशाही एक माध्यम बनकर पेष आ रही है। इसीलिए खासतौर से देश में जिन-जिन प्रदेषों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां-वहां नौकरशाही निरंकुषता के चरम पर है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों में तो इसी सांठगांठ के चलते नौकरशाही बेलगाम है। महाराष्ट्र सरकार ने इस आषय का कानून दो साल पहले ही पारित किया है। इसमें अभियोजन स्वीकृति की अवधि तीन माह है, जबकि राजस्थान में इसे बढ़ाकर छह माह कर दिया गया है।

सरकार की यदि मंषा ईमानदारी होती तो उसे जरूरत तो यह थी कि वह सीआरपीसी की धारा 197 में संषोधन का प्रावधान लाती। इसकी ओट में भ्रष्ट अधिकारी मुकदमे से बचे रहते हैं। इसीलिए इसे हटाने की मांग लंबे समय से चल रही है। इस धारा के तहत यदि कोई लोक सेवक पद पर रहते हुए कोई कदाचरण करता है तो उस पर मामला चलाने के लिए केंद्र सरकार से और राज्य लोक सेवा का अधिकारी है तो राज्य सरकार से मंजूरी लेना जरूरी है। राजस्थान सरकार ने इस धारा को विलोपित करने की मांग उठाने की बजाय, इसे ताकत देने का काम कर दिया था। क्योंकि संषेधन विधेयकपारित हो जाता तो फिर मीडिया भी तत्काल भ्रष्टाचारियों से संबंधित समाचारों के प्रकाषन व प्रसारण के अधिकार से वंचित हो जाता। साफ है, यह विधेयक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध था, लिहाजा लोकतंत्र की मूल भावना को आघात पहुंचाने वाला था। यह इसलिए भी असंवैधानिक था, क्योंकि अधिकारी से संबंधित शिकायत पर जांच करने या न करने के अधिकार सत्तारूढ़ दल के पास सुरक्षित थे। अब वह सत्तारूढ़ दल उस नौकरशाह के खिलाफ जांच के आदेश कैसे दे सकता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्तारुढ़ दल के हित साधने में लगा हो ? जाहिर है, सरकार भ्रष्टाचार को संस्थागत करने के प्रावधान को कानूनी रूप देने की कुटिल मंषा पाले हुए थी।



फिलहाल मीडिया को शिकायत के आधार पर अथवा गोपनीय रूप से गड़बड़ी के सरकारी दस्तावेजों के आधार पर ही खबर छापने एवं प्रसारित करने का हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत था। इस अध्यादेश को यदि बाईदवे विधेयक के रूप में स्वीकृति मिल जाती तो शिकायत हमेषा के लिए ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती। इस लिहाज से यह विधेयक राजस्थान सरकार का भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने की बेहद निर्लज्ज व निरकुंष कोषिष थी। भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था में ऐसे निरकुंष प्रावधानों पर अमल तो दूर, सोचना भी अनैतिकता के दायरे में आता है। भारतीय जनमानस की याददाषत इतनी कमजोर नहीं है कि वह देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के उस आंदोलन को भूल जाए, जिसमें लोकसभा में विपक्ष में बैठी भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार मुक्त षासन-प्रषासन की पैरवी की थी। राजनीति और सरकार में पारदर्षिता की वकालात की थी। दुर्भाग्य से आज यही भाजपा केंद्र में सत्तारुढ़ होने के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति से कन्नी काट रही है और राजस्थान में भ्रष्ट नौकरशाही से संबंधित खबरों को प्रतिबंधित कर रही है।



प्रषासनिक अधिकारी केंद्रीय सेवा के हों या राज्य सेवा के, उन्हें इतने संवैधानिक सुरक्षा-कवच मिले हुए है कि उनका अदालत के कटघरे में खड़ा होना आसान नहीं है। षायद इसीलिए संविधान विषेशज्ञ मंत्री-परिशद् का कार्यालय पांच साल का मानते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी है। उसे प्रत्येक पांच साल में मतदाता के समक्ष परीक्षा में खरा उतरने की चुनौती पेष आती है, लेकिन प्रषासन का न कोई समयबद्ध कार्यकाल है और न ही उनकी जवाबदेही जनता के प्रति और न ही कर्तव्य के प्रति सुनिष्चित है। बावजूद मंत्री-परिशद् लोकसेवकों के भ्रष्टाचार को सुरक्षित करने को तत्पर हैं तो इस पहल को संदिग्ध निगाह से ही जाएगा। जरूरत तो राज्य सरकार को यह थी कि वह प्रषासनिक सुधार लागू करने की पहल करती और नाौकरषाही को जनता व लोक-कल्याण्कारी राज्य के प्रति उत्तरदायी बनाती। दरअसल नौकरशाही को जितना अधिक कानूनी सुरक्षा-कवचों से नवाजा जाएगा, वह उतना ही अधिक भ्रष्ट और निरंकुष होती जाएगी। जबकि इस भ्रष्ट कदाचरण का दंष और निंदा, निर्वाचित प्रतिनिधियों और चुनी गई राज्य सरकारों को झेलने होते है। यह अच्छी बात रही कि विपक्ष और मीडिया के प्रभावी दबाव के चलते सरकार ने लज्जा का अनुभव किया और स्वयं विधेयक को वापस ले लेना चाहिए। लोकतंत्र में इसी तरह से सुषासन को अमल में लाने की जरूरत है।
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