बनारस के विनोद कुमार संघर्ष कर दिव्यांगो व बालिकाओ/महिलाओ को दिलवा रहे सुविधाएं

वाराणसी समाचार


वाराणसी से राजेश वर्मा।। दिव्यांग "विकलांगता" शब्द जब किसी व्यक्ति के जीवन के साथ जुड़ जाता है तो समाज उससे मुंह फेर लेता है। ऐसे व्यक्ति भले ही अन्य लोगों की तुलना में शारीरिक रूप से ज्यादा मजबूत न हों पर समाज का एक अंग होते हैं। ऐसे लोगों को समाज से किसी तरह की भीख की उम्मीद नहीं होती। वे जीवन में संघर्ष करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। वे समाज से केवल एक सहयोग चाहते हैं कि उन्हें भी समाज का अंग समझा जाए। ऐसा कहना है सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का समाज में विकलांगों और बालिकाओं को बराबरी का अधिकार दिलाने को ही अपने जीवन का मकसद बना लिया है विनोद कुमार ने कहाकि "जब कोई विकलांग बच्चा समाज से सहयोग न मिलने के कारण जीवन में हार मान चुका हो, उसमें एक बार फिर से कुछ कर दिखाने का जुनून देखना अच्छा लगता है।

उनके छोटे-छोटे सपनों के इर्द-गिर्द एक नया समाज बनते देखना अच्छा लगता है।" ऐसा कहना है विनोद कुमार का पिछले दस वर्षो से विकलांगों और बालिकाओं के अधिकारों के लिए जिद्दोजहद कर रहे हैं। इनके के पास कोई नौकरी नहीं, थोड़ी सी जमीन पर खेतीबाड़ी मजदूरी करके जीवन बसर करना किसी चुनौती से कम नहीं है। अब तक पांच सौ से अधिक विकलांगों की पेंशन लगवाना और अढ़ाई सौ से अधिक विकलांगों और महिलाओ को विभिन्न योजना के तहत ऋण उपलब्ध करवाना के साथ पांच सौ से अधिक विकलांगो को व्हील चेयर, ट्राई सायकिल हजारों विकलांग प्रमाण पत्र, रेल व बस पास बनवाना उनकी सक्रियता का नतीजा है। उनके हाथ में हमेशा फाइल होती है जिसमें पेंशन, ऋण, रेल-बस पास व विकलांगों के भले संबंधी दस्तावेज होते हैं।



वाराणसी के आराजी लाईन राजातालाब क्षेत्र के मुबारकपुर बेनीपुर के रहने वाले विनोद कुमार जब उनकी आयु तेरह चौदह वर्ष की थी तो उनके पिता बीमारी की वजह से धनाभाव के कारण उचित इलाज नहीं होने से मौत हो गई। कुछ दिनों तक गम और उदासी का जीवन जीने के बाद विनोद कुमार ने हिम्मत बटोरी और समाज सेवा में जुट गए। परिवार में एक भाई एक बहन व माता की जिम्मेदारी उन पर आ पड़ी। पारिवारिक आर्थिक विषमताओं के कारण अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे परिवार को पालना बहुत बड़़ी चुनौती थी। पर मजदूरी, नौकरी की। भाई को भी काम पर लगाया। बहन की शादी करवाया बाद में वापस लौटे और विकलांगो की सेवा पर ध्यान लगाया। शादी भी नही करने का संकल्प लिया। बस एक ही लक्ष्य बना लिया कि के शोषित वंचित विकलांगों व बालिकाओ, महिलाओ के लिए ही काम करना है, अधिकारों के प्रति जागरूक ही नहीं करना है, बल्कि समाज में सिर उठा कर जीने का अधिकार भी दिलाना, सरकार की तरफ से उपलब्ध सुविधाओं को भी उपलब्ध करवानी है। यह कोई आसान काम नहीं था। विनोद कुमार ने विकलांगों और बालिकाओं के लिए कस्तूरबां सेवा समिति संस्था सामाजिक संगठन का स्थापना कर के साथ काम करना शुरू किया और जिन्हें पेंशन, रेल- बस पास, ऋण, इलाज के बारे में पता नहीं था, या औपचारिकताओं के कारण उपरोक्त लाभ नहीं ले पा रहे थे, उनको उपरोक्त लाभ दिलाने का बीड़ा उठाया। विनोद कुमार बताते हैं कि फॉर्म भरकर दस्तावेज इकट्ठा करना और फिर सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट कर पेंशन लगवाना, रेल-बस पास, विकलांग प्रमाण पत्र आदि बनवाना कठिन कार्य तो था, लेकिन नामुमकिन नहीं था। व्हील चेयर, ट्राई साईकल, रेल-बस पास व अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाना भी जिद्दोजहद से कम नहीं। वह गरीब विकलांग लड़कियों की शादियां भी करवा रहे हैं। अन्य सहयोगियों से मिल कर लडकियों को स्वावलंबी बनाने के लिए सिलाई कढ़ाई बुनाई आदि प्रशिक्षण केन्द्र भी खुलवाया है जिसका आसपास के दर्जनों गांव मे सेंटर भी चलता है अब इस प्रशिक्षण केंद्र को अपग्रेड करने में जुटे हुए हैं। साथ ही सैकङो विकलांगो सहित बालिकाओं, महिलाओ को नौकरियां भी दिलवा चुके हैं। इतना ही नहीं विनोद की कोशिशों से कई विकलांग व महिलाएं अपना रोज़गार भी शुरू कर चुके हैं। विनोद कुमार की ज़िंदगी का मकसद बन गया है विकलांगो के हालात में बदलाव लाना। इसके लिए वह उन्हें जागरुक तो कर ही रहे हैं साथ ही ये संघर्ष भी कर रहे हैं कि सरकार विकलांगों की जरुरतों की अनदेखी न करे और विकलांगों तक वो सभी सुविधाए पहुंचे जिसके वो हकदार हैं। के आलावा सैकङो विकलांगो को ट्राई सायकिल, कृतिम अंग, हियरिंग एड, विकलांग यंत्रों आदि विकलांगो को दिलवा चुके हैं इनकी संस्था जन सहयोग केवल चंदा लेकर बिना सरकारी सहायता से विगत दस वर्षों से चल रही हैं वह मानते हैं कि समाज में बराबरी के अधिकार हासिल करने के लिए जागरूकता व संघर्ष की जरूरत है। सफर जारी है और यह मंजिल रुकने वाली नहीं। विकलांगों के लिए पेंशन में बढ़ोतरी हो, समय पर मिले, अन्य सुविधाएं भी मिले, इसके लिए जीवन भर संघर्ष के लिए जी जान से जुटे हैं विनोद कुमार। अभी इनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ है। विनोद चाहते हैं विकलांगों को मुफ़्त शिक्षा की व्यवस्था और नौकरियों में विकलांगों के आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाए जाने का काम जल्द शुरू हो साथ ही वह केंद्र सरकार पर भी दबाव बना रहे हैं कि ऐसे लोगों के विकास के लिये विकलांग आयोग का गठन किया जाए। इनके सामाजिक कार्यों से प्रभावित होकर अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के आधा दर्जन से अधिक विदेशी प्रतिनिधि इनके कार्यों का जायजा लेने आ चुके हैं! विनोद कुमार अपनी अधूरी शिक्षा 2012 मे हाई स्कूल व इण्टर मीडिएट 2014 मे पास कर BSW IGNOU यूपी कालेज वाराणसी मे अंतिम वर्ष के छात्र है अपनी अधूरी शिक्षा पूरी करने के लिए प्रयास कर रहे हैं!

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