भाषा जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ जाए वही पत्रकारिता की भाषा है


वाराणसी।। भाषा जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ जाए वही पत्रकारिता की भाषा है उक्त बातें पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ द्वारा आयोजित 'मीडिया की भाषा' विषयक सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रथम सत्र में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो० अर्जुन तिवारी ने कहीं। आगे उन्होंने प्रतिभागियों को प्रशिक्षित करते हुए कहा कि पत्रकार को पाठको से मित्रता का सम्बंध स्थापित करना चाहिए। जो पत्रकार आम आदमी के साथ समन्वय बनाने में असफल रहा तो वह पत्रकारिता में भी असफल रहेगा। प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने मीडिया के नौ दिशा सूत्र बताएं। जिम्मेदार पत्रकारिता, पाठकों से मित्रता, पत्रकारों को पाठकों की बहुमुखी प्रतिभा का हमसफ़र होना चाहि, पाठकों को हर क्षेत्र में सशक्त बनाने की प्रतिभा होनी चाहिए पत्रकारों में, बोलचाल की सरल सहज हुआ चुभती हुई भाषा का प्रयोग, पाठकों से संवाद, रुचिकर व‌ उपयोगी समाचारों का चयन, रोचक, दिलचस्प व अर्थपूर्ण शीर्षक लगाना, पैकेजिंग चित्ताआकर्षक हो। ये नौ दिशा सूत्र ऐसे हैं जिससे पत्रकारिता उत्तरोत्तर विकास करती जाएगी और पाठक भी किसी समाचार पत्र का पाठक है, यह गर्व से कह सकेगा। प्रथम सत्र की शुरूआत पत्रकारिता एवं जनसंचार विभागाध्यक्ष प्रो० अनिल कुमार उपाध्याय ने ३० जनवरी को गांधी जी की पुण्यतिथि पर गांधी जी के चित्र पर माल्यार्पण कर की। उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो० अनिल कुमार उपाध्याय ने गांधी जी के सादे जीवन व उच्च विचारों पर प्रकाश डाला। गांधी जी के सत्य, अहिंसा व ‌प्रेम के गुणों पर चर्चा करते हुए उनके पत्रकारिता के योगदान को भी याद किया। गांधी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की पत्रकारिता पर गांधी जी का बहुत प्रभाव पड़ा। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के लेखन में विश्वसनीयता होनी चाहिए। मीडिया की भाषा के संदर्भ में कहा कि जब तक स्वदेशी भाषा का विकास नहीं होगा तब तक देश की विकास संभव नहीं होगा। व्यक्ति के विकास की बात करने वाली भाषा ही पत्रकारिता की भाषा होनी चाहिए। इसके लिए गांधी जी ने स्वयं ही बहुत प्रयास किए। प्रथम सत्र का संचालन डॉ० प्रभाशंकर मिश्र व धन्यवाद ज्ञापन डॉ० मनोहर लाल ने किया।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे सत्र में बतौर प्रशिक्षक वरिष्ठ पत्रकार एके लॉरी ने प्रशिक्षुओं को भाषा के प्रयोग के बारे में बताते हुए कहा कि अख़बार में दो तरह की भाषा का प्रयोग होने लगा है। डिजिटल दौर में रिपोर्टिर की भाषा बदल रही है। रिपोर्टर भाषा की मर्यादा को तोड़ने लगा है। इससे बचना चाहिए। वो भाषा जो समाज को तोड़ती है उससे बचना चाहिए। भाषा में शब्दों का चुनाव सावधानी से करना चाहिए।शब्दों के गलत चयन से भाषा पर बुरा प्रभाव ‌पड़ता है। आगे उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की भाषा हमारी भाषा को प्रभावित कर रही है। सनसनी फैलाना पत्रकारिता का काम नहीं है। टीवी पत्रकारिता सनसनी फैला रही है।पत्रकारिता की भाषा ऐसी हो जिससे हम पाठक से सीधा संवाद कर सकें। क्षेत्रीय भाषा का पुट भी पत्रकारिता में डालना चाहिए । जब हमारे पास शब्द होंगे तभी हमारी भाषा सफल होगी और तभी हमारी भाषा प्रभावी होगी।

वाक्य प्रयोग को गड़बड़ करने वाले शब्दों से बचना चाहिए।

बीएचयू के महिला महाविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रो० सुमन जैन ने कहा कि जो भाषा हमें तराश न सके, जिससे हमारा कल्याण न हो वह भाषा ही नहीं हो सकती और यही बात पत्रकारिता पर भी लागू होती है। भाषा हमें सजाती सवाँरती व निखारती है। आज जिस तरह के समाज में हम रह रहे हैं इस परिवेश‌ में हमारी भाषा फिसलती जा रही है। आज़ादी की लड़ाई का मूल हथियार भाषा है। हमें ये विचार करना होगा कि हम जो लिख बोल रहे हैं वह सकारात्मक है अथवा नहीं। पत्रकार लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ है इसलिए उसकी जिम्मेदारी महत्त्वपूर्ण है। अख़बार चैनल या मीडिया पाठक से बनता है। पाठक ही उसकी टीआरपी बनाता है। भाषा और मनुष्य एक-दूसरे के पूरक हैं। जो शब्द या भाव हम बोलते हैं वो ब्रह्म है। भाषा में ध्वनि, सौंदर्य, रस व भाव है। शब्द भाषा के रस को‌ गाढ़ा करते हैं।भाषा मनुष्य, संस्कृति व राष्ट्र का निर्माण करता है। पतंजलि मुनि ने सूत्र दिया था शब्दानुशासन यानि शब्द में अनुशासन। शब्दों का अनुशासन होना आवश्यक है। भाषा संस्कार है और यदि पत्रकारिता यह संस्कार न बनाए रख पाये तो वह पत्रकारिता नहीं है। डॉ० अरुण कुमार शर्मा ने पत्रकारिता की मौज़ूदा समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि समाचार पत्रों का लोकलाईजेशन हो गया है। भाषा के संदर्भ में कहा कि मीडिया की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो सर्वग्राह्य हो। समाचार पत्रों में एडिटर के स्थान पर एडिटोरियल मैनेजर रखे जाने लगे हैं। सत्र के अंत में प्रशिक्षुओं में बीए से सुशील, तुलसी वर्मा, एमए से रानी तिवारी एमफिल से दिव्य प्रकाश दिब्यान्त वे विषय से संबंधित अनेक प्रश्न पूछें जिनका समाधान प्रशिक्षकों ने किया। धन्यवाद ज्ञापन तुलसी वर्मा ने किया। कार्यक्रम में डॉ० विनोद कुमार सिंह, डॉ० अरूण कुमार शर्मा, डॉ० रश्मि श्रीवास्तव, डॉ० रमेश सिंह, डॉ० रूद्रानंद तिवारी, प्रदीप कुमार, राजेश शोध छात्र दिग्विजय त्रिपाठी, सुमित कुमार पाण्डेय, दीपा रानी, संजीव, संदीप, महितोष, प्रबोध, शुभम सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहें।

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