ऐ बचवा सबर करा, जा ओने बईठ जा, अब्बे दवाई पट्टी करत बानी तोहार

ऐ बचवा सबर करा, जा ओने बईठ जा, अब्बे दवाई पट्टी करत बानी तोहार

सपना सिंह (सोनश्री)
डॉ.सुलभ सिंह
डॉ. सुलभ सिंह नाम के अनुरूप सबके लिए सुलभ थे | गाजीपुर में जनता मेडिकल हाल के नाम से इनका दवाखाना चल निकला था | डॉ.साहब गाँव में बहुत लोकप्रिय थे | गाँव में बसने से पहले उन्होंने कालीकट में कोई छोटी नौकरी कर ली थी | जब नौकरी के अल्प पैसे से घर का काम न चल पाया ,तो पता नहीं कब डाक्टरी पढ़ ली, ये बात तो घर-परिवार और गाँव के लिए रहस्य ही रह गई | जो भी हो गाँव में लोगों की छोटी-मोटी बीमारियाँ वो चुटकी में ही गायब कर देते थे | वैसे तो, सुलभ जी दवा के नाम पर सुई ही ज्यादा लगाते थे,पर रोगी के बहुत रिरियाने पर दवा से काम चला देते थे, आस-पास के लोगों के लिए तो डॉ.साहब किसी भगवान् से कम ना थे, वो बिना किसी बड़ी डिग्री के ही लोगों की सेवा किया करते थे, लोग लाभान्वित होते , इसलिए कहीं भी उनके खिलाफ कोई शिकायत न थी | 

सुलभ जी की पत्नी कामना देवी की बस यही कामना होती थी कि हर रोज डाक्टरी में रोगियों की खूब भीड़ लगी रहे | इसके लिए वो रोज सुबह-शाम जोर-जोर भगवान से एक ही प्रार्थना किया करती थीं - “हे भगवान डाक्टरी में आजू के दिन खूब रोगी आवे,कउनो बडियार रोग से परेशान,पैसा वाला रोगी तs दू-चार गो जरूर भेज देइब,गोड लागत बानी, | ” इसके लिए वो भगवान् जी को अच्छी खासी रिश्वत भी देती थी | हर रोज दिन भर में एक बार दवाखाने में जाकर वहाँ की भीड़ जरूर देख आया करती थी | खुदा-ना-खस्ता अगर रोगी कम होते थे, तो उनका वो दिन निश्चित ही काफी परेशानी में जाता था, सारा दिन बस इसी बात की रट लगाती कि “ हे भगवान, आजू के दिने किरपा ना कइली, ऐतना पूजा पाठ कइली, तब्बो डाक्टरी में ढेर रोगी ना अइलन हs , आज तs डाक्टर साहेब कs कमाई नीमन न भइल होई | रउआ के हमार किरिया, काल बिहनवे से, रोगियन कs खूब मेला नियर लाग जाए, काहे कि अजुओ कs भरपाई होखे के चाही न ,हमार एतना आश जरूर पूरा कर देइब, काल स्थाने जाके देशी घीव कs लड्डू अउरी दिया जरूर बारबs ....|”

डॉ. साहब का नाम जितना आसान था, उनको समझना उतना ही कठिन | वैसे वाणी से तो वो बड़े ही उदार थे,किन्तु खाने-पीने की चीजों में उनका कोई मित्र नहीं था | छोटे भाई बहनों को कुछ खाते देख लेते , तो बिना लिए नहीं छोड़ते थे | एक दिन तो हद हो गई, जब हाथ में गुड़ की पीडिया लिए, छोटे भाई बंधूभक्त ने, उनको देखते ही जल्दी से गुड़ की पीडिया मुंह में डाल ली , डॉ. साहब को कहाँ सब्र होता , उन्होंने छोटे को फुसलाकर कि मुहं में कुछ लगा हैं , धीरे से मुहं दबाकर गुड निकाल लिया और खा गये, बेचारा छोटे गुड़ खा लेने की अपनी चालाकी से खुश,मुंह खोले, डॉ. साहेब को देखता रह गया |

एक दिन बवाड़े के प्रधान, अपने असाध्यं रोग से पीड़ित और काफी परेशान, सभी प्रकार के इलाजों से असंतुष्ट, सुलभ जी के पास आते हैं | बहुत पूछने पर शरमाते हुए प्रधान जी ने बताया कि उन्हें बहुत पुरानी बवासीर की समस्या है, जिसका इलाज अभी तक किसी डाक्टर या वैद्द्य से नहीं हो सका | उनकी इस बीमारी का सुलभ जी जड़ से इलाज करेगें,इस बात का आश्वासन पाकर प्रधान जी पूछते हैं¬ - 

“डॉ. साहब, हम कबले ठीक हो जाइब,

इअ रोग तs हमरा के बड़ा दिन से पिछियले बा |

आप चिंता जिन करी,

हम रउआ के पन्द्रह दिन कs भीतरी ठीक करब परधान जी |

हमार इलाज कब से चालू होई डॉ.साहब ?

रउआ चौथा दिने आई, ओ दिन इतवार हs, तबले हम कुल प्रबंध कइ लेइब

बाकी अकेले आईब |

डॉ.साहब हम अकेले आईब

काहे की हमार मेहरारू के छोड़ के,

कोई के हमरा रोग के बारे में जानकारी नईखे... ”

फिर क्या ठीक हो जाने की तमन्ना लिए प्रधान जी घर चले जाते हैं | इधर सुलभ जी घर के बच्चों को इकठ्ठा करते हैं | उन सब को काम दिया जाता हैं कि वो गाँव में घूम-घूमकर अधिक से अधिक मात्रा में कबूतरों की बीट इकठ्ठा करके लायेंगे | मानो बच्चों को मन-मागी मुराद मिल गई, वो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर,दो दिन तक इधर-उधर घूम-घूम कर कबूतरों की बीट-बटोरने में लग जाते गए | सारा गाँव बच्चों के उधम काटने से परेशान, कभी किसी के घर में, तो कभी किसी के खेत में,कभी किसी के बगीचे में, बीट के साथ-साथ अपने काम लायक चीजें भी उठा लाते... |

बटोरी गई सारी बीटों को सुलभ जी धूप में सुखवाकर लेप तैयार करवाते हैं | अगले दिन की योजना बनाई जाती हैं कि प्रधान जी इलाज के समय सोनू और सुमित दरवाजे पर खड़े रहेगे ताकि कोई अन्दर ना आने पाए | अगलू को दाई और मटरू को प्रधान जी बाई तांग पकडनी थी | सूर्या को दाया हाथ और शम्भू को बाया हाथ पकड़ना था | शेखू डॉ. साहेब को जरूरत के हिसाब से सामान पकड़ायेगा | घर के दो बड़े लडकें दीपक और दीपेश , जिनकी उम्र १५-१६ साल रही होगी,उनको प्रधान जी की पीठ को दबाये रखने का काम दिया गया | चिंकू और टिंकू के रोने पर उनको काम में लगे बच्चों की सहायता करने का काम मिला | घर की कुछ लड़कियों और औरतों को ये हिदायद दी गई थी कि वो गाँव के लोगों को डाक्टरी के आस –पास भी न फटकने दें | 

रात में कामना देवी १११ बार दुर्गा जी का नाम जप के प्रार्थना करती हैं कि- “हे दुर्गा मईया ,काल डॉ . साहब के जिनगी कs पहिला आपरेशन हs , आपन कृपा बनवले रहिया माई, उ परधान बड़ा पईसा वाला हवनs,उ नीक हो जाए,तs डॉ.साहब कs नाव अउरी कमाई दूनों बढ़ जाई, कुल ठीक हो गईल तs, हे, माई हम परसों दिना कथा करवाइब |” पत्नी की पूजा और मनौती से गौरवान्वित डॉ.साहब सारी रात योजना ही बनाते रहे कि वो कैसे-कैसे इलाज करेंगे ?

तड़के ही डाक्टराइन को चूल्हे पर खूब गरम पानी खोला के तैयार रखने को कहकर, डॉ.साहब बच्चों को लेकर दवाखाने पहुचते हैं | आपरेशन के कमरे में एक बल्ब, चार डिबरी, एक चौकी, एक टेबल, एक मजबूत छुरा, सुई-धागा, कुछ दर्द निवारक दवाएं, कबूतर की बीट का लेप इत्यादि का प्रबंध भी पहले से ही कर दिया गया था | अगर प्रधान जी परेशान करें तो,चार मोटी रस्सी का बंदोबस्त भी शंभू बैलों को छुट्टा छोड़कर ले आया था | छोटू को काम दिया गया कि जैसे ही प्रधान जी आ जाए,वो दौड़ के घर से गरम पानी लेता आयेगा,सुमित को संकेत किया गया था कि जैसे ही छोटू गर्म पानी लेकर कमरे में आ जाए,वो झटपट कमरे का दरवाजा बंद करके,उसमें ताला मारेगा | 

रोग से मुक्त हो जाने की इच्छा लिए, अपनी दुर्गति से अनजान प्रधान जी दवाखाने पहुचते हैं | 

आई आई प्रधान जी,कुछ खइले नइखी नs 

ना ना डॉ. बाबू रउआ कहे अनुसार तनिको ना खइली हs | 

नीमन बा, बस गमछा पहिन के चौकी पर लेट रही |

देखि, प्रधान जी हम इलाज शुरू करत बानी,

रउआ अब कुछो ना बोलब, चाहे जवन होखे |

ना डॉ. साहेब अब तs हम तबले ना बोलब, जबले रउआ ना चाहब | 

प्रधान जी के लेटते ही योजना अनुसार सुमित दरवाजा बंद करता है,अगलू दाई,मटरू बाई टांग को, सूर्या दाए हाथ को और शम्भू बाए हाथ को ख़ूब जोर से पकड लेते हैं, जैसे ही दीपक और दीपेश पूरे बल से प्रधान जी की पीठ को दबाते हैं 

डॉ. साहेब इs का, एतना लइका कहाँ से आ गइलन कमरा में, इs कुल हमरा के दबवले काहे बाटअ सो |

चिंता जिन करी इs कुल राउर सेवा में बाटअ सो | अब चुप चाप रही,हम इलाज शुरू करत बानी |

बाकी इs कुल दबवले काहे बाटअ सो,

अब्बे पता लाग जाई, रउआ शांत रहीं |

अरे माई रे माई, इअ तs जियते काट देहली,

आय रे ! भगवान् ,बचावा हमार जान ,

डॉ. बा की कसाई, अरे माई रे माई, अब तs जनवा गइल |

अरे डाक्टरवा, छोड़ हमरा के, ते बड़ा बदमाश बाड़े,

हमरा के इलाज ना करावे के बा छोड़ छोड़,

अरे टिंकूआ उठाव डॉ. बाबा के देख प्रधान बाबा ढकेल देहलन |

हम उठ गइली रे, तोहन के इनकरा छोड़ा सो मत, नाही ई दौड़े लगिहे, तs मान में ना अहिहेंन |

प्रधान जी के चिल्लाने का मंजर ऐसा की पूरा गाँव डाक्टरी के सामने जमा हो गया | सब हैरान और जानने को इच्छुक भी की प्रधान जी का भीतर में कैसा इलाज हो रहा है, वो बचेंगे या नहीं, सारा गाँव अपना काम छोड़ कर की अब प्रधान जी का क्या होगा ? इधर भीतर में-

अगलू : ऐ प्रधान बाब गोड से ढकेल के हमार नाक फोड़ देहलहs, ऐदकी तs हम तोहरा के ना छोड़ब,ऐ चिंकूआ आव तनी तs, बड़ा लात मारत बाटन | हमरा नाक से खून निकाल देहलन |

चिंकू : ठीक बा भईया देखा हमहु चाप के पकड़ लेहलीह,तुहू आपन नाक पोछ के पकड़ा जोर से | 

प्रधान : अरे छोड़ा सो से रे हमरा के बड़ा दुखात बा, नाही, हम पुलिस में जाइब, माई रे माई अब का होई, खून तs पानी लेखा बहत बा |

मटरू : बाबा देखा हमार हाथ छिला गइल बा,तू हमरा के अइसन लात मार दिहल हs की हमरो खून बहत बा, हम नइखी रोअत तुहो चुप रहा , हल्ला जिन करा | 

सूर्या : आय रे माई, एतना जोर से दबा देहलंअ की हमार हाथ टूट गईल,ऐ टिंकूआ तनी पकड़, ना पकडाए तs रसरी से बाँध इनकर हाथ | 

सूर्या : डॉ . बाबा हमार हाथ दुखात बा , बुझात बा टूट गईल | 

डॉ. : ऐ बचवा सबर करा, जा ओने बईठ जा, अब्बे दवाई पट्टी करत बानी तोहार | 

धीरे धीरे परधान जी के चिल्लाने की आवाज कम होती है | घाव को सी कर, कबूतर का लेप छोपते ही प्रधान जी की जान में जान आती है | बाकी का लेप तसली सहित धीरे- धीरे घाव पर छोपने के लिए देकर, डॉ साहब प्रधान जी को चार बच्चों के साथ घर भेजते हैं || 

हफ्ते भर बाद ठीक होकर प्रधान जी आते हैं डॉ. साहब को धन्यावाद देते हैं और तकलीफ में बोले गये अपशब्दों की माफ़ी मांगते हैं | बच्चों को लगी चोट पर अफ़सोस करते हुए,उन्हें 20-20 रुपया पुरस्कार भी देते हैं | डॉ. साहब के घर में भी इस सफलता के बाद ख़ुशी का माहौल छा जाता है।
Labels:
Reactions:

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget