रेडियो की भाषा में उच्चारण का बहुत ही अधिक महत्व होता है।

रेडियो की भाषा में उच्चारण का बहुत ही अधिक महत्व होता है।


वाराणसी।। भाषा के संस्कार का सृजन अध्ययन से ही संभव है। रेडियो की भाषा में उच्चारण का बहुत ही अधिक महत्व होता है। दुःख की बात है कि बनारस में हिंदी खड़ी भाषा का सृजन हुआ परंतु उसके उच्चारण को लेकर आग्रह परिलक्षित नहीं होता है। उक्त बातें पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ द्वारा आयोजित 'मीडिया की भाषा' विषयक सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के चौथे दिन प्रथम सत्र में आकाशवाणी वाराणसी के वरिष्ठ उद्घोषक अरुण कुमार पाण्डेय नें कहीं। आगे उन्होंनें कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भाषा की शुद्धता के लिए बोलने और सुनने की शुद्धता भी होनी चाहिए। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ० सुनील कुमार ने कहा कि मीडिया की भाषा तभी सुधरेगी जब मन का विचार सुधरेगा। मीडिया के क्षेत्र में निजीकरण के कारण भाषा का स्वरुप विकृत हो रहा है। प्रथम सत्र का संचालन डॉ० प्रभाशंकर मिश्र व धन्यवाद दिग्विजय त्रिपाठी जी ने किया।

द्वितीय सत्र में वरिष्ठ पत्रकार एवं जनसंदेश टाइम्स के सम्पादक विजय विनीत ने भाषा व व्याकरण पर चर्चा करते हुए कहा कि अब पत्रकारिता में लिखने की नहीं दिखाने की परम्परा चलन में है। तत्सम-तद्भव, प्रत्यय के सही प्रयोग के बारे में प्रतिभागियों को प्रशिक्षित करते हुए कहा कि जिन शब्दों का इस्तेमाल करें पहले उसका भाव भी समझें। आईनेक्स्ट वाराणसी के संपादक रवीन्द्र पाठक ने कहा कि मीडिया का क्षेत्र मल्टीटास्किंग का क्षेत्र है। हमें भविष्य को देखकर खुद को अपग्रेड करना होगा। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के डॉ० संदीप वर्मा ने मीडिया की भाषा के संदर्भ में प्रतिभागियों से रूबरू होते हुए कहा कि विभिन्न मीडिया के लिए भाषाएं भी भिन्न-भिन्न होती हैं। मीडिया को सेट टाइप न हो कर फ्री टाइप होना चाहिए। आगे सोशल मीडिया की भाषा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सोशल साइट्स पर हमें संयमित भाषा का उपयोग करना चाहिए। वैश्वीकरण के कारण शाब्दिक भाषा ही नहीं विजुअल भाषाएं भी प्रभावित हुई हैं। मीडिया की भाषा को विकसित करने के लिए हमें एक आधार बनाया जाए जिसके लिए हमें रचना दृष्टि विकसित करनी होगी। डॉ० प्रभाशंकर मिश्र ने कहा कि पत्रकार बनने की अपनी एक प्रक्रिया होती है और इस प्रक्रिया के अहम तत्व होते हैं जिज्ञासा, धैर्य, सुनने की क्षमता। हमें पहले अपने विचारों को पकाने की आवश्यकता होती है तब वह परिपक्व विचार हमें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार बनाती है। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ० धीरज शुक्ला ने मीडिया स्टूडेंट्स को निरंंतर सीखते रहने की क्षमता का विकास करने की सलाह दी। द्वितीय सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डाक्टर रुद्रानंद तिवारी एवम संदीप पटेल ने किया। 
कार्यक्रम में वरिष्ठ अध्यापक डाक्टर अरुण कुमार डॉटर विनोद सिंह, डाक्टर मनोहर लाल, डाक्टर नंद बहादुर, डाक्टर रमेश सिंह, डाक्टर राजेश, डाक्टर प्रदीप आदि लोग उपस्थित रहें।
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