भगवा पहनने से कोई सन्त नहीं हो सकता

भगवा पहनने से कोई सन्त नहीं हो सकता

धानापुर-चन्दौली।। क्षेत्र के खड़ान स्थित सिद्धिपीठ महोत्सव के तीसरे दिन गुरुवार को सत्संग के दौरान स्वामी मुनीसानंद जी ने संत की परिभाषा बताई महाराज श्री ने बताया की त्रिपुन्ड और टीका लगाने लेने से भगवा पहनने से या रूप भेष बना लेने से कोई संत नहीँ होता बल्कि संत वो है जिसके चरित्र में छेद ना हो बुद्धी मेँ भेद न हो और मन मेँ खेद न हो असली और सच्चा संत वही है बेशक वह पैंट शर्ट ही क्योँ न पहनता है मन ही मनुष्य के मोक्ष और बँधन का कारक है ईश्वर अंश जीव अविनाशी हरी कथा के बिना जीवन अधूरा होता है ईश्वर को पाने की कोई उम्र नहीँ होती भक्ति करने का कोई समय नही होता आप किसी उम्र मेँ किसी समय भक्ति कर सकते हैं ईश्वर को पा सकते हैं यह कोई जरूरी नहीँ की कोई ज्यादा उम्र का हो जाय तभी ईश्वर को पा सकता है या भक्ति करेगा गलत संगत मे जाने मे देर नही लगती लेकिन सत्संग पाने मे सत्संग मे जाने मे बड़े व्यवधान आते हैं जिस प्रकार शूकर गाँव के भीतर बहुत से अच्छी चीजों को छोड़कर गंदी चीजों को ही बच्छण करता है ठीक उसी तरह दुष्ट जन बुरी चीजों के ही निकट रहते हैं।
इस दौरान कथा में जे पी सिंह ओदरा, नंद खरवार, रणविजय सिँह, बद्री सिँह, शमशेर सिँह, परमात्मा सिँह, गोपाल सिँह, नेहा, गौरी, भोला, महेश, श्रेया सिँह, कलावती, हृदय सिंह, रूपू भोलू सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।
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