कलश यात्रा से शुरू हुआ चार दिवसीय सिद्धपीठ निर्वाण महोत्सव

कलश यात्रा से शुरू हुआ चार दिवसीय सिद्धपीठ निर्वाण महोत्सव


  • अंजनी सिंह के नेतृत्व में 101 कन्याओं ने पीला वस्र धारण कर किया बाबा का जलाभिषेक। 
  • चार दिवसीय महोत्सव में बहती है आध्यात्म की रसधारा। 
नसीरुल होदा खान 'राजा
धानापुर-चन्दौली।। धानापुर क्षेत्र के खड़ान स्थित सिद्धपीठ तपोभूमि पर श्री श्री 1008 परमहंस बाबा प्रसन्नदास महाराज का चार दिवसीय सिद्धपीठ निर्वाण महोत्सव का शुभारंभ मंगलवार को कलश यात्रा के साथ हुआ। सुबह से ही खड़ान स्थित बाबा की कुटिया पर भक्तों का रेला लगना शुरू हो गया। पीला वस्त्र धारण कर 101 कन्यायें हाथ में कलश लेकर सिद्धपीठ समिति के संस्थापक अंजनी सिंह सहित क्षेत्रीय लोगों के संग कांधारपुर, सिहावल और धानापुर होते हुए नरौली गंगा घाट पर पहुंच कर जलभरी किया, उसके बाद सिद्धपीठ पहुंच कर बाबा का जलाभिषेक किया। कलश यात्रा के दौरान पूरा वातावरण बाबा प्रसन्नदास की जय, जय श्रीराम सहित दूसरे नारों से गुंजायमान रहा। भक्ति की रसधारा में गोते लगते भक्त बाबा के चमत्कार का बखान करते रहे। इस दौरान अंजनी सिंह, बचाऊ सिंह, अश्वनी सिंह, विश्वनाथ, राजा जी, कुलदीप, संदीप, अजीत, शशि, शिवाजी, स्वीन दानी, नीरहू, रामप्रवेश बिंद, राजेश, रूपेश, गीता, उर्मिला सिंह, रानी, अनीता, गुड़िया, श्रुती, संध्या, नेहा, नीतू, प्रिया, श्रेया, संजीता, आरती, रीता, संगीता सहित सैकड़ों की संख्या में भक्त मौजूद रहे।

परमहंस बाबा प्रसन्नदास

सिद्धपीठ समिति के संस्थापक अंजनी सिंह कहते हैं कि बाबा प्रसन्नदास का जन्म लगभग 290 वर्ष पूर्व धानापुर विकास खण्ड के अमादपुर गांव में एक गोड़ परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मन्नू राम गोड़ और माता का नाम बहुधा देवी था। बाबा प्रसन्नदास जी बालब्रह्मचारी थे। महज 11 वर्ष की आयु में ही इन्होंने घर छोड़ कर खड़ान स्थित घने वन में रहने लगे। बाबा काफी दिन वन में ब्रह्मलीन रहे, इसका किसी को पता नहीं था। एक दिन कुछ चरवाहे जानवर को लेकर वन में गये तो उन्हें 11 साल का बालक तपस्या में लीन मिला। इसकी सूचना जब ग्रामीणों को मिली तो बालक प्रसन्नदास को देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। लोगों ने ब्रम्हलीन बालक को सिद्धपीठ के वर्तमान स्थान पर लाकर कुटिया का निर्माण किया तब से बाबा यहीं पर रहने लगे। अंजनी सिंह बताते हैं कि वैसे तो बाबा के अनेक चमत्कारी किस्से प्रचलित हैं मगर उसमें बाबा के समाधि की घटना को सुनकर रोम रोम दहल जाता है। जनश्रुति के मुताबिक जब बाबा समाधि लिये तो उस समय उनका हाथ बाहर निकल जाता। इस घटना से लोग काफी विचलित हुए। लोगों ने बाबा से जनकल्याण के लिए आशीर्वाद मंगा और मिन्नतें किया, बाबा ने लोगों की मिन्नत पर प्रसन्न हो गये। इसका जिक्र अखण्डानन्द सरस्वती जी ने अपनी लेखनी से किया है। अंजनी बताते हैं प्रसन्नदास बाबा की महिमा ही थी कि नेपाल नरेश के भाई परमहंस महाराज को वैराग जागा उनके सपने में बाबा आये। वो सिद्धपीठ पर आकर साधना किया और सिद्धि प्राप्त किया। आज भी बाबा के भक्त कहीं भी रहते हों अगर संकट के समय बाबा को याद करते हैं तो बाबा उनके संकट को दूर करते हैं उन्हें बाबा पास ही महसूस होते हैं। 

प्रसन्नदास की मूर्ति स्थापना

अंजनी सिंह प्रसन्नदास की मूर्ति स्थापना के बारे में बताते हैं कि हम लोगों ने जब प्रसन्नदास जी की मूर्ति स्थापना के लिए मूर्ति बनवाने गए तो उन्होंने कलाकार से मूर्ति निर्माण की बात कही तो उसने कहा कि आप कुछ आकर बताये मैं विचलित हो गया और घर लौट आया। सिद्धपीठ पर आकर बाबा से फरियाद किया कि बाबा जी मैने आपको कभी देख नहीं। आज मेरे सामने धर्म संकट है क्या करूँ, आप ही मेरी रहनुमाई कीजिये। फिर मैं दूसरे दिन मूर्ति बनवाने पहुंचा, मेरे जेहन में अपने आप बाबा का रूप आने लगा और मूर्ति तैयार हो गयी। आज भी क्षेत्रीवासी बाबा में अपार श्रद्धा और विश्वास रखते हैं। लोग जिस मुराद को लेकर आते हैं बाबा उसे जरूर पूरा करते हैं।
Reactions:

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget