वैश्विक भुखमरी बनाम राष्ट्रीय!

वैश्विक भुखमरी बनाम राष्ट्रीय!


डॉ0 अशोक मिश्र 'विद्रोही'
यह कटु सत्य है कि दुनिया चाहे जितना विकास कर ले किन्तु उदर पोषण वास्ते सबको अनाज ही चाहिये, किन्तु लगता है भौतिक सुख सुविधाओं की अंतहीन आकांक्षाओं ने मनुष्य के मन मिजाज में इस बुनियादी सच को गौड़ कर दिया है? अन्यथा हमारे देश के नीति नियंता यानी शासक और प्रशासक अपनी तमाम क्षम्य अक्षम्य चोरी- चकारी, कदाचार-भ्रष्टाचार पूर्ण दिनचर्या में भी जीवन वास्ते अतिआवश्यक इस वस्तु की सर्वसुलभता हेतु बेहद ईमानदार होते. क्या ऐसा है? जबाब यही होगा, क़त्तई नही! फिर आखिर क्यों और कब तक?

हमारा संविधान अपने प्रत्येक नागरिक को अन्य जरूरतों के साथ ही साथ भोजन की गारंटी देता है, इस संबैधानिक गारन्टी का नैतिक और विधिक दायित्व हमारी सरकार का होता है, उसे हर हाल में यह सुनिश्चित करना ही पड़ेगा कि उसके प्रत्येक नागरिक की प्रतिदिन क्षुधा पूर्ति हो! किन्तु भारत की आजादी से लगायत आज तक ऐसा होना दिवास्वप्न है, यानी सरकारे अपने समस्त नागरिकों को इस मौलिक अधिकार की गारन्टी देने में पूरी तरह विफल है,क्या इस कड़वे सच को ईमानदारी से कुबूलने वास्ते सद्यत:देश का कोई भी राजनैतिक दल तैयार है?क़त्तई नही!

इस बाबत देश के अंदर मौजूद तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा कभी अवार्ड वापसी हुई? कभी असहिष्णुता महसूस हुई? क्या कभी लोकतंत्र खतरे में आया?किसी धर्म-मजहब को कभी खतरा महसूस हुआ? जाहिर है इसका भी जबाब होगा क़त्तई नही!.........तो फिर क्यो नही.......क्या इस नही को हाँ में तब्दील करवाने वास्ते भूख क्रांति कराना चाहती है हमारी सरकारें, हमारी नौकरशाही, हमारी व्यवस्थापिकायें?

सच मानिये भूखा पेट टनों परमाणु बम से ज्यादा घातक साबित होता है, मनुष्यता के लिये, प्राणी मात्र के लिये, जीवन के लिये बेहद आवश्यक अन्न, जल, हवा पर माफियाओ का पहरा बढ़ता जा रहा है और इस जानलेवा दुर्बयवस्था के पीछे शासन-प्रशासन की सहमति एवं भागीदारी से क़त्तई इनकार नही किया जा सकता है! ऐसा मेरा दावा है! सरकार भोजन गारन्टी योजना, रोजगार गारंटी योजना जैसी योजना लागू कर अपनी पीठ खुद ठोक सकती है किंतु इसका धरातल पर कार्यान्वयन (Implement) होने की बजाय यह पूरी योजना राशन माफियाओं की [दबंगो+नौकरशाहो] Impledge (बंधक) बन चुकी है क्या सरकारें इसको नही जानती है? अगर सच मे सरकार इस या इस जैसे अन्य गठजोड़ों को नही जानती तो इन निकम्मी सरकारों का वजूद में रहना ही सहिष्णु लोकतंत्र वास्ते घातक है!

हमारे देश व समाज के लिए सबसे घातक यह होता जा रहा है कि बहुसंख्यक सक्षम लोग अन्न की बजाय रुपयों के भूखे होते जा रहे है, राजनीतिक नीतियां जन सरोकारों की बजाय मात्र और मात्र वोटो (मतों) को केंद्र में रख कर तय की जा रही है,परिणामतः सम्पूर्ण सामाजिक वातावरण में झूठ, छल, फरेब और ठगी की कोलाहल पूर्ण हवा बनाने की होड़ मची है, इस होड़ में नित्य प्रति मानवता-इंसानियत का दम घुंट रहा है, कमोबेश यही हवा बवंडर की तरह विश्व के तमाम मुल्कों में अपना असरकारी प्रभाव छोड़ती दिख रही है जिसके चलते मानवता दमित व आक्लांत है!

फिलवक्त सियासत में किसानों का अनियोजित रूप से मसीहा बनने की होड़ मची है जिसमे हरेक राजनैतिक दल एक दूसरे को पछाड़कर आगे निकलने का श्रेय लेना चाहते है,विषय अच्छा है, कम से कम आजादी के सात दशक बाद राजनेताओ को किसानों की सुधि तो आयी किन्तु इतना ध्यान रखना ही होगा कि अन्नदाता के खुशहाली की कीमत देश के भूमिहीन गरीबो को भुखमरी का शिकार होकर न चुकानी पड़े, उदाहरणत: फिलवक्त देश की फ़िज़ा में एक सियासी जुमला तैर रहा है कि किसानों की आय डेढ़ गुना की जाएगी,प्रयास के तौर पर जहाँ गेंहू जैसी विकल्पहीन फसल की कीमत लगभग साढ़े सत्रह रुपये प्रति क्विंटल न्यूनतम तय कर दी गयी है तथा धान की कीमत लगभ साढ़े चौबीस रुपये प्रति क्विंटल न्यूनतम तय करने की प्रक्रिया में है यानी अब आटा लगभग तीस रुपये प्रति किलो तथा सामान्य चावल लगभग पैतालीस रुपये प्रति किलो की दर से मिलेगा!

अब यह तय करना ही होगा कि हमारे देश के कितने परिवार इन फसलों को कितनी लागत में पैदा करते है और कितने परिवार इन अनाजो को खरीदते है,अब यह तय करना बुनियादी जरूरत हो जाती है कि इनके मध्य सौहार्दपूर्ण सन्तुलन बना रहे,इस कड़ी में हमारे समाज मे भूस्वामी (बड़ी जोत वाले किसान) लघु किसान (मध्यम जोत वाले) सीमांत किसान (न्यून जोत वाले) तथा भूमिहीन, इन्ही चार श्रेणियों में देश की सम्पूर्ण आबादी विभक्त है, जिसमें जनसंख्या घनत्व के हिसाब से भूमिहीन और न्यून जोत वाले लोग ही इन अनाजों के क्रेता है और इनकी आबादी {नौकरशाहो और उद्योगपतियों को छोड़ कर} देश की कुल आबादी के बहुसंख्यक प्रतिशत में है, यही सच है और इसी सच को दिन के उजाले की तरह कबूलते हुए हमें इनकी क्रय शक्ति को बढ़ाने वास्ते निरपेक्ष और निष्पक्ष नियत से धरातल पर अमलकारी योजना ही नही लानी होगी बल्कि इसका लाभ इस तबके (सम्पूर्ण जातियों और पन्थो से जुड़े लोगों का संयुक्त घनत्व) को महसूस भी होना चाहिए, अगर इनकी क्रयशक्ति हमारे मूल्य निर्धारण यानी बाजार भाव के सापेक्ष नही हो पायी तो सामाजिक भुखमरी और अमानवीय अराजकता से क़त्तई इनकार नही किया जा सकता कारण की अब इतनी बड़ी जनसंख्या को आश्वासनों के लॉलीपॉप से जिंदा रख पाना ठीक उसी तरह असम्भव है जिस तरह अंधेरे में तीर चलाकर लक्ष्यभेदन करना।

अभी अभी संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट पर अगर इस बाबत गौर करे तो सन 2017 में विश्व में भारत सहित 51 देशों के कुल 12.4 करोड़ लोग अकाल और भुखमरी से पीड़ित हुए है जबकि 2016 की तुलना में यह आंकड़ा 1.10 करोड़ ज्यादा है,अगर यही प्रतिशत हर वर्ष रहा तो आने वाले दिनों में सम्बन्धित राष्ट्रों के लिए अपने यहां कानून ब्यवस्था बहाल रख पाना टेढ़ी खीर साबित होगा क्योंकि व्यक्ति या कोई भी जीवधारी सब कुछ से तो सब्र कर सकता है किंतु क्षुधापीर (भूख) से तो क़त्तई नही! अब हमें राष्ट्रभौम रूप से ऐसी परिणामकारी नीतियां बनानी ही पड़ेगी की देश के प्रत्येक नागरिक को रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य और शिक्षा सुलभ हो उनकी पहुंच में हो वह भी अभेद रूप से,निर्वाद रूप से अन्यथा अराजकता और असहिष्णुता पूर्ण माहौल में वोट का कोई मायने ही नहीं होगा, जिस देश में उसके नागरिको को संवैधानिक रूप से उसकी मौलिक आवश्यकताए सुलभ नहीं होती उसके लिए राष्ट्रवाद का कोई न चिंतन होता है और न ही कोई मूल्य!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं)
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