घर आंगन की चिड़िया गौरैया की हिफाजत जरूरी

घर आंगन की चिड़िया गौरैया की हिफाजत जरूरी

विश्व गौरैया दिवस पर खास
एम. अफसर खान सागर
अभी कुछ साल पहले ही अम्मी जब सुबह के वक्त सूप में चावल को पछोरती और बनाती थीं तब छोटी-छोटी चिड़िया झुण्ड में चावल के छोटे टुकड़ों जिसे गांव में खुद्दी के नाम से जाना जाता है उसे खाने के लिए नुमाया हो जाती थीं। फुदक-फुदक कर हल्के कोलाहल के साथ दालान और रोशनदान के साथ पूरे मकान में मानो उनका कब्जा सा हो जाता। वो छोटी चिड़िया थीं गौरैया। जो हमारे और आप के घरों की मेहमान हुआ करती। बच्चों के लिए उड़ने वाली सहेली और घर के लिए मिठास भरी चहक जिसके बरकत से घर-आंगन गुलजार रहता। ऐसा नहीं है कि अब गौरैया नहीं आती मगर उनकी तायदाद दिन ब दिन कम होती जा रही हैं। गौरैया आज संकटग्रस्त पक्षि की श्रेणी में आ गयी है, जो कि पूरे विश्व में तेजी से दुर्लभ होती जा रही है। चन्द साल पहले तक गौरेया के झुंड को आसानी से घरों, गांव, खेत-खलिहान सहित सार्वजनिक स्थलों पर देखे जा सकते थे। लेकिन खुद को परिस्थितियों में ढ़ाल लेने वाली यह चिड़िया अब भारत ही नहीं बल्कि यूरोप के कई बड़े हिस्सों में भी काफी कम रह गयी है। इटली, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और चेक गणराज्य जैसे मुल्कों में इनकी संख्या जहां तेजी से गिर रही है तो वहीं नीदरलैंड में तो इन्हें ‘दुर्लभ प्रजाति’ के वर्ग में रखा गया है। इनकी संख्या में निरंतर आ रही कमी को देखते हुए इनके संरक्षण के लिए विश्व गौरैया दिवस पहली बार सन् 2010 में मनाया गया। तब से यह दिवस प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को पूरी दुनिया में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। 

अमूमन हर साल गर्मी की आमद के साथ ही ये नन्ही चिड़ियां अपने लिए घरौंदे बनाना शुरू कर देती हैं। वक्त के साथ विकास के पैमानों में आये बदलाव ने मानव सभ्यता की गोद में पलने वाली इस नन्ही चिड़ियों से इनके आशियाना को छीन लिया है। पहले कच्चे और घास-फूस के मकानों में गौरैया बड़ी आसानी से अपने घोसलें बना लेतीं मगर आधुनिक कांक्रीट के मकानों में इनको घोसलें बनाने की जगह नही मिल पा रही हैं। शहरीकरण ने गावों की दहलीज को अपने गिरफ्त में ले लिया है जिस वजह से दिन ब दिन गांवों की हरियाली और खुली फिजां संकुचित होती जा रही है, यही वजह है कि इनके प्राकृतिक निवास और भोजन के श्रोत भी खत्म होते जा रहे हैं। बाज, चील, कौवे और परभक्षी बिल्लियां आदि भी गौरैया का काफी नुक्सान पहुंचा रहे हैं। बची खुची कसर पंक्षियों के शिकारी पूरा कर दे रहे हैं। कनेर, बबूल, नीबू, चंदन, बांस, मेंहदी, अमरूद के वृक्षों पर ये अपना घोंसला बनाती हैं। छोटे पेड़ व झाड़ियों को काटे जाने से भी इनके प्रजनन पर संकट मण्डराया है। इसके अलावा मोबाइल के टावर भी इनके वजूद को मिटाने में मदद्गार सबित हो रहे हैं। मोबाइल टावरों से निकलने वाली इलेक्ट्रो मैगनेटिक किरणें गौरैया की प्रजनन क्षमता को कम करती हैं। जिस वजह से दिन ब दिन गौरैया विलुप्त होती जा रही है। इनका कम होना हमारे पर्यावरण के लिए खराब संकेत है। गौरैया सिर्फ एक चिड़िया नही बल्कि हमारी मानव सभ्यता का एक अंग है और हमारे गाँव व शहरों में स्वस्थ वातावरण की सूचक भी है। गौरैया किसानों के लिए काफी मदद्गार मानी जाती है, ये अपने बच्चों को जो अल्फा एवं कटवर्म खिलाती हैं, वो फसलों को बहुत नुक्सान पहुंचाते हैं। 

गौरेया पासेराडेई परिवार की सदस्य हैं। इनकी लम्बाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। ये अधिकतर झुंड में ही रहती हैं तथा भोजन तलाशने के लिए गौरेया का झुंड अधिकतर दो मील की दूरी तय करते हैं। आवश्यकता है कि हम इस नन्ही चिड़िया को घर बनाने के लिए थोड़ी सी जगह दे और इन्हें माकूल सुरक्षा दें तथा यह अपने बच्चों को आसानी से पाल सके इसलिए विषहीन हरियाली उपलब्ध कराने का प्रयास करें। घरों में नेस्ट बाक्स लगायें। गर्मी के दिनों में घरों, आफिस और सर्वाजनिक स्थलों पर बर्तन में पानी व दाना रखने का प्रबंध करें। हमें इन नन्हीं चिड़ियों के लिए वातावरण को इनके अनुकूल बनाने में मदद करनी होगी। ताकि इनकी मासूम चहक हमारे आस पास बरकरार रह सके। आजकल खेतों से लेकर घर के गमलों के पेड़-पौधों में भी रासायनिक पदार्थों का उपयोग हो रहा है जिससे ना तो पौधों को कीड़े लगते है और ना ही इस पक्षी को समुचित भोजन मिल पा रहा है। इसलिए गौरैया समेत दुनिया भर के बहुत से पक्षी हमसे रूठ चुके हैं और शायद वो लगभग विलुप्त हो चुके हैं या फिर किसी कोने में अपनी अन्तिम सांसे गिन रहे होंगे। बदलाव की धारा को हम एकाएक नही रोक सकते हैं मगर इस बदलाव की रफ्तार में भी हम उन्हें भी अपने साथ लेकर जरूर चलने की कोशिश कर सकते हैं जो सदियों से हमारे साथ हैं और मानव सभ्यता उनसे फायदा पाती आयी है। 

मानव जब भी अपनी राह से भटका है तब प्रकृति ने उसे किसी न किसी रूप में सन्देश देने का काम किया है मगर वह अपनी बेजा ख्वाहिशों की कोलाहल में उसे नजरअंदाज करता आया है। कुदरत के संदेश को नजरअंदाज करने का भयंकर परिणाम भी उसे झेलना पड़ा है। अकाल, भू-स्खलन बेमौसम बारिश, महामारी इसके उदाहरण हैं। संकटग्रस्त गौरैया को बचाना वक्त की पुकार और दरकार है। बच्चों की उड़ने वाली सहेली, घर-आंगन की चहक और फुदक की हिफाजत के लिए हमें गौरैया के संरक्षण की खातिर हर जतन करने की जरूरत है।

(लेखक उर्जांचल टाईगर, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका व न्यूज़ पोर्टल के समाचार सम्पादक हैं)
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