सरकार! मरने के कगार पर है सीडीटीपी कर्मकार

सरकार! मरने के कगार पर है सीडीटीपी कर्मकार


हेमेन्द्र क्षीरसागर
सरकार! मरने के कगार पर है सीडीटीपी कर्मकार। शीर्षक लिखने का मकसद कोहराम मचाना नहीं है वरन एक जीती जागती हकीकत उजागर करना है। यकीन नहीं है तो भारत सरकार के मंत्रालयों, मानव संसाधन विकास के द्वारा पूर्व और वर्तमान में कौशल विकास व उद्यमिता के मार्फत देश की 520 शासकीय पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में संचालित कम्युनिटी डेवलपमेंट थ्रू पॉलिटेक्निक अर्थात सीडीटीपी योजना में बरसों सें कार्यरत कर्मकारों के हालात देख लिजिए सच्चाई खुदबखुद सामने आ जाएगी। आप भौचकें रह जाएगें, जब देखेंगे कि इस दौर में जहां एक संवर्ग सातवां वेतनमान पा चुका हैं, वहां यह वर्ग रोटी-रोटी को मोहताज हैं। 

हां! यही असलियत और किवदंति! हैं, कि सीडीटीपी के कामगारों को हर माह तो छोडिए जनाब! अनुदान के अभाव में एक साल क्यां पूरे के पूरे 2 से 3 साल तक काम का दाम नहीं मिलता। यद्यपि! हूं से चूं कर दें मेहनतकशों की मजाल है क्योंकि ज्यादा तीन पांच किए तो सीधा बाहर का रास्ता दिखाया ही नही बल्कि कर दिया जाता है। बेबष, मरता क्यां नहीं करता की विभीषिका में उम्मीद लगाये बैठै है कि आज नही तो कल पूरा मेहनताना मिलेंगा। जो है की बमुश्किल से केन्द्र सरकार की तिजोरी से बाहर निकल कर इस ऑफिस से उस ऑफिस का चक्कर लगाकर प्रदेश के तकनीकी शिक्षा विभाग के बेलगाम रोडे से रफूचक्कर हो जाता है। बरबस, उम्र के इस पडाव में आखिर! यह कर्मकार करें तो क्यां करें, काम करना छोंड दें! या सरकार की नींद उडा दें! अब गेंद सरकारों के पाले में हैं कि हुनरबाजों को जिदंगी दे या मौत? 

विडंबना कहें या दुर्भाग्य जो श्रमवीर अपनी कर्मशक्ति से दूसरों को पैरों पर खडा करता वह आज पंगु बना हुआ हैं। बदतर दयानहारिता और मंहगाई की चरमशिलता में यह शुरूवात से कंसलटेंट 10000, जूनियर कंसलटेंट, जूनियर स्टेटिक्ल कंसलटेंट, प्रषिक्षक और वाहन चालक 6000 रूपए प्रतिमाह पारिश्रमिक में ही सहपरिवार नरकीय जीवन भोगने को मजबूर है। भेडचाल, संकट कालिन एक अदद् छुट्टी तक मुनासिब नहीं होती। अभिलाषा में सर्वोच्च न्यायालय का फरमान एक काम, एक दाम कर्मकारों के लिए दूर की कौडी नजर आती है। विस्मय! जहां अरबों-खरबों के व्यारे-न्यारे होने में देर नहीं लगती वहां ठन-ठन गोपाल परिश्रमी के खातिर तर्क-कुतर्क की बहार आ जाती है। 

बहरहाल, प्रधानमंत्री जी का सबसे चहते अभियान कौशल विकास की एक बहुत ही महत्वकांक्षी कम्युनिटी डेवलपमेंट थ्रू पाॅलीटेक्निक योजना में लक्ष्यभेदी अकुशल कारीगर और बीच में पढाई छोड चुके लोग रोजगार मूलक व्यवसायो में तकनीकी निःशुल्क कौशल विकास प्रषिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। फलीभूत, रोजगारोन्मुखी की दिषा में कई कदम एक साथ खडे होकर देष की श्रमशक्ति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। अलावे सर्वेक्षण, तकनीकी हस्तांतरण व सेवाएं, परामर्श और उत्प्रेरक अवयव कर्मवीरों के सहारे ही धरातलीय बने हुए है। बावजूद यह हश्र नासमझ है कि समर्पित शिल्पकार मरने के कगार पर है। अलबत्ता, विपदा को टालने जवाबदारों और जिम्मेदारों को वफादार बनना ही होंगा। 

बकौल, यह कल्याणकारी योजना, नौकरशाही, लालफिताशाही और राजशाही की नाफरमानी बनकर रूदाली बनते जा रही हैं। वर्ष 2009 में कम्युनिटी सेंटर के नाम से परिवर्तित सीडीटीपी पंचवर्षीय परियोजना दस साल बाद भी संशोधित नहीं हुई? बेहतरतीब योजना की बदहाली योजना को नेस्तनाबूत कर रही हैं। तथापि हमारे हुकमरान् व अफसरान कुम्भकरणीय नींद से नहीं जागे। उठे! भी तो योजना संशोधन कमेटियों की रिपोर्ट को अमलीजामा देने में गुरेज करते हुए। लिहाजा असीमित अनुदान राशि, कमतर उपलब्धता तथा प्राप्ति की बेहिसाब विलम्बता जी का जंजाल बनी हुई हैं। मिल भी जाये तो कोशालयों के नियमों की बेरूखी से वापस राज्य सरकारों के खजाने की शोभा बन जाती हैं। 

वस्तुतः वाकई में सरकारें खासतौर पर केन्द्र सरकार अपनी सीडीटीपी जैसी अभिनवकारी योजना की माली हालत सुधारना चाहती है तो कोताही बिना योजना को संशोधित, स्थाई बनाकर, पॉलिटेक्निक कॉलेज को पर्याप्त अनुदान राशि साल में चार मर्तबा कोशालयों से नहीं बल्कि सीधे संस्था के बैंक खाते में दिलवाना। जरूरते अनुसार भवन, वाहन और संसाधन की व्यवस्था निरंतर कायम रखना। विशेषकर योजना के कर्मियों को सम्यक वेतन मान, नियमतिकरण और शासकीय अमले की भांति मौजूद मोहलते व सोहलते आदि मुकमल करवाना। लगे हाथ समग्र कौशल उन्नयन को कानून का दर्जा मिले। तब कहीं संतृप्त कर्मकार गर्व से कहेंगे, सरकार! हम मरने के कगार पर नहीं अपितु हुनर को शिखर पर ले जाने है तैयार। कौशलम वलम!

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