विश्व कोलाइटिस दिवस पर विशेषज्ञो ने लोगो को किया जागरुक।

विश्व कोलाइटिस दिवस पर विशेषज्ञो ने लोगो को किया जागरुक।

वाराणसी।। विश्व कोलाइटिस दिवस पर आज सरसुन्दरलाल चिकित्सालय के गेस्ट्रोइण्ट्रोलॉजी विभाग के बहिरंग (अेपीडी) में 30 मरीजो का परीक्षण हुआ जिसमे 10 मरीजो में कोलाइटिस होने की संभावना जतार्इ गयी। उक्त जानकारी सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी डा० राजेश सिंह ने उर्जान्चल टाईगर के प्रतिनिधि बताया कि चिकित्सा विज्ञान संस्थान गेस्ट्रोइण्ट्रोलाजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो0 एस0के0 शुक्ला ने बताया कि इरीटेबल बबल सिण्ड्रोम (आर्इबीएस) का पता ऑत के मूवमेन्ट से चलता है। उन्होने बताया कि चिकित्सको को कोलाइटिस रोग का उपचार प्रमाणिक विधि से करना चाहिए। हमारे विभाग में अधिकतर जॉच हो जाती है। उन्होने कहा कि निकट भविष्य में हेपेटोलॉजी युनिट स्थापित किए जाने की दिशा में प्रयाय किये जा रहे है। जिसके चलते आने वाले समय में लीवर ट्रॉसप्लान्ट करने में सहुलियत मिलेगी। उन्होने बताया कि कोलाइटिस का लक्षण है बार-बार टÍी होना, टÍी में खून आना, पेट दर्द करना, वजन कम होना, कमजोरी तथा खून की कमी होना। उन्होने बताया कि लम्बे समय से होने वाली तथा बार-बार होने वाली कोलाइटिस को इम्फ्लामेटरी ब्लड डिजीज (Inflammatory Blood Disease) या IBD कहते है। आर्इबीडी दो प्रकार के होते है। 
1. कोहनीस डिजीज 

2. अल्सरेटिव कोलाइटिस

उन्होने बताया कि 19 मर्इ को विश्व भर में इस बीमारी के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए ‘‘वल्र्ड आर्इबीडी डे’’ मनाया जाता है। हर एक लाख जनसंख्या में 5 से 10 लोग इस बीमारी से पीड़ित हो सकते है। लम्बे समय तक शरीर में बने रहने और सही इलाज न होने पाने की स्थिति में यह बीमारी गम्भीर रुप धारण कर सकती है। आंतो मे रुकावट या फॅसना, अधिक खून रिसाव, बड़ी ऑतो का कैंसर तथा अधिक कमजोरी या एनीमिया से मरीज का जीवन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। इस बीमारी का इलाज इण्डोस्कोपी और बायाप्सी द्वारा ही किया जा सकता है। इस बिमारी का इलाज खर्चीला तथा लम्बे समय (अधिकतर जीवन पर्यन्त) चलने वाला होता है। 
आर्इबीडी अधिकतर अनुवॉशिक कारणो से होता है, जिससे आंतो की सुरक्षा तन्त्र कमजोर पड़ जाती है। पश्चिमी देशो में बचपन में ज्यादा सफार्इ का ध्यान न रखने से भी यह बीमारी हो सकती है। भारत में भी खान-पान में साफ सफार्इ का ज्यादा ध्यान न रखने से इस रोग की बारम्बरता बढ़ी है। पाश्चात्य भोजन शैली एवं जंक फूड से इस बीमारी के लक्षणो में इजाफा हो सकता है, परन्तु इन कारणो से यह बीमारी नही होती है।
आर्इबीडी डिसेन्ट्री या डायरिया या ब्लीडिंग की खास दवाइयॉ जैसे मेसालामीन या वार्इसोलोन होती है। आजकल एक इंजेक्शन द्वारा इसका इलाल हो सकता है जो अभी मॅहंगा है। इस जागरुकता कार्यक्रम में वरिष्ठ उदर रोग विशेषज्ञ प्रो0 वी0के0 दीक्षित तथा डॉ0 देवेश कुमार यादव आदि मौजूद थे।
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