दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते आज़ाद भारत के बेरोजगार युवा

दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते आज़ाद भारत के बेरोजगार युवा

मुहम्मद शहाबुद्दीन खान 
आजादी के बाद से ही हमारे देश को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा रहा है। इनमें से कुछ समस्याओं का तो समाधान कर लिया गया है किंतु कुछ समस्याएँ निरंतर विकट रूप लेती जा रही हैं। बेरोजगारी की समस्या भी एक ऐसी ही समस्या है। हमारे यहाँ लगभग 50 लाख व्यक्ति प्रति वर्ष बेरोजगारी की पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। हमें शीघ्र ही ऐसे उपाय करने होंगे जिससे इस समस्या की तीव्र गति को रोका जा सके।

अगर हम बहुत ही सरल शब्दो में समझना चाहे, तो बेरोजगारी का सीधा सीधा संबंध काम या रोजगार के अभाव से है। या कहा जा सकता है कि जब किसी देश की जनसंख्या का अनुपात वहा उपस्थित रोजगार के अवसरों से कम हो, तो उस जगह बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। बढ़ती बेरोजगारी के कई कारण हो सकते है जैसे बढ़ती जनसंख्या, शिक्षा का आभाव आदि। भारत में बेरोजगारी की समस्या बेरोजगारी / बेकारी से तात्पर्य उन लोगो से है, जिन्हे काम नहीं मिलता ना कि उन लोगो से जो काम करना नहीं चाहते। यहा रोजगार से तात्पर्य प्रचलित मजदूरी की दर पर काम करने के लिए तैयार लोगो से है। यदि किसी समय किसी काम की अमूमन मजदूरी 310 रूपय रोज है और कुछ समय पश्चात इसकी मजदूरी घटकर 300 रूपय हो जाती है और कोई व्यक्ति इस कीमत पर काम करने के लिए तैयार नहीं है, तो वह व्यक्ति बेरोजगार की श्रेणी मे नहीं आएगा। इसके अतिरिक्त बच्चे, बुढ़े, अपंग, वृध्द या साधू संत भी बेरोजगारी की श्रेणी मे नहीं आते। यदि जनसंख्या वृध्दी और शिक्षा की कमी मे गहरा संबंध है जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, उनके हिसाब से न तो शिक्षा के साधनो की वृध्दी हुई ना ही परिवार मे हर बच्चे को ठीक से शिक्षा का अधिकार मिल पाया ना व्यवस्था। आज भी भारत मे अधिक्तर जनसंख्या अशिक्षित है। परिवार मे ज्यादा बच्चो के चलते हर किसी को शिक्षा देने मे माता पिता असमर्थ पाये गए, जिसके परिणाम यह हुये, कि या तो परिवार मे बेटियो से शिक्षा का अधिकार छीना जाने लगा या पैसो की कमी के चलते परिवार के बड़े बच्चो को अपनी पढ़ाई छोड़कर मजदूरी मे लगना पढ़ा। जिसके परिणाम उन्हे आगे जाकर बेरोजगारी के रूप मे भुगतने पड़े। जिस हिसाब से जनसंख्या मे वृध्दी हुई उस हिसाब से उद्योग और और उत्पादन मे वृध्दी नहीं हुई। यह भी बढ़ती बेरोजगारी का एक कारण है। तेजी से ओध्योगीकरण भी बढ़ती बेरोजगारी का एक कारण है। पहले भारत मे हस्तकला का काम किया जाता था, जो विश्वप्रसिध्द था, बड़े उधोगों ने कुटीर उद्योग को काफी नुकसान पहुंचाया है और इसके कलाकार भी बेरोजगार हो गए। शिक्षा और बेरोजगारी का भी गहरा संबंध है, हमने पहले ही कहा आज भी भारत की जनसंख्या काफी बड़े अनुपात मे अशिक्षित है। आशिक्षा के चलते बेरोजगारी का आना तो स्वभाविक बात है। परंतु आज कल अशिक्षा के साथ-साथ एक बहुत बड़ी समस्या है, हर छात्र के द्वारा एक ही तरह की शिक्षा को चुना जाना। जैसे आज कल हम कई सारे इंजीनीयर्स को बेरोजगार भटकते देखते है, इसका कारण इनकी संख्या की अधिकता है। आज कल हर छात्र दूसरे को फॉलो करना चाहता है, उसकी अपनी स्वयं की कोई सोच नहीं बची वो बस दूसरों को देखकर अपने क्षेत्र का चयन करने लगा है। जिसके परिणाम यह सामने आए है कि उस क्षेत्र मे रोजगार की कमी और उस क्षेत्र के छात्र बेरोजगार रहने लगे। आज कल न्यूज़ पेपर मे यह न्यूज़ मे आम बात है कि छोटी-छोटी नौकरी के लिए भी अच्छे पढे लिखे लोग आवेदन करते है, इसका कारण उनकी बेरोजगारी के चलते उनकी मजबूरी है। जिसमें ख़ास तौर से सरकारी नौकरीयों में बेरोजगारों की कुछ ज्यदा ही मारा-मारी है। आप जिस सिटी में रहते हो वहां आपने अक्सर देखा होगा; ख़ास तौर से रविवार के दिन बेरोजगारों का वह जत्था जो लाखों की टोली में पेपर देने के लिए शहर आता है। एक बच्चा सरकारी नौकरी को पाने के लिए न जाने कितने शहरों का चक्कर लगाता है साथ ही तरह-तरह की यातनाएं उठाता है। ट्रेन हो या गली-चौराहा हर जगह आपको बेरोजगारों की टोली आपको दिखेगी। इसकी भी एक मुख्य ख़ास वज़ह है, कोई भी बच्चे का कोई एक लक्ष्य नहीं, हमे क्या बनना है, क्या करना है, क्या नहीं करना, किस फ़ॉर्म के लिए मैं उपयुक्त हूँ किसके लिये नही। वो कहावत सच्च निकली दो नाव पर पांव रखने से नाव डूब जाती है। अतः जिस किसी भी सरकारी विभाग में हज़ार पोस्टों के लिए भर्तियां निकली है वहां लाखों में फ़ॉर्म पड़े हैं। वो भी हाई स्कूल से लेकर बीए, एमए, बीटेक इत्यदि के बच्चों ने फ़ॉर्म भरी है। तथा, कुछ तो केवल भीड़ लगाने के लिए भी फ़ॉर्म भरते है। जिसने उस फ़ॉर्म का नोटिसफिकेशन तक नहीं पढ़ा और वो पेपर देने के लिये आया है। एक सीट पर सैकड़ों बच्चों की फाइट है, वहां सरकार की अलग-अलग रवैया भी शामिल है। ख़ास तौर से प्रदेशों में! जो सरकारे नई आती है वो पिछली सरकार में कराई गई सारी भर्तियां अक्सर रद कर देता है। तथा, फ़ॉर्म की फ़ीस भी दोगुनी होना तय है। ये सारी चीजें मेरे ही देश में देखने को मिलता है जो विदेशों में नहीं क्योंकि वहां की सभी क़ायदे-क़ानून हमसे अलग है। उनकी सोच भी हम सभी से कुछ हट कर है वो अपनी रुची के हिसाब से जिस स्ट्रीम से पढ़ाई करता है वो उसी में अपना कैरीयर बनाता है। जो हमारे देश में ऐसा बिल्कुल नहीं है। अततः मैं भी उन्हीं बेरोजगारों में से हूँ जो मैंने अपने जीवन में ख़ुद बेरोजगारी को करीब से ब्यतीत किया है। बेरोजगारों की जनसंख्या अल्पसंख्यकों में कुछ ज्यदा ही है जिसमे अशिक्षीत मुसलमान पहले नम्बर पर है। तथा, इनकी तादाद ग्रामीण इलाकों में आपको देखने को मीलती है। कुछ हद तक तो बेरोजगारी का सबब माइनॉरीटी बिशेष भी है क्योंकि सरकारी विभागों में एक जनरल क्लास का ग़रीब बच्चा (75/100) नंबर लाता है वहीं पिछड़ी जाति का एक अमीर बच्चा (45/100) नंबर ला सेलेक्टेड लीस्ट में शामिल हो जाता है। लेकिन ग़रीब परिवार का बच्चा यहाँ माइनॉरिटी का शिकार बन जाता है। कुछ लोग अपनी ज़िंदगी को लेकर कहावत भी मानते है;- किशमत, पैसा और मौक़ा जो ज़िन्दगी बनाने के लिए अहम रोल है। वहीं कुछ कहावते भी कहते है, स्त्री का चरीत्र और पुरूष की तक़दीर कभी भी बदल सकती है। परंतु, मेरा मानना है, बिना कर्म का फ़ल नही मिलता। हमारे देश की सरकार को इन बेरोजगार युवाको पर ग़ौरो फ़िक्र करनी होगी और बेरजोगरी की समस्या का समाधान के लिए पढाई की गुडवत्ता को सही करना होगा साथ ही देश में ज़्यदा से ज्यदा ओधोगिकरण को स्थापित करनी होगी। तब जाकर हमारे सरकार द्वारा ली गई संकल्प "सब पढ़े और सब बढ़े" का सपना सकार होगा।
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