आज विश्व लुपस दिवस मनाया गया बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी।

आज विश्व लुपस दिवस मनाया गया बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी।

वाराणसी।। आज विश्व लुपस दिवस मनाया गया बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अनूप सिंह कई वर्षों से रूर्मेटोलॉजि विभाग को चला रहे है विश्व लुपस दिवस पर चिकित्सा विभाग IMS BHU के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अनूप सिंह।

10 मई को “विश्व लुपस (lupus) दिवस” के रूप में मनाया जाता है| आज के दिन विश्व भर में पूरे विश्व में इस बीमारी के साथ काम करने वाले संगठन, चिकित्सक और जनता के लिए शिक्षा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और lupus को एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में मान्यता देने के लिए प्रयास करते है.

(SYSTEMIC LUPUS ERYTHEMATOSUS) सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोस (SLE), जिसे ल्यूपस के रूप में भी जाना जाता है, एक स्वत: प्रतिरक्षी (auto-immune) बीमारी है जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर के अपने ऊतकों और अंगों, जोड़ों, गुर्दे, हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क, रक्त या त्वचा पर हमला करने का कारण बनती है। यह एक rheumatology बीमारी है| देश के इस हिस्से में प्रशिक्षित रेमॅटोलॉजिस्ट की कमी है। चिकित्सा विभाग IMS, BHU के रुमेटोलॉजी डिवीजन में इन रोगियों की देख भाल और उपचार होता है| बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अनूप सिंह कई वर्षों से रूर्मेटोलॉजि विभाग को चला रहे है विश्व लुपस दिवस पर चिकित्सा विभाग IMS, BHU के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ। अनूप सिंह ने कहा कि एसएलई (SLE) की डायग्नोसिस चिकित्सक के अनुभव पर निर्भर करती हैं एवं प्रारंभिक क्लिनिकल suspicion, एवं शीघ्र डायग्नोसिस और उपचार से SLE के जटिलता को रोका जा सकता है। इसके लक्षण लक्षण मामूली से ले कर गंभीर हो सकते हैं लक्षण में जोड़ों का दर्द एवं सूजन, बुखार, बालों के झड़ने, मुंह के छाले, लिम्फ नोड्स की सूजन, थकान महसूस करना, सीने में दर्द, पेशाब में प्रोटीन का जाना और चेहरे पे लाली जो की धुप से बढ़ जाती हो शामिल हैं। महिलाओं में पुरुषों की तुलना में नौ गुणा अधिक प्रभावित होती है। हालांकि यह सबसे अधिक 15 से 45 साल की उम्र के बीच शुरू होता है, लेकिन ये किसी भी आयु के हो सकती है SLE गर्भाशय में गर्भ की मृत्यु की एक बढ़ती हुई दर और उत्स्फूर्त गर्भपात (गर्भपात) की वजह भी है| देश भर में कई चिकित्सक, ल्यूपस के लक्षणों और स्वास्थ्य प्रभावों से अनजान हैं, इसलिए सही निदान और चिकित्सा उपचार प्राप्त करने से पहले कई वर्षों तक ल्यूपस के साथ पीड़ित हो जाते हैं

SLE के कारण पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। यह माना जाता है कि हार्मोनल, पर्यावरण और आनुवांशिक (जेनेटिक) कारक शामिल हैं। निदान सेट नैदानिक ​​और प्रयोगशाला मानदंडों पर आधारित है। SLE का निदान सूक्ष्म और भ्रमित (CLINICAL FEATURES) नैदानिक ​​सुविधा और विशेष परीक्षण के साथ प्रयोगशाला सुविधाओं की कमी की वजह से मुश्किल है।

एसएलई के इलाज में इम्मुनोसुप्प्रेस्सिवे ड्रग्स का उपयोग किया जाता है जो रोग को रोकने और उनकी गंभीरता और अवधि को कम करने में मदद करता है लेकिन जटिल साइड इफेक्ट्स से भी जुड़े होते हैं, इसलिए प्रशिक्षित रेरुमेटोलॉजिस्ट द्वारा इलाज अयं FOLLOW-UP की आवश्यकता होती है। इस बीमारी का पूर्णतः इलाज नहीं है लेकिन दवाओ से बीमारी को कण्ट्रोल में किया जा सकता है. 

पूरे देश में बहुत कम संधिशोथ विशेषज्ञ है जो इसका इलाज करते है इस रोग के बारे में चिकित्सकों और जनता के बीच संवेदीकरण और जागरूकता की आवश्यकता है।

स्वर्गीय प्रोफेसर एन.के. सिंह के निधन के बाद डॉ अनूप सिंह कई सालों से रूर्मेटोलॉजिस्ट विभाग संभाल रहे हैं और हाल ही में उन्हें एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया की तरफ से रूर्मेटोलॉजिस्ट में शोध के लिए फिजिशियन रिसर्च फाउंडेशन की तरफ से मदद भी दी गई है..
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