इंसानियत के आगे धर्म हार गया।

इंसानियत

अब्दुल रशीद
प्रधान संपादक, उर्जान्चल टाइगर
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कौन कहता है इंसानियत और मोहब्बत खत्म हो रहा है,कुछ गुमराह लोगो के घृणित कुकर्म को सच क्यो मान लिया जाय। जिस तरह बदबू ज्यादा तेज फैलता है उसी तरह भाईचारगी को तोड़ने वालों का शोर ज्यादा सुनाई देता है जो अर्ध स्तय है।
विभिन्नता में एकता हिंदुस्तान की रूह है। इसी रूह की पाकीज़गी है के सैंकड़ों साल गुलामी की काली रात गुजारने के बाद भी दुनियां में आज हम अपने वजूद की खूबसूरती के साथ अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं,जिसको दुनियां स्वीकार भी करती है,और सलाम भी करती है।

आज मैं आप से बिहार के गोपालगंज के एक ऐसे वाकये से रूबरू कराऊंगा जिसमें एक हिंदुस्तानी ने दूसरे हिंदुस्तानी भाई के बच्चे की जान बचाने के लिए धर्म की जगह इंसानियत को अहमियत दी।

मैं बात कर रहा हूँ ,बिहार के गोपालगंज में रहने वाले जावेद आलम का जिसने थैलसीमिया से पीड़ित आठ साल के पुनीत की बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए अपना रोज़ा तोड़ दिया। 

क्या है मामला
बकौल भूपेंद्र कुमार जो पीड़ित पुनीत के पिता हैं, हीमोग्लोबिन बहुत कम होने के कारण आठ साल के पुत्र पुनीत को गोपालगंज सदर के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। उसे तत्काल खून चढ़ाए जाने की आवश्यकता थी लेकिन हॉस्पिटल के ब्लड बैंक में ए पॉजिटिव ब्लड ग्रुप का खून नहीं था। उनके परिवार में भी किसी का ए पॉजिटिव ब्लड ग्रुप नहीं था। उन्होंने दूसरे ब्लड बैंक में संपर्क किया लेकिन वहां से भी ब्लड की व्यवस्था नहीं हो पाई। 

भूपेंद्र ने बताया कि अस्पताल के एक सफाई कर्मचारी ने उन्हें ब्लड डोनेट करने वाली संस्था से संपर्क करने को कहा। हॉस्पिटल में उनका नंबर लिखा था। भूपेंद्र ने उस नंबर पर संपर्क किया तो अनवर हुसैन से उनका संपर्क हुआ। उन्होंने थोड़ा समय मांगा और फिर थोड़ी देर में उनके पास एक दूसरे डोनर जावेद आलम का फोन आया। जावेद ने बताया कि उनका ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव है,तुरन्त अस्पताल पहुंच रहा हूँ।

अस्पताल में पूछताछ में जब जावेद ने बताया कि उनका रोजा है तो अस्पताल प्रशासन ने उनका ब्लड लेने से मना कर दिया। जावेद को बहुत बुरा लगा। उन्होंने कहा कि उनके लिए बच्चे की जान बचाना ज्यादा जरूरी है। जावेद ने अपना रोजा तोड़ दिया और बच्चे को ब्लड डोनेट किया।

बेलाग लपेट - भाईचारे को ग्रहण लगाने वाले यह बात समझ लीजिए, महाभारत युद्ध की तरह अंत में कुछ भी हासिल न होगा,सिवाए अफसोस के। दुर्योधन को भी कहना पड़ा मित्र अश्वत्थामा तूने ये क्या कर दिया।

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