नज़ीर हुसैन-अदाकारी से समाज को दिशा देने वाला भोजपुरी एक्टर

नज़ीर हुसैन-अदाकारी से समाज को दिशा देने वाला भोजपुरी एक्टर

मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
मुंबई।। पूर्वी उत्तर प्रदेश का जिला ग़ाज़ीपुर को बहादुरों की धरती मानी जाती है। जंगे आजादी में यहाँ के वीरों के अनेक किस्से मशहूर हैं। उसी में एक शख़्स ऐसा भी है जो अपनी बहादुरी के साथ-साथ अपनी एक अच्छी अभिनय के लिए पूरी दुनिया में विख्यात हुआ, उस शख़्स का नाम नज़ीर हुसैन है। आजाद हिन्द फ़ौज के जाबाज़ सिपाही और भोजपुरी फ़िल्म के भीष्म पितामह कहे जाने वाले कुशल निर्माता और निर्देशक नज़ीर हुसैन का ज़न्म 15 मई 1922 ई० को उत्तर प्रदेश के जिला ग़ाज़ीपुर में मुस्लिम बहुमूल्य इलाका 'कमसारोबार' क्षेत्र के मौजा़ उसिया गांव स्थित उत्तर मोहल्ला में मट्टू खान के घर हुआ था। इनके पिता का नाम साहबजाद खान जो रेलवे में गार्ड थे और माता रसूलन बीबी जो एक धार्मिक गृहिणी खातून थी। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव की प्राइमरी मकतब में हुई और आगे की पढ़ाई लखनऊ में पूरी किए। नज़ीर हुसैन लंबे समय से भूला दिए गए! तकरीबन 400 से अधिक फिल्मों में काम किया। उन्होने कुछ समय के लिए ब्रिटिश सेना में काम किया, जहां पर नेता सुभाष चंद्र बोस के प्रभाव में आकर भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) में बिमल रॉय बोस के साथ शामिल हो गए और वो कुछ दिनों तक अंग्रेजों के चुंगुल में जेल रहे, लेकिन आजादी के बाद उन्हे छोड़ दिया गया। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया गया था। 16 फरवरी 1961 ई० भोजपुरी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक तिथि मानी जाती है, इसी दिन पटना के शहीद स्मारक में भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ का मूहूर्त समारोह संपन्न हुआ और उसके अगले सुबह इस फिल्म की शूटिंग शुरू की गई थी। आज आप सोच सकते है कि हिन्दी फिल्म जगत के क्षितिज पर एक नया शक्ति का उदय कितना क्रांतिकारी कदम रहा होगा। वो भी ऐसे समय में जब किसी से भोजपुरी फिल्म बनाने के बारे में बात करना भी बेवकूफ बनने की तरह था। लेकिन हर युग में ऐसे जुनूनी होते हैं जो नए युग का निर्माण कर देते हैं। ऐसे ही एक जुनूनी सनकी थे, हिंदी फिल्मों के बेहतरीन अभिनय कर्ता नज़ीर हुसैन! जिनको आज भोजपुरी सिनेमा का भीष्म पितामह कहा जाता है। नज़ीर साहब भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए बहुत बेचैन थे। भोजपुरी फिल्म बनाने की प्रेरणा उनको देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद से मिली थी। राजेंदर बाबू के सामने जब नज़ीर साहब ने अपने मन की इस बात को रखा था तो राजेंदर बाबू ने कहा आपकी बात तो बहुत अच्छी है लेकिन इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए और उतना हिम्मत अगर आप में हो तो फिल्म जरूर बनाइए। इतना हिम्मत नज़ीर साहब के पास था। इसके बाद उसने उन्होंने एक बेहतरीन स्क्रिप्ट लिखी जिसका नाम रखा "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो" और फिर वक्त की रफ्तार के साथ निर्माता ढूंढने की उनकी कोशिश अनवरत जारी रही। ये अंधेरे से उजाले की ओर एक ऐसा सफर था जिसका सुबह कब, कहाँ और कैसे होगा ये इस समय किसी को भी नहीं पता था। चारो तरफ बस एक दर्दीला सन्नाटा पसरा था।
इसी अंधेरे के सफर में नाजिर साहब के हमसफर बनें – निर्माता के रूप में विश्वनाथ शाहाबादी, निर्देशक के रूप में कुंदन कुमार, हीरो के रूप में असीम कुमार और हिरोइन के रूप में कुमकुम मिली। ये काफीला जब आगे बढ़ा तो इसमें रामायण तिवारी, पद्मा खन्ना, पटेल और भगवान सिन्हा जैसी शख्सियतें भी शामिल हो गए। गीत का जिम्मा शैलेन्द्र ने उठाया तो संगीत के जिम्मेदारी ली चित्रगुप्त जी ने! फिर क्या था, फिल्म ‘ गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनी और 1962 में रिलीज हुई। नतीजा ये कि गाँव तो गाँव शहर के लोग भी इस भोजपुरी फ़िल्म को देखने में खाना-पीना भूल गए। जो वितरक इस फिल्म को लेने से ना-नुकुर कर रहे थे अब दांतो तले अंगुली काटने लगे थे। लोग जहां-तहां बाते करने लगे थे कि गंगा नहाओ, विश्वनाथ जी के दर्शन करो और तब घर जाओ। इस फिल्म की खासियत थी दर्शक से इसकी आत्मीयता, दहेज, इस्लाह, बेमेल विवाह, नशाबाजी, सामंती संस्कार और अंधविश्वास से निकली समस्या, जो भोजपुरिया लोगों को अपनी जिन्दगी की समस्या लग रही थी। गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार चित्रगुप्त ने गीतों को इतना मोहक बनाया कि गीत गली-गली बजने लगे। सन.1961 से 1967 के बीच भोजपुरी सिनेमा : पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के गीत पूर्वोत्तर भारत के गाँव-गाँव में गूंजने लगे। पांच लाख की पूंजी से बनी यह ‘गंगा मइया…’ ने लगभग 75 लाख रुपए का व्यवसाय की। इसे देखकर कुछ व्यवसायी लोग भोजपुरी फिल्म को सोना के अंडे देने वाली मुर्गी समझने लगे। नतीजा ये निकला कि भोजपुरी फिल्म निर्माण का जो पहला दौर 1961 से शुरू हुआ वो 1967 तक चल पड़ा। इस दौर में दर्जनों फिल्में बनीं लेकिन ‘लागी नाहीं छूटे राम’ और ‘विदेसिया’ को छोड़ कर कोई भी फिल्म अच्छा प्रदर्शन नही कर पाई। इन दोनों फिल्मों के गीत कमाल के थे। एक दशक की चुप्पी : 1967 के बाद दस साल तक भोजपुरी फिल्म निर्माण का सिलसिला ठप रहा। सन.1977 ई० में विदेसिया के निर्माता बच्चू भाई साह ने इस चुप्पी को तोड़ने का जोखिम उठाया। उन्होंने सुजीत कुमार और मिस इंडिया प्रेमा नारायण को लेकर पहली रंगीन भोजपुरी फिल्म ‘दंगल’ का निर्माण किया। नदीम-श्रवण के मधुर संगीत से सजी ‘दंगल’ व्यवसाय के दंगल में भी बाजी मार ले गई। भोजपुरी फिल्म के इस धमाकेदार शुरुआत के बावजूद दस साल 1967 से 1977 तक भोजपुरी फिल्मों का निर्माण लगभग बंद रहा। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की ये हालत भोजपुरीया संस्कार और संस्कृति की भोथर चाकू से हत्या करने वाले फिल्मकारों के चलते हुई। सन.1967 से 1977 के अंतराल में जगमोहन मट्टू ने एक फ़िल्म ‘मितवा’ भी बनाई, जो कि 1970 में उत्तर प्रदेश और 1972 में बिहार में प्रदर्शित की गई। इस तरह से ये फिल्म पहले और दूसरे दौर के बीच की एक कड़ी थी। भोजपुरी फिल्म का सुनहरा दौर : 1977 में प्रदर्शित ‘दंगल’ की कामयाबी ने एकबार फिर नज़ीर हुसैन को उत्प्रेरित कर दिया। जिसके बाद उन्होंने राकेश पाण्डेय और पद्मा खन्ना को शीर्ष भूमिका में लेकर ‘बलम परदेसिया’ का निर्माण किया। अनजान और चित्रगुप्त के खन खनाते गीत-संगीत से सुसज्जित ‘बलम परदेसिया’ रजत जयन्ती मनाने में सफल हुई। तब इस सफलता से अनुप्राणित होकर भोजपुरी फिल्म के तिलस्मी आकाश में निर्माता अशोक चंद जैन का धमाकेदार अवतरण हुआ और उनकी फिल्म ‘धरती मइया’ और ‘गंगा किनारे मोरा गाँव’ ने हीरक जयन्ती मनाई। भोजपुरी फ़िल्म निर्माण का ये दूसरा दौर 1977 से 1982 तक चला। सन. 1983 में 11 फिल्में बनीं जिनमें मोहन जी प्रसाद की ‘हमार भौजी’, 1984 में नौ फिल्में बनीं जिसमें राज कटारिया की ‘भैया दूज’, 1985 में 6 फिल्में बनीं जिनमें लाल जी गुप्त की ‘नैहर के चुनरी’ और मुक्ति नारायण पाठक की ‘पिया के गाँव’, इसके अलावा 1986 में 19 फिल्में बनीं जिनमें रानी श्री की ‘दूल्हा गंगा पार के’ हिट रही, जिन्होंने भोजपुरी फिल्म व्यवसाय को खूब आगे बढ़ाया जो सभी फिल्मे बिहार में प्रदर्शित की गई थी। स्पोर्ट्स खिलाड़ी के साथ-साथ समाज सेवक भी रहे, नज़ीर हुसैन का अपने पैतृक गांव उसिया एवंम 'कमसारोबार' क्षेत्र से दिली लगाव शुरू से रहा, इसलिए वो अपनी कई सारी फिल्मों की शूटिंग भी अपने क्षेत्रीय इलाको में किए और परदे पर लाए। साथ ही सन. 1962 ई० में अपनी पहली फ़िल्म 'गंगा मोरे प्यरी चढाईबो' की प्रमोशन के लिए लखनऊ के हज़रतगंज स्थित 'कपूर' होटल पहुंचे और वहां से अपने विरादरी के लोगों से मिलने के लिए लखनऊ के नाका चौराहा स्तिथ मंसूर मंज़िल(लाल कोठी) पहुंचे और वहां लोगों से मुलाकात की, जिसका चश्मदीद गवाह गोड़सरा गांव के हाजी एजाज खान है। उन्होंने 'गंगा मोरे प्यरी चढाईबो' फ़िल्म, अपने इलाकाई यानी 'कमसारोबार' विरादरी में शादी की गंदी रीति-रिवाजों को देखते हुए, उस पर अधारीत ये फ़िल्म- इस्लाह पर खरे उतरने और विवाह के सामाजिक बुराइयों पर रोक लगाने के लिए, गंदी रीती-रीवाजों से आहत होकर लोगों को तमाचा मारने का काम किया। अततः 65 वर्ष की उम्र में 25 जनवरी 1984 ई० को उनकी मृत्यु मुंबई के मलाड़ वेस्ट नाडीयाड़ कॉलोनी में हार्ट अटैक होने आने से हो जाती है। उनकी मीट्टी कॉलोनी के पास मस्जिद वाली कब्रिस्तान में दफ़न कर दिया जाता है। आज वो हमारे बीच इस दुनिया में नही है फिर भी उनकी अनेको बेहतरीन फ़िल्मी किरदार लोगों के दिलों जेहन में ज़िन्दा है। उनकी भोजपुरी में फ़िल्मों में ज़िंदगी के आखिर पड़ाव में फिल्माया गया 'रूस गई ल सईयाँ हमार' और 'टीकुलीया चमके आधी रात' में आखिरी अभिनय था जो परदे पर इनकी मृत्यु के बाद रीलीज हुई थी। वहीं हिन्दी फिल्मों में अमर, अकबर, एंथनी में इनका आख़िर रोल फ़िल्मस्टार अमिताभ बच्चन के साथ 'पादरी' का रोल रहा। इस्लामीक फिल्मों में देखा जाए तो 'मेरा ख़्वाजा गरीब नवाज़' में इनका बहोत अच्छा रोल रहा।
नज़ीर हुसैन की शादी मौजा कुर्रा(दक्षिण मोहल्ला) के रहने वाले फ़ज़ल करीम खां की लड़की हिफाज़त बेग़म से हुई थी। नज़ीर हुसैन साहब को इण्डियन रेलवे द्वारा स्वतंत्रता सेनानी होने पर मुफ़्त रेलवे पास दिया गया था साथ ही नॉर्थन रेलवे का चैयरमैन बनाने की पहल इण्डियन रेलवे गवर्मेन्ट द्वारा लेटर भेज की गई थी लेकिन नज़ीर साहब ने फ़िल्म इंडस्ट्री में ब्यस्तता के कारण सरकार की इस बेहतरीन पहल को ठुकरा दिया था, जिसका चश्मदीद गवाह उसिया गांव के डॉक्टर इबरार खान है। फिलहाल उनकी याद में उनके पैतृक गांव उसिया में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के तरफ से नीर्मीत की गई स्वतंत्रता सेनानी "नज़ीर हुसैन स्मिर्ति द्वार" और एक संस्था "नज़ीर हुसैन फाउंडेशन" के नाम से सन.2018 में कांग्रेसी नेता शमशाद खां द्वारा की गई है। नज़ीर साहब का लड़का मुमताज़ अली और उनके पोते आसिफ अली जो कुछ फिल्मों में अभिनय किए, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। आज उनका पूरा परीवार मुंबई और उसिया में आबाद है। इसके अलावा नज़ीर हुसैन के सगे परपोते आरीफ खान व परवेज़ खान 'ब्रदरस' और सौलत खान द्वारा इलाकाई क्षेत्र उसिया में शिक्षा के लिए "कुएल्टी एडुकेशन सेन्टर" नामक एक बेहतरीन इंग्लिश मीडीयम स्कूल 15 मार्च 2016 ई० को स्थापित किया गया है। अत: मैं भारत सरकार से विन्रम निवेदन के साथ आग्रह करूँगा कि ऐसे महान विभूती शख़्सियत के नाम पर भोजपुरी सिनेमा जगत में "नज़ीर हुसैन फ़ाल्के अवॉर्ड" देने की शुरुवात किया जाना चाहिए।
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