नीचे गिरने की होड़ मची हो तो बेचारा रुपया कब तक थमा-तना रहेगा।

न्यू इंडिया,रुपया,डॉलर

Image Source:Google

आर्थिक उदारीकरण यानी कि ग्लोबलाइजेेशन कहते हैं। इस तरह उन्होंने ग्राम्यवासिनी भारत माँ के आँगन को "गोबराइजेशन" करके चमका दिया। 

जयराम शुक्ल 
जब जब रुपया धड़ाम से नीचे गिरता है तो अपने देश के स्वयंभू अर्थशास्त्रियों के बीच हाहाकार मच जाता है। तेजडिय़ों, मंदडिय़ों के चेहरे सूखने लगते हैं। शेयर बाजार में सेनसेक्स और निफ्टी हार्टअटैक नापने की मशीन के कांटे की तरह ऊपर-नीचे होने लगते हैं। हाल फिलहाल का मौद्रिक नजारा कुछ ऐसा ही दिख रहा है। 
टीवी चैनलों से चिन्तित आवाजें आ रही हैं। सोशल मीडिया में देश की अर्थव्यवस्था हांफते कह रही है कि वित्तमंत्री जी कुछ करिए। वित्तमंत्री जी देश को दिलासा दे रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा... डॉलर की अकड़ जल्दी ही ढ़ीली पड़ जाएगी। 
अभी हमारे बंदे पता लगा रहे हैं कि कौन-कौन सा क्षेत्र एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के लिए बचा है। उन इलाकों की भी खोज की जा रही है जहां मल्टीनेशनल्स या अमेरिकी पूंजी से चलने वाले कारपोरेट घरानों को तेल-गैस- कोयला - हीरा और अन्य खनिज खोदने के पट्टे दिए जाएं। इनका पता लगते ही डालरों की बरसात होने लगेगी और अपना रुपया फिर तन जाएगा। 

बस न्यू इंडिया बनने के लिए आँखें मूँद कर अपना योगदान देते जाओ और फिर आगे देखो। 

अपुन अर्थशास्त्री नहीं है, लिहाजा पहले तो रुपए गिरने की खबर सुनी तो लगा.. रिजर्व बैंक के खजाने से रुपए की पेटी या ट्रंक धड़ाम से नीचे गिरा होगा। रुपए का गिरना और उठना अपन बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) वालों को समझ में नहीं आता। वैसे भी हम गरीबी रेखा के नीचे गिरे हुए लोग हैं। 

फिर भी अपने मोहल्ले में रहने वाले और सरकारी स्कूल में इकॉनामिक्स-कॉमर्स पढ़ाने वाले मास्साब से पूछा - सर जी ये रुपया गिरता कैसे है? मास्साब संविदाकर्मी थे, डीईओ-बीईओ को रिश्वत देकर नौकरी पाई थी, .. सो उस टीस को अपनी व्याख्या में घोलते हुए कहा कि जैसे मेरा प्रिन्सिपल डीईओ के, डीइओ शहर के नेता के, नेताजी-मुख्यमंत्री के, मुख्यमंत्री आलाकमान के चरणों पर पाटापसार गिरते हैं, वैसे ही अपना रुपया डॉलर के चरणों में गिर गया है। कोई नई बात नहीं मूरख। ऐसा गिरना उठना तो सृष्टि का नियम है। 
मास्साब बोले- वैसे जब समूचे देश में ही नीचे गिरने की होड़ मची हो तो बेचारा रुपया कब तक थमा-तना रहेगा। हाल ही में देखा ... कि कई ऊँचे ऊँचे लोग रुपए के लिए कितना नीचे गिर सकते हैं। कई कारपोरेटी चोट्टे सात समंदर पार जा गिरे। सरकार के अफसर, नेता-मथानी, घपले घोटालों में फंसकर डूबते उतराते रहते हैं। कोई चारित्रिक रूप से नीचे गिरता है तो कोई नैतिक रूप से। रुपये को भी ऐसई गिरे रहने दो। 
मैंने कहा - मास्साब सवाल ये है कि अपना रुपया डॉलर के सामने गिरा है, ये अपने देश के स्वाभिमान से जुड़ा मामला है। गांधीजी चर्चिल के सामने तो नहीं गिरे। विवेकानंद ने शिकागो में भूखे भारत की धार्मिक व अध्यात्मिक शान के झण्डे को फहराया। धमकी पर धमकी के बाद भी इन्दिरा जी अमेरिका के आगे नहीं गिरी। मास्साब आखिर अपने रुपए का कुछ तो स्वाभिमान होना चाहिए। जब देखो तब डॉलर के आगे दंडवत हो जाता है। 

मास्साब ने कहा- चलो चल के मोहल्ले के नेता से पूछ लेते हैं। आखिर उसकी भी जिम्मेदारी बनती है। मोहल्ले के नेताजी ने अपने ज्ञान की पिटारी खोली और जानकारी दुरुस्त करते हुए बोले- इससे पहले अपने प्रधानमंत्री कौन थे? डा. मनमोहन सिंह ही न। ये वही मनमोहन सिंह है कभी जिनके दस्तखत रिजर्व बैंक के नोट पर रहते थे। फिर ये आईएमएफ (इन्टरनेशनल मनिटरी फंड) और वर्ल्ड बैंक में नौकरी करने गए। इन दोनों जगहों में डॉलर का ही बोलबाला है। फिर इन्डिया लौटे तो नरसिंहराव के खजांची बन गए। जब खजांची बने तो देखा खजाने में एक डॉलर भी नहीं। चन्द्रशेखर जी देश का सोना गिरवी करवा गए थे। मनमोहनजी ने जुगत लगाई और देश के खिड़की -दरवाजे डॉलर के प्रवेश के वास्ते खोल दिए। 
फिर प्रधानमंत्री बनते ही ऐलान किया- इन्डिया आओ, डॉलर दो, लूटो खाओ, डॉलर दो। इसी को आर्थिक उदारीकरण यानी कि ग्लोबलाइजेेशन कहते हैं। इस तरह उन्होंने ग्राम्यवासिनी भारत माँ के आँगन को "गोबराइजेशन" करके चमका दिया। 
यूरोपी कम्पनियां इन्डिया आईं, डॉलर दिया, प्राकृतिक संसाधनों को लूटा। नेताजी बोले- यूपीए सरकार ने डालर को अपने मूड़े (सिर पर)चढ़ा रखा था। उसकी आदत जाते जाते ही जाएगी.. न। बीच में मास्साब टपक पड़े- सो इसलिए जब डॉलर अपने फॉर्म पर आता है तो अपनी अर्थव्यवस्था के रंग उड़ जाते है और रुपया डॉलर के चरणों पर बिछ जाता है। और यह तब तक बिछा रहता है जब तक अमेरिका, यूरोप के मल्टीनेशनल्स डॉलर की नई खेप लेकर इन्डिया नहीं पहुंचते। 

यानी कि जब रुपया गिरे तो समझिए कोई नया विनिवेश-आर्थिक समझौता और व्यापारिक सौदा होने वाला है। 

मास्साब का अर्थशास्त्र जब अपुन के पल्ले नहीं पड़ा तो मैं फिर नेताजी से पूछ बैठा ..कि वो पन्द्रह लाख रुपये, वो स्विस बैंक का पैसा..वो अच्छे दिन ? अब तो मनमोहन सिंह नहीं हैं...ना। नेताजी ने दाएं, बाएं फिर सीधे देखते हुए कहा ..मैं किसी भी तरह का वक्तव्य देने के लिए अधिकृत नहीं हूँ... नो कमेंट।
Reactions:

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget