क्या है,नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िशों का इतिहास

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फाईल फोटो -प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 
भीमा कोरेगांव हिंसा मामले की जांच में जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित हत्या की साज़िश का पता चला है तब से सोशल मीडिया पर सलमान ख़ान की फ़िल्म ‘तुमको न भूल पाएंगे’ का एक सीन ख़ूब शेयर किया जा रहा है. इसमें अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर सलमान से कह रहे हैं कि जनता में उनकी पार्टी की छवि ख़राब है इसलिए उसके प्रति सहानुभूति बढ़ाने के लिए उनकी हत्या का नाटक किया जाए.

इस वीडियो के बहाने लोग सोशल मीडिया पर कह रहे हैं कि आगामी चुनावों को देखते हुए भाजपा और सरकार ने यह कहानी गढ़ी है कि भीमा कोरेगांव की हिंसा में शामिल माओवादी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश रच रहे हैं. वहीं, कांग्रेस के संजय निरुपम से लेकर एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार तक सभी विपक्षी नेताओं ने इस मामले में हुईं हालिया गिरफ़्तारियों को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा किया है.

सरकार और भाजपा के लोग कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश को किसी हाल में हल्के में नहीं लिया जा सकता. लेकिन बतौर राजनेता नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िशों का इतिहास आलोचकों को सवाल खड़ा करने का मौक़ा तो देता ही है. 2001 में उनके गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब तक कई मौक़े आए हैं जब अचानक किसी मामले से उनकी हत्या की साज़िश की बात निकल आती है. कभी किसी संदिग्ध आतंकी की गिरफ़्तारी के बाद पुलिस (ख़ास तौर पर गुजरात पुलिस) दावा करती है कि नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश हो रही है तो कभी भाजपा का कोई नेता या जाना-माना समर्थक ही उनकी हत्या की साज़िश की बात कहता है. लेकिन यह जानने में आज तक नहीं आया कि इतनी साज़िशों (जो सही भी हो सकती हैं) से जुड़े किसी मामले में किसी को दोषी ठहरा कर सज़ा दी गई हो. ख़बरें आती हैं और निकल जाती हैं. बाद में उनका फ़ॉलोअप भी नहीं होता.

2009 - फ़ोन कॉल के ज़रिये हत्या का पता चला

अक्टूबर, 2009 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अहमदाबाद पुलिस की अपराध शाखा ने नरेंद्र मोदी की हत्या की कथित साज़िश में दो लोगों को गिरफ़्तार किया था. मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे. बताया गया था कि आरोपितों ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करके नरेंद्र मोदी की हत्या की धमकी दी थी. उनके अलावा उस समय के गुजरात के एक आईपीएस अधिकारी की भी हत्या की साज़िश का दावा किया गया था. पुलिस ने दोनों संदिग्धों की गिरफ़्तारी की पुष्टि की थी. लेकिन बाक़ी जानकारी देने से यह कह कर इनकार कर दिया गया कि मामला बहुत संवेदनशील है.

2010 - लश्कर-ए-तैयबा ने हत्या की साज़िश रची

दिसंबर 2010 में भी नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश का पता चला था. एक अमेरिकी राजनयिक के हवाले से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने बताया था कि आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) ने नरेंद्र मोदी की हत्या की योजना बनाई थी. अमेरिका के विदेश मंत्रालय की जून 2009 की एक रिपोर्ट के हवाले से विकीलीक्स ने रिपोर्ट दी थी कि लश्कर दक्षिण भारत में बड़े हमले की तैयारी कर रहा था. इसी के तहत मोदी की हत्या की भी योजना थी. हालांकि अमेरिका ने रिपोर्ट को न तो ख़ारिज किया और न ही उसकी पुष्टि की.

2013- हत्या की तीन साज़िशों का पता चला

अप्रैल 2013 में जानी-मानी पत्रकार मधु किश्वर ने किसी ‘सरकारी सूत्र’ के हवाले से दावा किया कि नरेंद्र मोदी राजनीतिक हत्या की साज़िश के तहत निशाने पर हैं. उन्होंने साज़िश को सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ से जोड़ते हुए ट्वीट किया, ‘कल कुछ सरकारी अधिकारियों से मुलाक़ात हुई. उन्होंने बताया कि अगर तीस्ता (सीतलवाड़) और कांग्रेस मोदी के ख़िलाफ़ झूठी एफ़आईआर दर्ज नहीं करा पाए तो यह सच में संभव है कि मोदी की हत्या कर दी जाए.’ ट्वीट के वायरल होने के बाद मधु किश्वर ने उसे हटा दिया था. लेकिन बाद में उन्होंने एक और ट्वीट कर अपनी बात दोहराई.

उसके बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने मधु किश्वर के दावे को ख़ारिज कर दिया. उस समय गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि नरेंद्र मोदी की हत्या से जुड़ी ख़बर सही नहीं है. पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा था, ‘मेरे पास इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. भाजपा ने इस बारे में पता लगाया है लेकिन हमें (सरकार) कोई जानकारी नहीं मिली है. अगर कोई नेता निशाने पर होता है तो हम उसे और राज्य को अलर्ट कर देते हैं. नरेंद्र मोदी को लेकर ऐसी कोई जानकारी नहीं है.’

फिर उसी साल भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश रचने का बड़ा आरोप लगा दिया था. उन्होंने कहा था, ‘मेरा आरोप है कि कहीं नीतीश कुमार ने मुजाहिदीन के साथ मिलकर नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश तो नहीं की. हमें जवाब चाहिए.’ हालांकि गिरिराज सिंह के इस बयान का कोई आधार नहीं था. वैसे उनका ऊटपटांग बयान देने का इतिहास रहा है. पिछले साल 2017 में वे नीतीश कुमार पर उनकी हत्या की साज़िश करने का आरोप भी लगा चुके हैं. बहरहाल, नरेंद्र मोदी की हत्या को लेकर उनके बयान ने ख़ूब चर्चा बटोरी थी.

इसके बाद 2013 में ही नवंबर में ख़बर आई कि मानव बम के ज़रिये नरेंद्र मोदी की हत्या की जा सकती है. टीवी9 गुजरात ने पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किए गए इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के आतंकी इम्तियाज़ के हवाले से यह ख़बर दी थी.

2014 -लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हत्या की साज़िश

साल 2014 की शुरुआत में नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रचार कर रहे थे. उसी दौरान एक पत्रकार ने ख़ुफ़िया विभाग के सूत्रों के हवाले से ख़बर दी कि उनकी हत्या के लिए आईएम और एलईटी ने तीन शार्प शूटरों को सुपारी दी थी. ख़बर के मुताबिक यह साज़िश उन्हीं आतंकियों द्वारा रची जा रही थी जिन्होंने अक्टूबर 2013 में बिहार में नरेंद्र मोदी की एक रैली से पहले सीरियल धमाके करवाए थे. चार साल बाद यही पत्रकार नरेंद्र मोदी की हत्या की ताज़ा साज़िश को सही ठहराने में लगे हुए हैं.

2014 में ही अप्रैल में फिर ख़बर आई कि नरेंद्र मोदी के वाराणसी दौरे के दौरान बड़ा आतंकी हमला कर उनकी हत्या करने की साज़िश को नाकाम कर दिया गया. हमला दिल्ली पुलिस ने नाकाम किया, राजस्थान से चार संदिग्ध आतंकियों को गिरफ़्तार करके. ये चारों भी आईएम के सदस्य बताए गए थे.

हालांकि उस समय दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश की पुष्टि नहीं की थी. उनके मुताबिक़ पुलिस को आतंकियों के पास विस्फोटक सामान ज़रूर मिला था लेकिन, मोदी को निशाना बनाने के सवाल पर उनका कहना था, ‘हमला कहीं भी हो सकता है. राजनीतिक रैली भी निशाने पर हो सकती है. लेकिन अभी जांच शुरू हुई है लिहाज़ा मैं कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता.’

हालांकि अधिकारी के बयान से मीडिया की बहसों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा जिनमें हत्या की साज़िश को ज़ोर-शोर से उठाया गया. यह सिलसिला आगे भी जारी रहा. 2015, 2016 और 2017 में भी ऐसी ख़बरें आती रहीं.

2018- आतंकी की गिरफ़्तारी के काफ़ी समय बाद हत्या की आशंका

इसी साल मई में गुजरात एटीएस ने आईएस के दो आतंकियों से मिली जानकारी के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश का दावा किया. ख़बरों के मुताबिक़ एटीएस ने अपनी एक चार्जशीट में बताया कि दोनों गिरफ़्तार आतंकियों में से एक के किसी अज्ञात सहयोगी ने प्रधानमंत्री की हत्या की बात कही थी. उसने गिरफ़्तार आतंकी से फ़ोन पर कहा था कि मोदी को स्नाइपर राइफ़ल से मारना है. लेकिन जब अक्टूबर 2017 में दोनों आतंकियों को गिरफ़्तार किया गया था तो उस दौरान और उसके कुछ समय बाद भी प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश की रिपोर्टें नहीं आई थीं. छह-सात महीने बीत जाने के बाद एटीएस चार्जशीट दाख़िल करती है तो उसमें नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश का ज़िक्र होता है. और अब भीमा कोरेगांव हिंसा के पीछे किन लोगों का हाथ था, इस सवाल को नरेंद्र मोदी की हत्या की एक और साज़िश की चर्चा ने छिपा दिया है.

साज़िश और मुठभेड़

राजनेता के रूप में नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िशों का जब भी पता चला है तब-तब उन्हें गंभीरता से लिया गया है. लेकिन इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ जैसे मामले इन साज़िशों पर कई सवाल भी उठाते हैं. 15 जून, 2004 को गुजरात पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में 19 साल की इशरत जहां सहित तीन लोग मारे गए थे. पुलिस के मुताबिक ये सभी लश्कर के आतंकी थे जो नरेंद्र मोदी को मारने आए थे. इसी तरह, 26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन शेख़ की भी पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मौत हुई थी. उसके बारे में भी कहा गया कि वह नरेंद्र मोदी को मारने की योजना बना रहा था. बाद में इन दोनों मुठभेड़ों पर फ़र्ज़ी होने के आरोप लगे. ये मामले अदालतों में भी गए. 2010 में सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में अमित शाह की गिरफ़्तारी भी हुई. कुछ समय पहले ही अदालत ने उन्हें बरी किया है.

क्या अब देश के प्रधानमंत्री की हत्या संभव है?

प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश का कई विपक्षी नेताओं ने मज़ाक़ उड़ाया है. वहीं, भाजपा ने इसे असंवेदनशीलता का उदाहरण बताया है. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि देश ने हिंसा में अपने दो प्रधानमंत्री खोए हैं और उन्हें खोने वाले (कांग्रेस) ही इस संवेदना को नहीं समझते.

केंद्रीय मंत्री की बात ग़लत नहीं है, लेकिन पहले की दोनों हत्याओं को परिस्थितियों की नज़र से देखने की ज़रूरत है. इंदिरा गांधी की हत्या आतंकियों ने नहीं की थी, बल्कि स्वर्ण मंदिर में चले सैन्य अभियान से ग़ुस्साए उनके ही दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें मार दिया था. ऑपरेशन ब्लू स्टार की वजह से कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को सलाह भी दी थी कि वे अपने सिख अंगरक्षकों को हटा दें, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया था. जब उन्हें बताए बिना ऐसा किया गया तो वे काफ़ी नाराज़ हुईं और उन अंगरक्षकों को वापस बुलवा लिया. बाद में उनकी हत्या कर दी गई.

राजनीतिक हत्या का शिकार होने वाले दूसरे प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी. हालांकि उनके समय में एसपीजी (प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए बनाया गया विशेष दल) था, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री होने की वजह से उन्हें इसकी सुरक्षा नहीं मिल पाई थी. कई लोग यह नहीं जानते कि जिस समय राजीव गांधी की बम धमाके में मौत हुई उस समय वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं थे. 1991 में उनकी हत्या के बाद एसपीजी एक्ट में बदलाव किया गया और वर्तमान प्रधानमंत्री के अलावा पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवारवालों को भी 10 साल के लिए एसपीजी सुरक्षा देने का प्रावधान किया गया. तब से भारत के किसी प्रधानमंत्री पर हमला नहीं हुआ है. आज देश के प्रधानमंत्री जहां भी जाते हैं यह दल राज्य पुलिस और एनएसजी के साथ मिलकर उनकी सुरक्षा का ज़िम्मा बख़ूबी संभालता है.

राजीव गांधी की हत्या से पहले और उसके बाद भारत के प्रधानमंत्री की सुरक्षा में बहुत अंतर आ गया है. ख़ुद भाजपा की सहयोगी शिव सेना ने कहा है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा इज़रायल की प्रसिद्ध ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के स्तर की है. प्रधानमंत्री आवास पर 500 से ज़्यादा एसपीजी कमांडो हमेशा तैनात रहते हैं. वे 24 घंटे एसपीजी के सुरक्षा घेरे में रहते हैं. प्रधानमंत्री का क़ाफ़िला जिस जगह से गुज़रता है उसका एक तरफ़ का रास्ता हर किसी के लिए बंद कर दिया जाता है. क़ाफ़िले की सभी गाड़ियों के गुज़रने से पहले वहां किसी को जाने इजाज़त नहीं होती.

सुरक्षा विशेषज्ञों की मानें तो हमलावरों को छकाने के लिए क़ाफ़िले में दो डमी कारें भी शामिल की जाती हैं. इतना ही नहीं क़ाफ़िले की कुछ विशेष गाड़ियों पर 100 मीटर के दायरे में रखे गए बमों को डिफ़्यूज़ करने के लिए यंत्र भी लगे होते हैं. प्रधानमंत्री जिस कार में बैठते हैं उस पर किसी ग्रेनेड बम तक का असर नहीं होता. कार के टायर पंचर होने के बाद भी उसे 90 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से 320 किलोमीटर तक चलाया जा सकता है.

प्रधानमंत्री जब हवाई सफ़र करते हैं तो उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी वायु सेना देखती है. उनका जहाज़ जिस हवाई क्षेत्र से गुज़रता है वह नो फ़्लाइंग ज़ोन घोषित हो जाता है. यानी कोई और जहाज़ उस इलाक़े से नहीं गुज़र सकता. इसके अलावा ज़ेड प्लस सुरक्षा के तहत प्रधानमंत्री के आसपास 36 एनएसजी कमांडो अत्याधुनिक हथियार के साथ चलते हैं.साभार-सत्याग्रह 

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