बिहार में बिना नेतृत्व की है राजपूत राजनीति

बिहार में बिना नेतृत्व की है राजपूत राजनीति

लोकसभा चुनाव 2019 पर खास रिपोर्ट,
पटना(स्टेट हेड-मुकेश कुमार)।।सूबे बिहार में मौजूदा हालात में राजपूत राजनीति बिना नेतृत्‍व की हो गयी है। राजपूत जाति में सूबे के पूर्व कृषि मंत्री,नरेंद्र सिंह को छोड़कर एक भी ऐसा नेता नहीं हैं,जो राजपूतों का वोट किसी पार्टी के पक्ष में ट्रांसफर करवा सके।पूर्व मंत्री,नरेंद्र सिंह के व्यक्तित्व से औरंगाबाद, भोजपुर, रोहतास, छपरा, मुंगेर, भागलपुर, बांका, जमुई आदि क्षेत्रों के राजपूत समाज में इन्हें बड़ी श्रद्धा और सम्मान की नजर से देखा जाता हैं।इस समाज मे इनके अलावा किसी को अन्य को कद्दावर नेता मानने को भी तैयार नहीं है।गौरतलब है कि अनुग्रह नारायण सिंह के बाद राजूपतों का नेतृत्‍व छोटे साहब यानी सत्येंद्र नारायण सिंह ने संभाल लिया था।एक दौर था जब राजपूतों की बड़ी आबादी उनको अपना नेता मानती थी और राजपूत राजनीति का केंद्र बिंदु उनका बोरिंग रोड स्थित आवास ही था।राजनीतिक विश्लेषक बताते है की वे अपने जीवन-काल में अपने पुत्र निखिल कुमार को जाति की विरासत की बागडोर सौपना चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। निखिल कुमार का अपना प्रशासनिक व्‍यक्तित्‍व ही शायद जाति की विरासत को लेकर बहुत ज्यादा उत्‍साहित नहीं था।बदलते परिदृश्य में औरंगाबाद के राजपूतों ने ही उन्‍हें अस्‍वीकार कर दिया।फिर एक दौर में सहरसा के आनंद मोहन भी राजपूतों के नेता के रूप में उभर रहे थे।
अपने बल-बुते पत्‍नी लवली आनंद को सांसद बनवाने में सफल रहे थे।लेकिन हत्या के मामले में सजायाफ्ता होने के बाद उनका उत्‍थान स्‍थायी नहीं हो सका।केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद भाजपा ने राधामोहन सिंह को प्रदेश अध्‍यक्ष बनाकर राजपूत नेता के रूप में खड़ा करने की कोशिश की थी,लेकिन वे पार्टी की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सके।मौजूदा हालात में फिलहाल राजपूतों का एक बड़ा तबका सूबे के पूर्व कृषि मंत्री,नरेंद्र सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सवर्णवादी राजनीति के साथ खड़ा है।
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