हमलोग जिस संसार में रहते हैं वह प्रपंच का घर है-- डी.जी.(पुलिस)गुप्तेश्वर पांडेय

हमलोग जिस संसार में रहते हैं वह प्रपंच का घर है-- डी.जी.(पुलिस)गुप्तेश्वर पांडेय

पटना(स्टेट हेड-मुकेश कुमार)।।सूबे के कर्तव्यनिष्ठ, सरल व सौम्य स्वभाव के धनी डीजी(पुलिस),गुप्तेश्वर पांडेय जी ने आज के चिंतन में आमजन मानस के लिए बढ़ी गूढ़ बातों का संदेश प्रसारित किया है - उन्होंने कहा है की इस प्रपंच में चेतना रजोगुनी अहंकार से इतनी कुंठित हो जाती है कि हमारा सत्य के प्रति और मूल्यों के प्रति आग्रह ही धीरे धीरे समाप्त होने लगता है और हम प्रपंचों में फँस कर जड़वत होते जाते हैं।दुनियां की कोई भौतिक उपलब्धि हमारी चेतना को निम्नगामी ही बनाती है।यदि हम आस्तिक हैं तो ईश्वर को साक्षी रख कर और यदि नास्तिक भी हैं तो केवल अपने कर्मों को साक्षी रख कर तटस्थ भाव से अपना काम करते रहना चाहिए। क्योंकि कर्मफल ही प्रारब्ध बनते हैं।हम आज जो भी हैं या जिस तरह भी हैं,वह हमारे इसी जन्म के कर्मों का फल नहीं,उसमें हमारे प्रारब्ध की भी भूमिका है।जीवन एक अनंत यात्रा है और जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है।यदि हम नास्तिक भी हैं तो चित्त की शांति,संतोष और आनंद तो सबका लक्ष्य है ही।
इसीलिए निंदा स्तुति विरोध और संघर्ष की स्थिति में भी बिना विचलित हुए अपने चित्त की समता बनाए रखते हुए सबके मंगल की कामना करते हुए तटस्थ भाव से अपने कर्मों का निस्पादान करते रहना चाहिए।सबके अपने-अपने संस्कार हैं,स्वभाव है ,तदनुसार उनकी सोच है,उनकी वाणी है,उनका व्यवहार है।हम किसी को बदल नही सकते।अपने सगे सम्बन्धियों पिता,पुत्र और पत्नी को भी नहीं।हम सिर्फ अपने को बदल सकते हैं।यही हमारे वश में है और इसी में अपना पुरुषार्थ भी है।हमें यदि किसी की वाणी से या व्यवहार से दुःख महसूस होता है तो इसका सीधा अर्थ है कि हम में ही कमज़ोरी है।हमारा चित जब सम हो जाए तो किसी के अनुचित व्यवहार से भी दुःख नही हो सकता।बाहर कोई लड़ाई नही,सारी लड़ाई अपने भीतर है।हमारा कोई बाहर शत्रु है नहीं,हमारा असली शत्रु हमारा अशुद्ध चित्त ही है और हमारा संघर्ष सिर्फ़ उसी से है या होना चाहिये।आत्मकल्याण का यही रास्ता है।इसी भाव से जीने का मतलब संस्कारित जीवन जीना है।लेखक:श्री,गुप्तेश्वर पांडेय,पुलिस महानिदेशक सह आयुक्त,बिहार पुलिस अकादमी,बिहार,पटना है।

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